कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 5 नवंबर 2018

ब्राहमणवाद जातिसूचक संज्ञान नहीं, विचारधारा

डॉ सेवा सिंह के लिये ब्राहमणवाद जातिसूचक संज्ञान नहीं एक विचारधारा है, वचर्स्वी वर्गों के प्रभुत्व को आधार प्रदान करने वाली एक सत्तामूलक विचारधारा। बौदध और लोकायत लंबे समय तक इसे चुनौती देते रहे पर छठी शताब्दी के बाद लोकायतों के विघटन और बौदधों के पतन के बाद से यह विचारधारा जनसामान्य की मनोचेतना को विधि ग्रंथों,स्मृतियों,शास्त्रों के दैवी आतंक और महाकाव्यों व पुराणों की भक्तिपरक कथावर्ताओं के माध्यम से लगातार अनुकूलित करती रही है।
विदवानों के अनुसार बौदधों के पतन के साथ भारत का भी पतन होता है, इसके मूल में आप ब्राहमणवादी विचारधारा के विस्तार को देख सकते हैं, जिसके अनुसार ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या। फिर यह भारत देश भी इसी जगत में है तो उसके शासकों का आना जाना भी मिथ्या हुआ। ब्राह्मणवाद के पुरोधा दलित,ब्राह्मण कवि तुलसी इसे कोउ नृप होंही हमें का हानी कहकर इसे स्थापित भी करते हैं। दर्शन के नाम पर वेदांत और भक्ति को यह विचारधारा अपना आधार बनाती रही है, यह विडंबना ही है कि इसी विचारधारा के चर्चित कूटनीतिज्ञ चाणक्य ने वेदांत को दर्शन ना मानकर मात्र एक धर्मानुशासन कहा है। उपनिषदों का आत्मवाद ब्राह्मणवाद का मुख्य श्रोत है और वर्णभेद इसका मुख्य सरोकार, जिसे कौटिल्य से लेकर मनु और तुलसीदास तक सभी लागू करते हैं।
किसानों, श्रमिकों, शिल्पियों, सेवाकर्मियों, चिकित्सकों, ब्राह्मणवादी शब्दावली में कहें तो शूद्रों, का दमन वर्णव्यवस्था का मूल रहा है। ऋग्वेद में जहां ओदनम् यानि कि भात एक देवता है, वहीं वेदांत में कृषि कर्म को वेदअध्ययन में बाधक के रूप में देखा गया है। मजेदार बात है कि वेदों के संकलक और रामायण के रचनाकार शूद्र हैं और रामचरितमानस के रचनाकार तुलसी एक दलित के यहां पले दलित ब्रह्मण हैं, पर इन शास्त्रों में अधिकांश की शिक्षाएं शूद्रों के दमन व अनुशासित करने में सहयोग करती हैं। शूद्र के अन्न पर पलने वाले ब्रह्मण को स्वर्ग नहीं मिल सकता,भले ही वह नित्य वेदपाठी हो। तुलसी को भी अयोध्या के ब्राह्मणों ने कभी स्वीकार नहीं किया। यहां तक कि ब्राह्मणों को चुनौती देते तुलसी संस्कृत की जगह लोकभाषा अवधी में रचना करते हैं। पर जिस वर्णाश्रम ने उनकी दुर्दशा की कि उन्हें लिखना पडा कि मांग कर खाएंगे और मस्जिद में सोएंगे पर तुम्हारे सामने नहीं झुकेंगे, किसी की बेटी से बेटा नहीं ब्याहना मुझे , ना किसी की जाति बिगाडनी है, उसी वर्णाश्रम को वे रामकथा में स्थापित करते हैं। दरअसल यह उस अनुकूलन का परिणाम है जिसके तहत शूद्र अपनी पीडा को पूर्वजन्म के कर्मों को परिणाम मानते रहे और वेद,महाभारत,रामायण की रचना करते हुए भी अपनी स्थिति को विश्लेषित कर पाए। हालांकि वाल्मिकी ,तुलसी के वरक्स कबीर , रैदास, दादू आदि तमाम संतों ने दशरथ पुत्र राम की जगह घट-घट वासी राम को तरजीह दी । इस विचारधारा की जकडन ऐसी रही कि बोद्धों,जैनों,लोकायतों की चुनौती के अलावे जब तब हुए विदेशी हमले ही इसकी पकड कुछ ढीली कर पाए। बांटों और राज करो की नीति भले अंग्रेजों की हो पर उसकी जमीन वर्णविभाजित भारतीय समाज ने ही उपलब्ध करायी थी।शूद्र की तरह स्त्री को भी इस विचारधारा ने पापयोनी माना और कल्याण के लिये भगवतशरण में आने को कहा। स्त्री के कल्याण को पुरूष के कल्याण से अलग करने की इस अधमता को हम भारत की पतन गाथा की तरह पढ सकते हैं। शास्त्रों में स्त्रियों और शूद्रों की हत्या पर समान दंड की व्यवस्था थी,जबकि ब्राह्मण को अपीडनीय माना गया। शास्त्रों के अनुसार पूर्वजन्म के पापों के फल के रूप में स्त्री योनी में जन्म होता है। आगम-निगम के जानकार तुलसी यूं ही शूद्र के साथ नारी को ताडणा का अधिकारी नहीं बताते।
शूद्र अगर बाहर की श्रमशील इकाई थे तो स्त्री घर की। पुरूष मात्र की जन्मदात्री, माता जो कभी कुमाता नहीं होती, को ब्रह्मणवाद ने मात्र योनी यानि वंशोत्पादन के साधन की तरह देखा और अपनी इस गुलामी के विरूद्ध जब स्त्री ने आवाज उठाई तो उसी के द्वारा उसके ही हृदय को भेडिए का हृदय कहलवाया गया। भागवत पुराण-उर्वशी। स्त्री को उसके उच्चासन से दुनिया भर में गिराने के ऐसे प्रयास देखने में आते हैं। शेक्सपीयर का एक पात्र भी क्रूएल्टी के उमन का पर्यायवाची पुकारता है। यूं लोक में इससे अपने तरह से संघर्ष भी चलता रहता है, उस फिल्मी गाने को याद कीजिए- औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने बाजार दिया। ..............जारी.......स्त्रियां शुरू से इस स्थिति में नहीं थीं। ऋग्वेद में वे भी ऋचा रचनेवाली ऋषियों में शामिल थीं। अलतेकर के अनुसार - वैदिक काल में....खेतीबाडी ,कपडा ,तीरकमान आदि बनाने.....में हिस्सा लेती थीं.....आर्य विजेताओं को शूद्रों का बेगार और सस्ता श्रम मिलने लगा और स्त्रियां समाज की उत्पादक इकाई नहीं रह गयीं तब इनके स्थान में गिरावट आने लगी। नही तो पहले मद्रदेश में स्त्री राज्य का उल्लेख है। पर आगे मातृ सत्ता को तोडने के लिये बहुविवाह,बालविवाह,सतीप्रथा अदि के दवारा स्त्रियों के अधिकारों को समाप्त किया जाता रहा। विलियम रीक के अनुसार-पितृसत्तत्मक धर्मों की मूल चिंता रति आवष्यकता का निषेध है। वे धर्म और रति को परस्पर विदृवेशात्मक कोटियों में बांटते हैं। इस तरह रतिजन्य आनंद जो मूलतः रचनात्मक और सुंदर रहा है, उसे नारकीय,दारूण और अपवित्र घोषित कर दिया गया और इस सारी अपवित्रता का ठीकरा पापयोनी स्त्री के माथे फोडा गया। इस तरह यह पितृसत्तात्मक दृश्टिकोण रति की आवश्यकताओं को अपराधबोध से जोड देता है।
डॉ सेवासिंह के अनुसार कृष्णभक्ति के गोपीभाव में हम माृसत्तात्मक जीवन के सहज....उन्मुक्त यौनाचार को देख सकते हैं।...कृष्णभक्ति के चैतन्य संप्रदाय में परकीया की मान्यता है। गोपियां लोकमर्यादा तोडकर रासलीला में भाग लेने जाती हैं। उनके पतियों को पति होने का मिथ्या आभास मात्र होता है।...सखी सम्प्रदाय की मान्यता है कि राधा श्याम की स्वामिनी है।...राधा यहां परमतत्व है।...इसमें सांख्यों की प्रकृति से जुडी मातृतंत्र की उन्मुक्त अवगुण्ठन रहित रति प्रमाद भावधारा जो लोकचेतना से लुप्त नहीं हो सकी है-सन्निहित है।पर पुरूष सत्तात्मक स्वरूप के हावी होने के साथ राधा भी कृष्‍ण की शक्ति यानि दासी मान ली गयी है। और परकीय भक्ति वाले चैतन्य कहने लगते हैं - मैं किसी ऐसे साधु का चेहरा नहीं देखना चाहता हूं जो किसी औरत को संबोधित करता है। मौसी और पुत्री के निकट भी नहीं बैठना चाहिए क्योंकि विद्वान पुरूष भी खुद सशक्त आवेगों के आकर्षण में आ जाते हैं। जबकि वही चैतन्य भागवतकथा वाचन के समय कृश्ण से बिछडी गोपियों के विरह से विह्वल होकर उन्मत्त होकर नाचने लगते थे।मतृसत्तात्मक ,जनजातीय स्त्रियों के स्वछंद आचरण को भी ब्रह्मणवादी विचारधारा के तह आत्मसात कर उसे विकृत रूप दे दिया गया। एक ओर स्त्री को पापयोनि घोषित किया गया दूसरी ओर इस घोषणा के लिये प्रयुक्त मंदिरों-मठों में देवदासी आदि प्रथा की आड में उनकी उन्मुक्त यौन व्यवस्था के अपने प्रोयोजित यौन व्यापार के लिये प्रयुक्त किया गया। देवदासी,वसावी, शालवादल,जोगिन,वेंकटसत्री आदि ऐसी ही कूप्रथाएं हैं। इसके तहत मंदिर के कर्मकांडी वातावरण में तैयार देवदासियों का अंत किसी रेडलाइट एरिया में होता है। डॉ सिंह लिखते हैं - पितृसत्ता,राजसत्ता,ईश्वरीय सत्ता की कृपाकांक्षा के मनोवैज्ञानिक विभ्रमों के द्वारा उन्हें श्रद्धा,भावमूलक भक्ति में बांध दिया गया।....किसानों,शिल्पियों,शूद्रों,स्त्रियों के लिये उन्मुक्त चिंतन के सब रास्ते बंद हो गये ओर ये लोग भाग्यवाद, संतोश, कर्मफल, आवागमन, मोक्ष आदि विभ्रमों के जाल में बंदी बना दिये गये।....भारतीय संस्कृति की शाश्वतता के गर्व की निर्लज्जता को धार्मिक ग्रंथों की प्रामाणिकता कूट एक मजबूत कवच प्रदान करता रहा।कौटिल्य का राजनीतिक दर्षन भी ब्राह्मण केंद्रित है। उनके अनुसार ब्राह्मण अपीडनीय है। शांति पर्व के अनुसार ब्राह्मणों अदंड्य है। वह सम्मान और दान का अधिकारी है।
सामंती समाज व्यवस्था को कायम रखने के लिये एक ओर तो ब्राह्मणों को उनके किसी भी कूकर्म के लिये पीडा और दंड से मुक्त रखा गया और उनके निठल्लेपन के लिये दान की व्यवस्था रखी गयी। इसके उलट हर अपराध के लिये अपराधी के आर्थिक दोहन हेतु प्रायश्चित की व्यवस्था की गयी। मनुस्मृति में प्रायश्चित पर 268 श्लोक हैं। अपराधों के लिये प्रायश्चित में दान-दक्षिणा की ब्राह्मणों द्वारा शुरू की गयी विष-बेल आज तक कैसे भ्रष्टाचार को पोशित करती रही है इसे देखा जा सकता है। आज भी मंदिरों में करोडों के चढावे के रहस्य को दान-प्रायश्चित के अंतरसंबंधों की रोशनी में परखा जा सकता है।
कौटिल्य ने शाासन चलाने के लिये नीतिगत तौर पर अंधविश्वासों के लिये जगह बनायी। आगे गुप्तोत्तर काल में अंधविष्वास सत्ता संचालन की बहुत बडी शक्ति थे। इस काल में ब्राह्मण राजमंत्रियों ने धर्मशास्त्र पर आधारित दो पुस्तकों,लक्ष्मीधर कृत कृत्यकल्पतरू और हेमाद्रि कृत वर्तुवर्गचिंतामणि की रचना की। अनुष्ठानों की भरमार वाले दर्जन भर पोथों के संकलन इन दोनों ग्रंथों में तीर्थयात्राओं,अतिचारों,प्रायश्चितों,मृतक संस्कारों तथा शुद्धियों से संबंधित विधानों की भरमार है। इनके आधार पर शासक वर्ग अंधविश्वासों से भरा शासन लादने में कामयाब रहा। यहां उल्लेखनीय है कि इन पुस्तकों की रचना के पच्चीस साल के भीतर ये दोनों राज्य मुसलमानों की अपेक्षाकृत छोटी सेनाओं द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिये गये। वर्तृवर्ग चिंतामणि के ब्राह्मण लेखक हेमाद्रि पर , जो दौलताबाद के यादव राजा रामचंद्र का मुख्यमंत्री था, राज्य व्यवस्था को कमजोर करने के लिये अलाउद्दीन खिलजी से घूस लेेने का आरोप था। डी डी कोसांबी-प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता।
ऐसा नहीं था कि खुद को ब्रम्हा के मुख से पैदा कराने वाले ब्राह्मणों में गरीब नहीं थे। पर बहुत चालाकी से जहां उच्च वर्गीय ब्राह्मण देवता के लिये सम्मान की व्यवस्था थी वहीं दलित ब्राह्मण के लये दान की। ताकि उनका क्षोभ मरता रहे। भूखमरी के शिकार ऐसे ब्राह्मणों की चर्चा दसवीं सदी के एक अभिलेख में भी है। पौरोहित्य से जीविका कमाने वाले ये गा्रामयाजक आम जनों व शूद्रों के लिये पूजा-पाठ करते थे।ये ब्राह्मण जीविकोपार्जन के लिये दूसरों की सेवा करने व उनका भोजन पकाने को मजबूर थे। आज भी ये दलित ब्राह्मण महाराज के रूप में जहां - तहां छात्रों के मेसों ,घरों में खाना बनाने का काम करत हैं। आदिवासी,जनजातीय क्षेत्रों पर अधिकार करते जाने के साथ उन्हें संस्कारित या भ्रष्ट करने के उद्देष्य से तत्कालीन शासक -सामंत उन क्षेत्रों में ब्राह्मणों को दान में भूमि आदि दिया करते थे। इन जमीनों में मंदिर-मठ आदि बनाकर जनजातियों को संस्कारित करने को धंधा चलता था। यहां हम मिश्नरियों के काम-काज के तरीकों को याद कर सकते हैं। जनजातियों के क्षोभ शमन के लिये ब्राह्मण नये नये रास्ते निकालते थे। घरों में तुलसी चौरे पर शालीग्राम पत्थर पूजने आदि की चली आ रही परंपरा इन जनजातियों के आत्मसातीकरण की एक झांकी है। पुराणकथाओं में तुलसी को लक्ष्मी करार दे दिया गया और काले पत्थर शालिग्राम को विष्णु पुकारा गया। यह जनजातिय टोटकों का ब्राह्मणीकरण था। जिन जनजातियों को वे लडकर जीत नहीं पाते थे उनके क्षेत्रों में ब्राह्मणों को बसाकर शूद्रों की या सेवकों की नयी जमात खडी करते जाते थे। इस तरह उच्च भू-धारी ब्राह्मण वर्ग पैदा हुआ जो घर-घर घूमकर पुरोहिती करने वाले श्रमिक ब्राह्मणों को तिरस्कार की निगाह से देखता था। खाना बनाने वाले महाराज-महाराजिनों से लेकर मरनोपरांत श्राद्ध कराने वाले महपातर ब्राह्मण तक को हम आज भी उसी दलित ब्राह्मण की श्रेणी में पडा पा सकते हैं।
इस तरह गुप्त काल और उसके बाद बडे पैमाने पर आम जनों व जनजातियों को शूद्र सेवकों में परिणत करने में लगे इन ब्राह्मण देवताओं का सहायक श्रीमंत वर्ग सत्ता पर काबिज होता गया। डॉ सेवासिंह लिखते हैं - श्रीमंत-वर्ग उपज का सारा अतिरिक्त हिस्सा हडप लेता था और किसानों के पास उतना ही छोडता था जितना खा पहनकर वे उस वर्ग के लाभ के लिये आगे भी मेहनत-मशक्कत करता रहे सके।...गावों में कृषि उत्पादन ओर दस्तकारी का कार्य ब्राह्मणों के हाथ में आ गया था।....दस्तकारों को ...अस्पृश्य इसलिये घोशित किया गया ताकि ... वे एकजुट ना हो सकें और इस तरह पवित्र भू-स्वामियों के हाथों उनका शोषण ... होता रहे।यूं ब्राह्मणों ने इन जनजातिय आदिवासियों को कई चीजें सिखाई भी। हल व खाद का प्रयोग व नक्षत्रों ,ऋतुओं के आवागमन की जानकारी दे उन्होंने खेती के विकास में योगदान दिया। नगरी सभ्यता के विनाष और सामंती ग्रामआधारित अर्थव्यवस्था के विकास को डॉ सिंह इन विकृतियों का पोशक मानते हैं। पुरों को नष्ट करने वाले पुरन्दर पुकारे जाने वाले इंद्र से लेकर बौद्धों के पतन तक नगरी सभ्यता के बिखराव ने इस सामंती व्यवस्था के लिये जमीन तैयार की। वे लिखते हैं - ...व्यापारिक और नागरिक उन्नति के दौर में ब्राह्मणेतर विचारधाराओं का बोलबाला रहा है। गृहसूत्रों में ब्राह्मण और क्षत्रियों के व्यापार-कार्य की ओर प्रवृत होने तथा रूपया उधार लेने-देने का व्यवसाय करने का निशे दर्ज है। बोधायन और वषिष्ठ के सूत्र कुसीदक,सूदखोर को महापातक की संज्ञा देते है। उनके अनुसार किसी विद्वान ब्राह्मण के हत्यारे से कहीं अधिक बडा पापी सूदखोर होता है।
बोधायन सूदखोर ब्राह्मण को शूद्र मानता है। व्यापार ,सूदखोरी के प्रति इस कडे रूख में अप्रत्यक्षतः उन ब्राह्मणेतर समुदायों की भर्त्सना निहित थी, जो वर्ण-व्यवस्था का विरोध करते थे।भारत में शंकराचार्य के बाद दार्शनिक गतिविधियों के लगभग अंत के लिये डॉ सिंह शंकर को ही दोषी मानते हैं। शकराचार्य ने शास्त्र प्रमाण को अंतिम मानते हुए तर्क को भ्रांतिपूर्ण कहा। श्रृतिसम्मत तर्क को ही मान्यता दी गयी। इस तरह श्रृति,वेद और वाचिक की परंपरा में रटंत विद्या के हवाले से जो कुछ ब्राह्मण व्याख्यायित कर देते थे वही श्रुति-वेद होता जाता था। इसी तरह रची गयी तमाम पुराण पच्चीसियों ने भारतीय मानस में कूढमगजी भर दी। इस तरह प्रत्यक्ष अनुभव से संबद्ध दर्शन औ तर्क का विध्वंस भारतीय विज्ञान के लिये घातक साबित हुआ। औषधि विज्ञान को इस तर्क विहीन ब्राह्मणी विचारधारा ने नष्ट ही कर दिया। तर्क के प्रति प्रतिबद्ध आयुर्वेद के ग्रंथ अप्रासंगिक होते गए। चिकित्सकों को भी अछूत की श्रेणी में डाल उसका छुआ अन्न ग्रहण करने की मनाही कर दी गयी। नतीजा आर्युवेद की परंपरा मरती गयी और आज हम अंग्रेजी चिकित्सा पर आश्रित दिखते हैं और विडंबना देखिए कि ब्राह्मण तो क्या देवता होते आज डाक्टर जरूर भगवान कहाते हैं।
दरअसल ब्राह्मणवादी आस्था ने जनमानस को ऐसा अंधा कर दिया है कि किसी भी उपलब्धि या ज्ञान को तर्क के आधार पर समझने की जगह हम उसे आंख मूंद भगवान मानने लगते हैं। वैदिक काल में तो ओदनम यानि कि भात और ओखल जिसमें धान कूटा जाता था वह भी देवता था पर आज भी हम रजनीश,संतोशी माता से लेकर सांई बाबा तक देवता पैदा करने से कहां बाज आ रहे, भले ही कुछ समय बाद ये देवता मर, बिला जाएं। इसी अंधआस्था को जान समझकर चिकित्सकों की बडी जमात आम जन से धन दोहन में लगी रहती है। जबकि वे भी अनुभवजन्य ज्ञान का प्रयोग कर रोजी कमाने वाले आम जन हैं। पर जो विशिष्टता बोध का औरा उनके चारों ओर घिरा रहता है वह प्रकरांतर से इसी विचारधारा का उपउत्पादन है।गौतम ,वशिष्ठ,मनु चिकित्सकों को अपराधी,व्यभिचारिणी,चोर,वेश्या आदि की कोटि में रखते हैं। मनु तो चिकित्सकों से प्राप्त अन्न को मवाद की तरह गंदा बताते हैं। धर्मशास्त्र ओर स्मृतिकार मात्र अंत्यजों को ही चिकित्सा कर्म की अनुमति देते हैं। संपूर्ण उपनिशद में किसी ऐसे ऋषि की चर्चा नहीं जो चिकित्सक हो,कहीं चिकित्साशास्त्र की ही चर्चा नहीं है। इसतरह हम भारतीय चिकित्साशास्त्र ,आयुर्वेद की दुर्गति में वैदिक विचारधारा की साफ भूमिका देखत सकते हैं। अनुभवजन्य,तर्काधारित प्रमाणों को शंकर अविद्या यानि की अज्ञान की श्रेणी में रखते हैं। जबकि चरक संहिता तर्क-वितर्क द्वारा दवाओं के चुनाव पर बल देती है। मनु तर्कशास्त्री का बोलकर अभिवादन करने की भी मनाही करते हैं। दंडवत तो खैर मात्र ब्राह्मण देवता के लिये ही आरक्षित रहा है। कर्म और अदृष्ट के प्रभाव को नकारने वाले आयुर्वेदाचार्यों और ब्रह्मगुप्त जैसे वैज्ञानिकों को इन ब्रह्मज्ञानियों के सामने घुटने टेकने पडे।ब्राह्मणवाद के वर्णमूलक समाज वैचारिक स्तर पर आत्मवाद को आधार बनाता है। यहां अजर,अमर आत्मा है,देह का अस्तित्व नहीं। जब जगत ही मिथ्या है तो फिर देह कहां रहे। इसलिये स्वधर्म के लिये बंधुओं को मारने में कोई दोश नहीं। यहां स्वधर्म का माने वर्णगत धर्म से है , जो आपके लिये ब्राह्मणों ने तय कर रखा है, न कि निजी धर्म से । यहां क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना। गीता के अनुसार युद्ध क्षत्रिय के लिये स्वर्ग का खुला द्वार है। क्योंकि मरने के बाद आत्मा परमब्रह्म में जा मिलती है, फिर देर कया। मरो-मारो और स्वर्ग जाओ।
इस तरह जनजातीय सहज आदिम भौतिकवाद का आत्मवाद में रूपांतरण होता गया। डॉ.सेवा सिंह लिखते हैं - ‘‘...हम ऋग्वेद से उपनिशदों में यही विकास पाते हैं। प्रकृति की शक्तियों की मूर्त भावना कुंठित हो जाती है और निश्चित चिंतन का युग शुरू हो जाता है।‘‘इसके तहत प्रकृति की शक्तियों के लिये देवताओं की प्रतीकात्मकता का त्याग कर दिय गया था। जिनके सामने ऋग्वैदिक ऋशि अज्ञात भय से नतमस्तक था। तत्कालीन अनेक विचारधाराओं की जुटान के बावजूद उपनिषद मूलतः आत्मज्ञान के प्रवक्ता हैं। यह आत्म या ब्रह्म ऐसा था जिसकी जानकारी कोई प्रयोगाश्रित ज्ञान नहीं दे सकता था। डॉ.सिंह लिखते हैं -‘‘भौतिक अनुभवों से विच्छिन्न शुद्ध ज्ञान का प्रार्दुभाव उन परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करता है, जिनमें उत्पादनशील श्रेणियों के अतिरिक्त उत्पादन पर काबिज होकर एक परजीवी वर्ग का उद्भव होने लगता है।‘‘
इस तरह श्रम की महत्ता घटती जाती है और प्रगति का श्रेय मस्तिष्क की कुशाग्रता को मिलने लगता है। ऐसे श्रमजीवी और परजीवी वर्गभेद वाले समाज में ही ऐसे आत्मवादी या प्रत्ययवादी दृष्टिकोण का उद्भवन होता है। बोधायन ने वेद और कृषि को परस्पर विरोधी कार्य बताया है। मनु भी आपातकाल में ब्राह्मण को वैष्य का व्यवसाय अपनाने की सलाह देते हैं पर कृषि कर्म को निकृष्ट धंधा कहते हैं। इस तरह ऋग्वेद में जो अन्न ब्रम्ह है उसे पैदाकरने वाले को मनुस्मृति निकृष्ट बना देती है।
आत्मवाद के वर्णमूलक सरोकार के वरक्स उसी दौर में बौद्धों का अनात्मवाद जनजातियों के दमन के खिलाफ समतामूलक सरोकारों के साथ सामने आ रहा था। बुद्ध का कथन है कि वह जो क्षणिक है, अश्रेय है और परिवर्तन के अधीन है, नित्य आत्मा नहीं हो सकता। सत्ताहीन पदार्थ , आत्मा , की प्राप्ति का उद्योग परम मूर्खता का सूचक है। आत्मा की जगह बुद्ध व्यक्तित्व को महत्व देते हैं। उनके अनुसार - रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पांच स्कंधों को मिलाकर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। बुद्ध के समकालीन चार्वाक और लोकायत भी शाश्वत आत्मा को नहीं मानते थे। चार्वाक के अनुसार देह का निर्माण अणु से हुआ , यहां कोई आत्मा नहीं, न पाप है न पुण्य।
आत्मा के साथ प्रतीत्यसमुत्पाद बुद्ध का मुख्य सिद्धांत है। इसके अनुसार उत्पत्ति न स्वतः होती है न बिना हेतुओं के ही, बल्कि वह प्रत्ययों के आश्रय से ही या उनके साथ ही होती है। यह एक द्वंद्वात्मक सिद्धांत है जो कहता है कि - इसकी उत्पत्ति से उसकी उत्पत्ति है। जन्म का कारण यह है कि अस्तित्व का लोप होता रहता है। बुद्ध कहते हैं कि हमें आदि और अंत के प्रश्नों को छोड देना चाहिए। निजी संपत्ति का भी बुद्ध के यहां निषेध है। एक सुत्त में बुद्ध कहते हैं - ‘‘ इस संसार में मैं देखता हूं कि धनवान लोगों ने जितनी वस्तुएं जमा की हैं....उसमें से वह कुछ भी दूसरों को नहीं देते .... राजा ने यद्यपि इस पृथ्वी के सभी राज्यों को जीत लिया हो .... तो भी उसी तृष्णा नहीं मिटेगी .... राजा और कई अन्य लोग अपूर्ण ईच्छाओं को लिये हुए काल के ग्रास बन जाते हैं....।
‘‘ब्राह्मणों के जन्मतः श्रेष्ठता के दावे को बुद्ध नकारते थे, वे देख रहे थे कि धन के बल पर किसी की भी सेवा प्राप्त की जा सकती थी। डॉ.सिंह लिखते हैं-‘‘वर्ण अवधारणागत सैद्धांति परिकल्पना रही है, जबकि जाति और कुल ठोस वास्तविक वर्गीकरण हैं।...बौद्धों का सामाजिक वर्गीकरण कुल आधृत .... व्यवसायगत है। जेसे नाई, लोहार,श्रमिक,कुम्हार...क्षत्रिय,ब्राह्मण,गहपति।‘‘ यह वर्गीकरण पेशागत है न कि मुंह और पैर से जन्म की कपोल कल्पना पर आधारित। लोगों की पहचान अर्थगत थी। अषोक के अभिलेख भी वैश्य और शूद्र का इस्तेमाल नहीं करते। इसकी बजाय वहां ‘इम्यां‘ शब्द का प्रयोग है। इसी तरह दास-भटक हैं। ये उत्पादन से जुडी कोटियां हैं न कि ब्राह्मणिक जातिगत कोटियां। बौद्ध धर्म ने चांडालों और पुक्कसों को भी निर्वाण के योग्य बताया है। ब्राह्मण ग्रंथों में पुक्कसों या निषादों को वर्णसंकर कहा गया है जबकि बौद्ध साहित्य के अनुसार मिश्रित विवाह से उत्पन्न बच्चों पर किसी नयी अछूत जाति को थोपने की जगह उन्हें माता-पिता में से किसी एक के समुदाय में शामिल कर लिया जाता था।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शूद्र और चांडाल को शिक्षा के अधिकार से ही वंचित रखा गया इसी कारण राम वेदपाठी शाम्बूक की हत्या करते हैं। वहीं जातक की एक कथा में चांडाल से जादू सीखने वाला ब्राह्मण जब उसे गुरू नहीं मानता तो जादू भूल जाता है। इसी तरह बोधिसत्व चांडाल अपने ब्राह्मण सहपाठी को शास्त्रार्थ में पराजित कर लात मारता है तो उसके अध्यापक उसकी निंदा करते हैं इसी तरह जैन धर्म में भी हरिसेन नामक चांडाल की कथा है जो एक ब्राह्मण को उपदेश देता है।
पर बौद्ध दर्शन की यह क्रांतिकारी भूमिका लंबे समय तक अपना यह तेवर बरकरार नहीं रख सकी। कारर्ण-कार्य के स्पश्ट सिद्धंात को परवर्ती बौद्ध शून्यवाद में ढाल देते हैं। उपनिषदों का रहस्यवादी आत्मवाद जैसे नये रूप में सामने आने लगता है। बौद्धों के इसीशून्यवाद के तत्वों को लेकर ही आगे शंकर अपने जगत-मिथ्या व अद्वैत वेदांत का सिद्धांत गठित करते हैं। ‘‘शंकर के दर्षन का पूरा ढांचा पारिभाशिकों के हेर फेर के साथ बौद्धों के शून्यवाद पर ही आधृत है।‘‘ परवर्ती वेदांती रामानुजाचार्य शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध कहते भी रहे हैं। ‘‘ बौद्धों की शून्यवादी और विज्ञानवादी विचारधाराओं के श्रोत ग्रंथ आखिर वेदांतिक उपनिषद ही थे।... ष्षून्यवाद में समस्त जागतिक सत्ता को अस्वीकृत करते हुए केवल एक मात्र शून्य को ही परमार्थ कहा गया है।‘‘ चंद्रकीर्ति का कथन है कि वस्तुओं के दो ही रूप हो सकते हैं - भाव और अभाव। जो वस्तु सदा वर्तमान रहती है वह भावरूप है, जो वस्तु विद्यमान नहीं रहती ,वह अभावरूप है। वस्तु का न भाव है न अभाव , इसलिये वह शून्य‘ कहलाती है....।
‘‘शून्य के रूप में जगत की निस्सारता प्रतिपादित करनेवाली तमाम महायानी युक्तियों को दार्षनिक आधार देने वाले नागार्जुन का निष्‍कर्ष था -‘‘तत्तत् प्राप्य यदुत्पन्नं नोत्पन्नं तत् स्वभावतः‘‘- अर्थात जो वस्तु किसी अन्य वस्तु पर निर्भर रहकर उत्पन्न हुई वह स्वयं उत्पन्न नहीं हुई अर्थात् उसकी कोई सत्ता नहीं। इसी तरह ‘प्रतीत्यसमुत्पाद‘ जिसका अर्थ था -‘प्रत्येक सत्ताशाली वस्तु कारण वाली है‘ को तोड-मरोड कर यह अर्थ दिया गया कि - ‘प्रत्येक वह वस्तु जो कारणवाली है, सत्ताहीन है।‘प्रतीत्यसमुत्पाद की इस शून्यवादी व्याख्या के बाद ईश्वर का निषेध करने वाले बुद्ध को ही ईष्वर बना दिया गया, वे भी अवतारी हो गये। महायानी ग्रंथों में बुद्ध के 24 अवतार हैं, जैनों में भी 24 तीर्थंकर हैं। आगे भागवत पुराण में भी वैष्ण्व अवतारों की संख्यां 24 मानी गयी।
ललित विस्तर के अनुसर बुद्ध मात्र जम्बूद्वीप में अवतरित होते हैं और वहां भी केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय कुल में। इस ब्राह्मणवादी बुद्ध का काफी प्रचार-प्रसार हुआ। मजेदार बात है कि बौद्ध मत के अधिकांश विद्वान अश्वघोष,नागार्जुन, आर्यदेव,असंग,बसुबंधु आदि ब्राह्मण थे। पुराणों में भी बुद्ध को विष्णु का नवम अवतार माना गया है।इसी तरह बौद्ध ,जैन की तरह वेदांतियों ने तमाम भारतीय दर्शन का ब्राह्मणीकरण कर दिया। डॉ.सेवा सिंह सवाल उठाते हैं कि प्रत्यक्ष,अनुमान आदि प्रमाणों और तर्कों का निषेध कर मात्र वेदों के प्रति आस्था और अनास्था के आधार पर दर्शनों का वर्गीकरण करने वाला वेदांत क्या कोई दर्शन है...। कौटिल्य के अनुासार भी वेदांत दर्शन नहीं मात्र ब्रह्मज्ञान का विषय है। ब्राह्मणिक दर्शन के अनुसार सांख्य,न्याय,योग,वेदांत,मीमांसा और वैशेषिक आस्तिक दर्शन हैं और लोकायत,बौद्ध,जैन नास्तिक।
कौटिल्य राज चलाने के लिये अंधविश्वासों का प्रयोग करना नीतिगत तौर पर सही मानते हैं। पर साथ ही वे चाहते हैं कि शासक तर्कशास्त्र और बुद्धिसंगत दर्शन में पारंगत हों न कि अंधविश्वासी। वे दर्शन के लिये आन्वीक्षिकी शब्द का प्रयोग करते हैं और तर्कबुद्धिबाद और धर्मनिरपेक्षता को दर्शन का अनिवार्य लक्षण मानते हैं। इसी अर्थ में वे मात्र न्यायवैशेषिक,सांख्य और लोकायत को ही दर्शन की कोटि में रखते हैं।न्यायवैशेषिक एक भौतिकवादी दर्शन है जो आत्मा को जड तत्व मानतो है और चेतना को कतिपय पदार्थों के संयोजन का परिणाम मानता है पर लोकायत के देहात्मवाद से यह खुद को अलग रखता है। लोकायतों के विरूद्ध न्यायवैशेषिक जयंत भट्ट,उदयन आदि शरीर से बाहर किसी आत्मा या चेतना की सत्ता सिद्ध करना चाहते हैं।संख्य दर्शन मूलतः अनीश्वरवादी और वेदों को ना मानने वाला था पर बाद में इसमें भी स्मृतियों की दुहाई जोड दी गयी। कपिल सांख्य के प्रर्वतक माने जाते हैं। सांख्य सूत्र व षष्टितंत्र आदि उनके ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं हैं। सांख्य के अनुसार आनुभविक जगत वास्तविक है। यह स्वभाववाद के निकट का दर्शन है। शंकर लोकायत और सांख्य को समान मानते थे।लेकायत लोक में प्रचलित विज्ञान,तर्कसम्मत व धर्मनिरपेक्ष विचारधारा थी जिसने कभी ब्राह्मणवाद के सामने घुटने नहीं टेके और नष्ट कर दी गयी। लोकायती चार्वाक स्वजनों और गुरूजनों की हत्या को आरोप लगा जब ब्राह्मणसमूह की ओर से युधिष्ठिर को मृत्यु का शाप दे रहा था तो ब्राह्मणों ने उसे पाखंडी कहकर जलाकर भस्म कर दिया था। लोकायत की कोई मूल रचना नहीं मिलती। इसके बारे में हम विरोधियों के यहां आए प्रसंगों से ही जान पाते हैं। बौद्ध ग्रंथ दीघ निकाय में लोकायत को शाश्त्र कहा गया है। दासगुप्त के अनुसार, यह लोकायती मत कि जन्म के बाद कोई जीवन नहीं और मृत्यु के साथ चेतना नष्ट हो जाती है, उपनिषद काल में स्थापित हो चुका था। उपनिषद् इसी मत का खंडन करते थे। लोकायत को ही आगे चार्वाक और फिर ब्राहस्पत्य दर्शन के रूप में ब्राह्मणवादियों द्वारा एक दानवी विचारधारा पुकारा गया। प्रबोधचंद्रोदया और श्रीहर्षनैषध में लोकायत वा चार्वाकों के मतों का वर्णन है। माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह में भी लोकायतों के छंदों का संग्रह है।
इस तरह हम देखते हैं कि ब्राह्मणवाद ने वेद विरोधी दर्शनों को या तो नष्ट किया या खंडन-मंडन कर आत्मसात कर लिया व दर्शन के नाम पर भाष्यों का अंबार लगा दिया। आयुर्वेद और चरक संहिता जैसे चिकित्साशास्त्र की तरह ब्राह्मणवाद के राहु-केतु ने भारतीय विज्ञान को भी ग्रस लिया था। नतीजा आजतक हम पश्चिम पर आश्रित हैं। सत्य को जानकर भी हमारे वैज्ञानिकों को ब्राह्मणिक मिथकों को आत्मरक्षा में ओढ लेना पडता था। इस पाखंड की चर्चा अलबेरूनी ने भी की है कि छठी शताब्दी में वराहमिहिर और सातवीं में ब्रह्मगुप्त जैसे खगोलशस्त्रियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक विश्लेषण कर डाला था पर धार्मिक दबाव में उन्होंने राहु और केतु जैसे दैत्यों की अवधारणा को भी आत्मरक्षा में स्वीकार कर लिया था। इसी तरह आर्यभट्ट का भूभ्रमणवाद एक क्रातिकारी सिद्धांत था जिसे नष्ट करने का पूरा प्रयास ब्राह्मणिक परंपरा ने किया था। गुणाकर मूले के अनुसार आर्यभट्ट पहले भारतीय थे जिन्होंने नक्षत्रलोक को स्थिर और पृथ्वी को अक्ष पर पष्चिम से पूर्व घूमता बताया था। इस तरह पांच महाभूतों की जगह आर्यभट्ट ने चार महाभूतों को ही माना था। पांचवें तत्व आकाश को उन्होंने नहीं माना था। ध्यान देने की बात है कि लोकायत आदि नास्तिक मत के प्रणेता भी चार ही भूत मानते थे – मिट्टी,जल,अग्नि व वायु।विचारधारा के इस दबाव को हम चरक व सुश्रुत संहिता पर भी स्पष्ट देख सकते हैं। एक ओर तो चरक संहिता में गया और ब्राह्मण को पूज्य माना गया है वहीं चरक में गोमांस को वातरोग,पीनस,ज्वर,खांसी आदि में हितकारी भी बताया गया है। धर्मशस्त्रों के अनुसार चिकित्सक ब्राह्मण और वैष्य स्त्री से उत्पन्न जारज संतानें थे जिन्हें अंबुष्ट पुकारा जाता था। अंबुष्टों को दान देने की मनाही थी - भीष्म:अनुशासन पर्व।
चिकित्सकों की यह दयनीय स्थिति ऋग्वेद में नहीं थी। उसका एक पूरा सूक्त औषधि की प्रशंसा में है जिसमें औषधि को मातृरूप कहा गया है और चिकित्सक को गौ,अश्व,वस्त्र आदि देने की बात कही गयी है। पर यजुर्वेदें चिकित्साकर्म की निंदा आरंभ कर दी गयी थी।ऋग्‍वेद के सम्माधनित चिकित्सखक देवता अश्वसनी कुमार का सम्मांन अब कम हो गया था। दरअसल चिकित्स क आम जन से जुड जाते थे। उनका पेशा ही ऐसा था कि लोगों को छूना पडता था। इस तरह आम लोगों को छूकर जीविकोपार्जन करने वालों को मनुस्म्रिति और धर्मसूत्र अपने यहां कैसे जगह दे सकते थे। मनुस्म्रिति ,गौतम व विष्णुा धर्मसूत्र में आम जनों-स्त्रिों के लिये यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों से बाकी श्रेष्ठय ब्राह्मणों को दूर रखने को कहा गया है। वसिष्ठत का कहना था कि वेदों का ज्ञन न रखने वाले द्विज को ब्राह्मण नहीं माना जा सकता। मनु के निषिद्ध कर्म में शिल्परकारी, मजदूरी, पशुपालन, दुकानदारी, खेती के अलावा विद्यार्जन भी शामिल है। यहां विद्यार्जन का मतलब वेद के अलावे किसी भी तरह की विद्या के अर्जन से है। शंकर के अनुसार अनुभवजन्यप-तर्काधारित प्रमाण अविद्या या अज्ञान है। जबबकि चरक संहिता में बुद्धि व तर्क के आधार पर औषधि चयन की बात कही गयी है। इसके उलट कठोपनिषद में तर्क से प्राप्त् बु‍द्धि का निषेध है। एक जमाने में भारत की कीर्तिपताखा दुनिया भर में फहराने वाले बौद्धों, जैनों पर अंतिम चोट, छठी शताब्दी् के बाद के, आलवार संतों के भक्ति आंदोलन ने किया था। तिरूनुमुर गांव का निवासी अप्पायर अपनी बहन के प्रभाव में शैव बना फिर उसके प्रभाव में जैन सम्राट महेंद्रवर्मन शैव बना और उसने तमाम जैन मंदिरों को तबाह कर उन्हेंप शैव मंदिरों में बदल डाला। सुंदर भक्ति पदों की रचना करने वाले तिरूमंकई ने भी बौद्ध,जैनों के खिलाफ लगातार जहर उगला। कहा जाता है कि शैव संत तिरूज्ञानसंपंतर के प्रभाव में पांड्या सम्राट ने अस्सी हजार भिक्षुओं का वध करवा दिया था। यही वह दौर था जब शैव मठ की स्था्पना भारत भर में की गयी। शंकर ने अपने जीवन में ही चारों मठों की स्थांपना कर दी थी। ये मठ शक्ति और सत्ता के नये सामंती केंद्र थे। कुछ मठों के अधिकार में सैकडों गांव थे जो मठों के लिये अन्न ,कपडे़ व मजदूर की व्य वस्था करते थे। दसवीं सदी में नाथ मुनि ने अलवारों के पदों का संकलन ‘प्रबंधम्’ नाम से किया। नाथ के पोते यमुनाचार्य ने इन्हें ‘दिव्यभ प्रबंधम्’ की संज्ञा दी। आगे यही ‘प्रबंधम्’ चार तमिल वेद कहलाए। यमुनाचार्य की मौत के बाद वैष्ण वों के दो खेमे हो गये‍ जिनमें तमिल और Sanskrit की जगह तमिल वेद को ही सर्वोपरि मानते थे। तमिल के पक्षधर टेंकलई कहलाए जबकि Sanskrit वाले वडकलै थे। वडकलै Sanskrit और तमिल दोनों वेदों को प्रमाण मानते थे। इनमें दार्शनिक मतभेद भी थे। टेंकलई बस भगवतशरण में चले जाने को ही मोक्ष का उपाय मानते थे जबnकि वडकलै के अनुसार शरणागत होना काफी नहीं, मोक्ष के लिए कर्म भी करना होता है। वर्ण की द्रिष्टि से देखें तो बारह आलवार संतों में मात्र दो ही शूद्र थे। शूद्रों का मंदिर में प्रवेश वर्जित था सो ये शूद्र संत भी कभी अपने आराध्यण के दर्शन नहीं कर पाते थे। शूद्र संत नाम्मांलवार ने इसकी चर्चा भी की है कि ब्राह्मणों के माथे का तिलक देखकर ही उन्हें संतोष करना पडता था। आलवारों ने गीता और पुराण की ब्राह्मणी विचारधारा को गीतों के माध्याम से जन-गण में स्थादपित कर दिया। आलवार कवि मधु के अनुसार गुरू नाम्मांलवार ने वेदों के रहस्या को अपने ग्रंथ में भर दिया है। विडंबना देखिए कि वेदों के रहस्य को तमिल में लाने का श्रेय पाने वाले नाम्मा वलार को भी मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता था और गुलामी ऐसी कि पंडितों के सिर का टीका ही दूर से ही देखकर उन्हें संतोष करना होता था। धीरे – धीरे प्रबंधम के गायन ने वेदपाठ को विस्थाीपित कर दिया।
डॉ सिंह के अनुसार आलवारों के भक्तिगीत ही संस्‍थाबद्ध रूप से भागवतपुराण का विषय बने। भागवत के अनुसार कृष्‍ण ही वेदों के मूल कारण हैं। भागवत ने कृष्‍ण के सगुन रूप्‍ा में प्रति भक्ति का प्रसार किया। उनकी देह और अंग-प्रत्‍यंग पूजनीय हो उठे। रासलीला के इस आत्‍मसातीकरण में स्‍त्री को एक बार फिर महत्‍व मिला। यह सब ब्राहमणवाद के नीतिगत कार्यकलाप थे। भागवत के अनुसार भक्ति उनलोगों के लिये है जो वेदअध्‍ययन के अधिकारी नहीं। इस तरह शुद्रों ,स्त्रियों,श्रमिकों की मनु व वर्णधर्म आदि में आस्‍था पैदा करने की सफल कोशिशें की गयीं।
इस तरह आठवीं शताब्‍दी में जब भागवत आम जन को अपनी जद में ले रहा था , शंकराचार्य भक्ति को दार्शनिक आधार दे रहे थे। मनु को शंकर ने अपनी स्‍थापनाओं के लिए आधार की तरह प्रयोग कर द्विज और शूद्र की कोटियां प्रस्‍तावित कीं। यूं इस वेदांती परंपरा के भीतर शैवों और वैष्‍णवों के सांप्रदायिक झगडे कम तीखे नहीं थे। स्‍मृति चंद्रिका में शैवों को बौदधों के साथ अछूत की श्रेणी में रखा गया है। ज्ञान पर अधिक जोर देने वाले शंकर के अद्वैत वेदांत को वैष्‍णव आचार्य रामानुज भक्ति में बाधक मानते थे। शंकर के अनुसार ब्रम्‍ह सत्‍य है ओर जीव उसका आभास है, वह ब्रम्‍ह के ही सामान है। पर रामानुज के अनुसार जीव अणु और क्षुद्र है पर ब्रम्‍ह महान है। शंकर के लिये जगत मिथ्‍या है पर रामानुज के लिये वह सत्‍य है । आगे मध्‍वाचार्य ने ब्रम्‍ह की सत्‍ता को जगत से अलगाते हुए दोनों को स्‍वीकार किया था। शंकर अद्वैत थे माध्‍व द्वैत।
11वीं सदी में तैलंग ब्रम्‍हण निम्‍बार्क ने इन दोनों से आगे का सिदधांत दिया। वे ईश्‍वर तथा जीव और जगत में भेद भी मानते थे और अभेद भी। वे द्वैत-अद्वैत दोनों को मानते थे। पर ये मतभेद मूलगामी नहीं थे। वैष्‍णवों का विरोध नगरों के उन व्‍यापारिक केंद्रों पर कब्‍जे को लेकर था जिस पर शैव काबिज थे। जबकि वैष्‍ण्‍वों का प्रभाव ग्रामीण इलाकों में था, जहां ब्राम्‍हण सामंत आदिवासी क्षेत्रों में कृषि-भूमि का विकास कर रहे थे। आगे शंकर के मठ बौदध विहारों का स्‍थानापन्‍न करते गए। विहारों से निष्‍कासित भिक्षु जीविकोपार्जन के लिए जनजातीय गुहयाचारी ,तांत्रिक कर्मकांडों की ओर प्रवृत हो रहे थे, जिसे आलवार भक्‍त-संत बौदधों के पतन के रूप में देख अपने गीतों में उसे दर्ज कर रहे थे। यह पतन व्‍यपार अर्थव्‍यवस्‍था पर कृषिव्‍यवस्‍था की विजय थी। निरीश्‍वरवाद पर ईश्‍वारवाद तरजीह पा रहा था। आत्‍मनिवेदक और अनुकंपा आधारित दयनीयता भक्ति का अधार बन रही थी। इसमें सामंती दमन का प्रतिबिम्‍ब देख जा सकता है।
गौडपाद की मांडूक्‍यकारिका शंकर के मायावाद का बीज ग्रंथ है। इसमें उपनिषदों ,मांडूक्‍य, वृहदारण्यकों की अद्वैतवादी व्‍याख्‍या है। गौडपाद ने जगत को माया और स्‍वप्‍न की तरह काल्‍पनिक माना है। उनके अनुसार जैसे स्‍वप्‍न में हम पदार्थों को अस्तित्‍वमान पाते हैं, पर वे होते नहीं हैं, वैसे ही जागने पर भी जो पदार्थ सत्‍य प्रतीत होते हैं वह होते नहीं हैं। वह माया के कारण सत्‍य प्रतीत होती है,ऐसे ही जगत भी स्‍व्‍प्‍न्‍ मात्र है। शंकर से पहले बौदध शून्‍यवादी ऐसी ही व्‍याख्‍या कर चुके थे।
इस तरह भक्ति , परमगति,मोक्ष आदि की वेदांती धारा ने उत्‍पीडितों के प्रतिरोध को तबतक उभरने नहीं दिया जब-तक कि तुर्क हमलों और उनके सामा‍जार्थिक परिवर्तनों ने सामंतीय व्‍यवस्‍था को शिथिल नहीं कर दिया। आगे कबीरादि संत कवियों ने अस्‍पृश्‍यता के जाल को तार-तार किया।इन संत भक्‍त कवियों के उदभव व भूमिका पर हिन्‍दी साहित्‍य के आलोचकों में मतभेद रहा है। जहां रामचंद्र शुक्‍ल ने भक्ति आंदोलन का कारण हिन्‍दुओं पर मुसलमानों के अत्‍याचार को माना है वहीं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसका खंडन करते हुए कहा कि – मुसलमानों के अत्‍याचार के कारण यदि भक्ति की भावधारा को उमडना था तो पहले उसे सिन्‍ध में और फिर उत्‍तर भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर वह हुई दक्षिण्‍ में। उधर जार्ज ग्रियर्सन इस आंदोलन को ईसाईयत की देन कहते हैं। उनका तर्क है कि दूसरी-तीसरी शताब्‍दी में मद्रास में जो नेस्‍टोरियन ईसाई आ बसे थे, जिनकी संगत से रामानुजाचार्य को भावावेश व प्रेमोल्‍लास की धार्मिक भावना का पता चला था उन्‍हीं के प्रचार-प्रसार ने भक्ति को बढावा दिया। आचार्य द्विवेदी ने ग्रियर्सन के मत का भी खंडन किया था , उनके अनुसार - इसका कारण उस काल की लोक-प्रवृति का ठोस शास्‍त्रसिदध्‍ आचार्यों और पौराणिक ठोस कल्‍पनाओं से युक्‍त हो जाना था।उपरोक्‍त मतभेदों की चर्चा करते हुए पहल के इतिहास अंक 43-44 में प्रकाशित भक्ति-आंदोलन.. पर अपने आलेख में – लल्‍लन राय लिखते हैं – वास्‍तविकता यह है कि कबीर आदि निर्गुण संतों और प्रेमोल्‍लास में लीन सूफी संतों दवारा उत्‍तर भारत में जिस भक्ति-आंदोलन का सूत्रपात हुआ ,उसमें हिन्‍दु-मुस्लिम सामंतवादी तत्‍वों के विरूदध निम्‍नवर्गीय साधारण हिन्‍दू-मुस्लिम आम जनता का विक्षोभ व्‍यक्‍त हुआ है। कबीर लिखते हैं – हमरा झगडा रहा न कोउ,पंडित मुलां छाडे दोउरज्‍जब भी हिन्‍दू ओर तुर्क दोनों के त्‍याग की बात करते हैं।
संत कवियों में अधिकांश दलित जातियों से थे। संत कबीर जुलाहा थे तो दादू धुनियां, धर्मदास बनियां,बषण मिरासी,भीषण महापात्र,बूला साहब कुर्मी,दीन दरवेश लोहार,दरिया मुसलमान,चरणदास,साहजोबाई ओर दयाबाई वैश्‍य,सधना कसाई थे तो ललदेदू मेहतर और संत नामदेव छींपी थे।
 ब्राहमणिक विचारधारा में जहां तमाम श्रमिक को शूद्र की कोटि बनाकर उसमें डाल, शोषण की अनंत चक्‍की में पिसने को डाल दिया गया था, वहीं संत कवियों ने शूद्रों के मानवाधिकार को ही ईश्‍वर आस्‍था की कसौटी प्रमाणित कर दिया था। नानक ने कहा – जिथे नीच समालीअनि तिथे न‍दरि तेरी बखसीस। मतलब जहां निम्‍न वर्ग के लोगों की देख-भाल होती हो वहीं ईश्‍वर की कृपा हो सकती है। इन संतों का सारा जोर कर्म पर है। नानक अंति निर्णायक करणी को बताते हैं। जबकि तुलसी हैं कि कोई कर्म कर राम नाम रट कर उससे मुक्ति की आशा करते हैं – उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्‍मीकि भए ब्रहम समाना। तुलसी के इस आचरण पर सेवा सिंह को गहरी आपत्‍ती है, क्‍योंकि इस तरह तुलसी वाल्‍मीकि के कर्मशील , साधक व्‍यक्त्त्वि को ओछा कर देते हैं।
डॉ सेवा सिंह सिंधु घाटी सभ्‍यता को असुरों की सभ्‍यता मानते हैं, वैदिक आर्यों ने इसी सभ्‍यता वाले नगरों का विनाश किया था। ऋग्‍वेद में असुरों के नगर को हरियूपिया लिखा गया है, विदवानों के अनुसार यही हडप्‍पा संस्‍कृति थी। उनका निष्‍कर्ष है कि छठी शताब्‍दी के बाद के किसान ,श्रमिक , शूद्र वास्‍तव में असुर और जनजातियों के लोग थे ओर तमाम वर्णवादी दबावों के बादभी मौर्यकाल तक उनकी विचारधारा बरकरार थी। कलिंग युदध को वे जनजातीय लोगों को दास बनाने के लिए अशोक दवारा थोपा गया युदध मानते हैं। कलिंग में हुए जनजातीय प्रतिरोध के फलस्‍वरूप ही अशोक को धर्मनिरपेक्ष व नैतिक सिदधांत धम्‍म का प्रावधान करना पडा। यह जनजातियों को उदारतापूर्वक मुख्‍यधारा में लाने का एक प्रयास था। आगे धम्‍म के विघटन के बाद बौदधों के समता मूलक दृष्टिकोण पर ब्राहमणवादी वर्णवादी विचारधारा का वर्चस्‍व्‍ स्‍थापित हुआ। इस विचारधारा ने जनजातियों को बडे पैमाने पर दास बनाया और उनके श्रम के शोषण के लिए निष्‍काम कर्म और कर्मफल के रूप में शूद्र जाति में जन्‍म को इस तरह दलित-विजित जातियों के दिमाग में पैबस्‍त किया गया कि वे कभी खुलकर बडा विद्रोह ना कर सकें।
19वीं शताब्‍दी के औपनिवेशिक शासन में भी किसानों और शिल्पियों का दमन हुआ था। मैकाले ने ऐसा वर्ग तैयार करने की बात की थी जिसका रंग हिन्‍दुस्‍तानी हो पर सोचने का ढंग अंग्रेजी हो। डॉ.सिंह लिखते हैं – बांटो और राज करो की औपनिवेशिक कूटनीति के अनुरूप इस नये उदीयमान वर्ग बिचौलिए,नवधनाढय का पुनर्जागरण – हिन्‍दू पुनर्जागरण,मुस्लिम पुनर्जागरण अथवा सिख पुनर्जागरण आदि की विभाजकताओं को जन्‍म देते हुए हिन्‍दू ,मुस्लिम आदि की विशेषीकृत लाक्षणिकताओं को पृथकतावादी विशिष्‍ठताओं में परिभाषित करने की विचारधारात्‍मक सामग्री प्रदान करता थ। ... राष्‍ट्रीय आंदोलन का इतिहास हमारे समय के धीरे-धीरे किन्‍तु दृढ रूप से सामप्रदायिक होने का इतिहास भी है।
1803 में पैगंबर और इलहाम जैसी अतार्किक बातों का तीखा निषेध करने वाले राज राममोहन राय 1815 में हिन्‍दू धर्म की सर्वोत्‍कृष्‍ठता सिदध करने में लग जाते हैं। और वेद उनके लिए आपौरूषेय हो जाते हैं। ईश्‍वरचंद विदयासागर भी विधवा विवाह के पक्ष में लेखनी तब उठाते हैं जब उन्‍हें इसके लिए शास्‍त्रों में प्रमाण मिल जाते हैं। विवेकानंद भी रामकृष्‍ण के सार्वभौम को उलटकर हिन्‍दू सार्वभौम कर डालते हैं। मुसलमानों का काल विवेकानंद,राममोहन राय और बंकिमचंद्र के लिए समान रूप से अंधकार का युग हो जाता है। वे भूल जाते हैं कि जब तुलसीदास रामराज्‍य का संकल्‍प पेश कर रहे थे अकबर संत कवियों की वाणियों की पृष्‍ठभूमि में दीन-ए-इलाही का विचार पेश कर रहा था। संतों की तरह दीन ने धर्म के संस्‍थाबदध स्‍व्‍रूप को एक सिरे से नकार दिया था। अपने ग्रंथ तबकाते शाहजहांनी में मुहम्‍मद सादिक अकबर पर आरोप लगाते लिखता है -... अंतिम दौर में अकबर बादशाह मत इस्‍लाम के मार्ग से हट गया और उसने सब हिस्‍सों से रहस्‍यवादियों और धर्मवेत्‍ताओं को बुलवाया और दंड दिए।
कार्ल मार्क्‍स से लेकर इतिहासकार एच.एच.विल्‍सन तक सभी अंग्रेजों दवारा देशी उदयोग को तबाह कर करोडों भारतीय बुनकरों की रोजी छीनने को बडे अन्‍याय के रूप में माना है। डॉ.सिंह लिखते हैं- औपनिवेशिक दखल से पहले जातिगत भेदभाव के बावजूद भारत का जन सामान्‍य किन्‍हीं विशेषीकृत धार्मिक पृथकताओं से एकदम अनभिज्ञ रहा है।... ...1857 का स्‍वतंत्रता संग्राम, कूका आंदोलन, गदरी बाबों का विद्रोह,जालियांवाला बाग कांड... में जन सामान्‍य की शमूलियत के तहत धर्मनिरपेक्षता का तत्‍व विदयमान रहा है। मुगल सत्‍ता की टूटन को वे सत्‍ता का विखंडन मानते हैं, न कि बिखराव। आगे विल्‍फ्रेड स्मिथ, राइजनर व के.एम.अशरफ दवारा जाटों ,सतनामियों सिखों व मराठों के विद्रोह में सामंत विरोधी किसान तत्‍व की उपस्थिति दर्शाने की ओर भी वे ध्‍यान दिलाते हैं। इस संदर्भ में आज के दौर के भूमंडलीकरण की नई उपनिवेशवादी जकडबंदी ,नवब्राहमणवाद के पुनर्गठन के तहत, पहले से भी अधिक क्रूर अमानवी और असंवेदनशील सिदध हो रही है।
डॉ.सिंह का निष्‍कर्ष है कि – भारत की सामंतीय, औपनिवेशिक ,नवउपनिवेशिक सत्‍ताओं के लिए एक सांस्‍कृतिक उपस्‍कर के रूप में ब्रहमणवादी विचारधारा सबसे कारगर और निर्णायक सिदध हुयी है। बौदधों ,लोकायतों के लंबे अंतराल के बाद केवल तुर्क काल ऐसा कालखंड है जब कबीरआदि संतों ने सचेत रूपा से इस विचारधारा के विरूदध प्रतिरोध की परंपरा को नये सिरे से एक सैदधांतिक आधार प्रदान किया है।इस नवउपनिवेशवादी सत्‍ता और वेदांत के गठजोड का हालिया नमूना देखना हो तो हम गुजरात के बाद सत्‍ता के दूसरे रोल मॉडल बनते बिहार में चल रहे विमर्शों को देख सकते हैं। इस सत्‍ता के पैरोकार अंग्रेजी के लोकप्रिय लेखक चेतनभगत बिहार आकर सुशासन पुरूषों की पीठ थपथपाते कहते हैं कि कहीं का विकास देखना हो तो आप वहां आधी रात को हवाई जहाज से पहुंचें और हवाई अडडे पर झिलमिलाती रोशनियों के आधार पर आकलन करें कि चमक कितनी बढी है। दूसरी ओर इस सुशासन में सड और सूख रही गंगा के तट पर वेदांतियों दवारा आरंभ की गयी गंगा आरती के तुमुल नाद का आकलन कर सकते हैं। इस तरह यह दूसरा उलूक विकास भी रात्रि में ही दृष्टिगोचर होने वाला है। पटना स्‍टेशन पर नवनिर्मित बौदध स्‍तूप की चमक-दमक भी रात में ही ज्‍यादा दीखती है पर इसकी दीवार के दूसरी ओर स्थित टैंपो स्‍टैंड पर अगर आप रात में उतरें आपका हर कदम कीचड और मूत्रगंगा में ही पडेगा। पर उधर वाले इधर कदम डालेंगे ही क्‍यों , स्‍तूप के गर्भगृह में निश्चिंत हो विकास की शवसाधना कर सकते हैं वे। 
मंतव्‍य में प्रकाशित

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