कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 18 नवंबर 2018

‘सामाजिक परिवर्तन में बाधक हिन्दुत्व’ दलित चिंतक एच एल दुसाध

  ‘सामाजिक परिवर्तन में बाधक हिन्दुत्व’ दलित चिंतक एच एल दुसाध का दुसाध प्रकाशन से आया हजार पृष्ठों का ग्रंथ है। श्री दुसाध पत्रकारिता को समर्पित अकेले ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने राजनीति, साहित्य, फिल्म, क्रिकेट, दूरदर्शन, धर्म, भू-मंडलीकरण, शिक्षा और अर्थनीति जैसे तमाम विषयों की दलित नजरिये से विवेचना की है। यह विवेचना सभ्यता और संस्कृति के सवालों को दलित संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने का तर्कसम्मत प्रयास है। दुसाध के दलित चिंतन की आधुनिक कसौटी सहज ही वर्ण व जाति के अस्वीकर के साथ धर्म को खारिज करती है। दुसाध की आधुनिकता यहां लोहिया की तरह नेहरू की आधुनिकता से टकराती है और गांधी को दलित संदर्भ में ज्यादा प्रासंगिक पाती है जिन्होंने 1932-33 में आजादी के आंदोलन क ो विराम देकर कांग्रेसियों को दलितोद्धार जैसे रचनात्मक कार्यों में लगने को कहा था और जिससे नेहरू चिढ़ गए थे, जिसकी चर्चा उन्होंने अपनी आत्मकथा में की थी।
अब अगर गांधी का दलितोद्धार नेहरू को चिढ़ाता है तो नायपाल को भी गांधी अपढ़ और कुछ भी सोचने के अयोग्य लगते हैं। नायपाल के  अलावा अमर्त्य सेन, क्रिकेटर कालीचरण, रोहन कनाई आदि भारतीय मूल के लोगों के  प्रति श्रद्धा पर दुसाध अपनी दलित जमात से भी सवाल करते हैं कि - अगर हिन्दुओं को भारतीय मूल के प्रति श्रद्धा में वतन खिलाफी नहीं दिखती है तो भारतीय मुसलमानों के इमरान खान, वसीम अकरम, मो. अली आदि के प्रति दिवानगी में देशद्रोहिता की बू क्यों आती है?
रामविलास शर्मा के अतिरिक्त परंपरा प्रेम पर नामवर सिंह आदि ने भी उंगली उठाई है। दुसाध का भी उनसे सवाल है कि उस परंपरा में दलित की जगह कहां है? दलितों पर अंग्रेजी राज के स्वागत का इलजाम लगाने वालों के संदर्भ में दुसाध का  कथन है कि - अंग्रेजों का दोष यही था कि वे इस देश में बहुत देर से आये और बहुत जल्दी चले गए। पुस्तक की भूमिका में दुसाध के कथनों पर तार्किक सहमतियां प्रस्तुत करने वाले वीर भारत तलवार यहां भारतेन्दु समेत 19 वीं सदी के हिन्दी लेखकों - पत्रकारों द्वारा किए गए अंग्रेजों के गुणगान की वजह पूछते सवाल करते हैं कि फिर अपने लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने वाले और मनुवादी कानूनों को खत्म कर समान नागरिक कानून बनाने वाले अंग्रेजों को दलित - शूद्र अपना हितैषी क्यों न मानते? श्री तलवार भूमिका में सवाल उठाते हैं कि - जो द्विज समाज करोड़ों दलितों-शुद्रों को स्वाधीन करने को तैयार नहीं था, उसे अंग्रेजों से स्वीधनता मांगने का क्या हक था?
तमाम समसामयिक सवालों पर दुसाध का अपना स्वतंत्र नजरिया है, दलित ही दलित लेखन कर सकता है जैसे मुद्दे पर अलग ढंग से  सोचते हुए दुसाध पूछते हैं कि सवर्ण लेखक दलित साहित्य क्यों नहीं लिखते?
चंद्रभाान प्रसाद द्वारा पेश डाइवर्सिटी के सिद्धांत की वकालत करते दुसाध फिल्म, मीडिया व अन्य तमाम क्षेत्रों में दलितों की उपस्थिति दर्ज कराना जरूरी समझते हैं। वे फुले, पेरियार, आंबेडकर की परंपरा में कांशीराम को रखते कहते हैं कि कांशीराम ने अधिकार चेतना से शून्य शिक्षित दलितों में सत्ता हासिल करने की अकांक्षा पैदा की।
पुस्तक में सैकड़ों मुद्दों पर दुसाध अपने स्वतंत्र, आधुनिक नजरिये से विचार करते हैं, जो हमें आत्मालोचना का सबक देते हैं। कुछ मुद्दों पर आत्मलोचना की जरूरत उन्हें भी है। यह सवाल तो है कि दलित कोई सामूहिक नेतृत्व विकसित करने की बजाय क्यों संघ गिरोह से अवसरवादी राजनीति गठबंधन कर खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हालांकि इन गठबंधनों ने यू. पी. में ही ब्राह्मण बचाओ टाइप खुदरा आंदोलन खड़े कर दिए हैं और परशुराम जैसे हिंसक प्रतीक को अपनाने की मजबूरी ब्राह्मणों में पैदा कर दी है। यहां ब्राह्मणों की दयनीयता दिखती है, अवसरवाद के खेल में सांस्कृतिक तौर पर वे पहली बार मात खा रहे हैं पर अवसरवाद के आसान ब्राहमणवादी तौर-तरीकों से दलितों को भी बाहर निकलना होगा। कुल मिलाकर सामाजिक संदर्भ में हिन्दुत्व की नकारात्मक भूमिका को पुस्तक सफलतापूर्वक स्थापित करती है।

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