कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 28 अक्तूबर 2018

जो नहीं मिला, उसे पाने की कोशिश में सर्वोत्तम रचना - कैलाश मनहर

"परस्पर अर्थों को अन्तिम सीमाओं तक समझते हुये/एक-दूसरे के स्पर्श तक की इच्छा नहीं करते थे" (द्रोपदी के विषय में कृष्ण) कवि विष्णु खरे की पंक्तियों को उध्दृत करते हुये कुमार मुकुल अपनी काव्य कृति "एक उर्सुला होती है" की शुरुआत करते हैं,जिस में अनुक्रम के अनुसार लगभग अठ्ठावन कवितायें हैं किन्तु जब इन कविताओं को पढ़ना शुरू करते हैं तो ये अलग अलग कवितायें नहीं बल्कि किसी प्रबन्ध काव्य की तरह समान धरातल पर बनती रचना-प्रक्रिया से जन्मी कवितायें प्रतीत होती हैं |
"यह लिखते 
कितनी शर्म आयेगी
कि मैनें
कष्ट सहे हैं...
मुझे जीवन
ऐसा ही चाहिये था...
अपने मुताबिक.....
अपनी ग़लतियों से
सजा-धजा"  
अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं को स्वीकारते हुये एक भरे-पूरे मनुष्य की संवेदनाओं को स्पष्ट अभिव्यक्ति देती है |    
अमरता को एक श्राप मानते हुये कवि जीवन की रहस्यमयता को नकारते हुआ प्रेम की तन्मयता और आत्मीयता की रौशनी में क्षितिज पार के दृश्य में जीवन देखता है तो प्रेम के चरम तक पहुँचने का प्रयत्न करता है और अपना स्वप्न अपने प्रेम की आँखों में पलते देखना चाहता है |    
 "हाथों में हाथ डाले" कवि चाँद-तारों तक चले जाने के बाद भी यथार्थ की धरती को ही अच्छी मानते हुये "प्यार" की अमृत बूँद के समुद्र हो जाने पर सब कुछ डूब जाने की चिन्ता व्यक्त करता है और यादों में खोते हुये बड़ी सहजता से
"यूँ तो 
चाँद है 
सितारे हैं
पर
यादों से 
सब हारे हैं" 
कहते हुये आम जन की तरह भावुक भी हो जाता है | "तुम्हारी ट्रेन चली जा रही है" में प्रेम के रक्तिम हाथ ट्रेन रोकने के लिये नहीं "वे बस हिल रहे हैंइस खुशी में कितुमने इन हाथों का दर्द समझा" तो फिराक़ याद आते हैं ऐसे विदा के क्षणों में कि"हुआ है कौन किसी का उम्र भर फिर भी" और
"यह जो सहजता है, सरलता है
स्निग्धता है,उजास है
सतरंगी रसाभास है
हमें उस पर विश्वास है"
कहते हुये कवि
"पता नहींयह क्या है
तुम्हारे शब्दों में
कि आँसूचले आते हैं
खुद-ब-खुदमुस्कराते-से" 
में कवि बिछोह में भी प्रेम की खुशी को महत्त्व देते हुये स्व का समर्पण पर में करता प्रतीत होता है |   
"उदासी के साथ अकेले" रहना कवि को "एक तरह की आश्वस्ति देता है" क्योंकि "किसी के साथ रह कर भी/अकेले रह गये तो?" का प्रश्न कवि को भीतर तक में विचलित करता रहता है इसीलिए कवि कहता है कि "उदासी एक सोया हुआ तार हैएक खींचा हुआ तार है खुशीहर खिंचे हुये तार कोआख़िर सो जाना है" कवि के हृदय कक्ष में सदैव "एक उदासी मध्दिम बजती-सी" रहती है जैसे कि नासिर काज़मी कह रहे हों "हमारे घर की दीवारों पे नासिरउदासी बाल खोले सो रही है" |     "यह बेचैनी ही अमरता है" कहते हुये कवि "अवसाद" के चरम क्षणों में अपनी मानसिक स्थिति बताता है ".कि पुकार मेरे भीतर कीतोड़ती है दममेरे भीतर ही डाँसती है रातकि शिथिल गात मेरेदलकते जाते हैंदलकते जाते हैं"        इस काव्य-कृति के शीर्षक "एक उर्सुला होती है" से सम्बन्धित कविता "वॉन गॉग की उर्सुला" कवि के भीतर की छटपटाहट को व्यक्त करने में बहुत कामयाब रही है जबकि प्रेम में विरह की स्थितियों के प्रति गहन विश्लेषण के साथ इजाडोरा के माध्यम से कवि कहता है "प्रेम शरीर की नहीं/आत्मा की बीमारी है" यह कविता मनुष्यता के चरम तक पहुंचते हुये एक संवेदनात्मक कविता है जब कवि कहता है
"दुनिया के क्रूरतम तानाशाह भी
अपने भीतर समेटते रहते हैं
एक बिखरती उर्सुला"     
कुमार मुकुल की इस काव्य-कृति को पढ़ते हुये मुझे अपनी "अवसाद-पक्ष" की कवितायें अनायास याद आती रही, और जब "वॉन गॉग की उर्सुला" में कवि ने कहा "कोई भी दु:ख बिना उम्मीद के नहीं आता" तो मैं कवि की रचना-प्रक्रिया में किसी भी संवेदनशील मनुष्य के शामिल रहने की पूरी संभावनायें तलाशता रहा हूँ |
"सचमुच की उर्सुला जब खो जाती है कहीं
जीवित होने लगती है वह
विंसेंट के लहू में
निग़ाह में उसकी
उसके इशारों में
बारहा रची जा रही होती है वह
कैनवासों पर
मिथ्या आवरणों के भीतर
अपने मूल से भीखरे रूप में"      
यही तो इस काव्य-कृति का सत्त्व है कि जब हमारे हिस्से का सुख कहीं नहीं मिलता तो हम अपने भीतर में पनपते हुये दु:ख को तापते हुये एक भुलावे की तरह उससे भी अधिक सुखी होने का भ्रम बनाये रखते हुये उसी के ढाँचे में ढलते जाते हैं और इसी भ्रम में अपना सर्वोत्तम रचने का प्रयत्न करते हैं |       
बहरहाल "एक उर्सुला होती है" के बारे में इस लम्बी-सी टिप्पणी को सारभूत में कहूँ तो यही कहूँगा कि--- कवि अपने प्रेम के विरह में उदासी को भी प्रेम के सुख में परिणित करने की कल्पनाशीलता में सार्थक हस्तक्षेप करता प्रतीत होता है,और मैं कवि की ओर से वॉन गॉग की उर्सुला के लिये कहना चाहता हूँ कि--- 
"मैं उसकी रूह के आईने में देखूँ खुद को   
कुछ इस तरह से कि आईना रहे मैं न रहूँ"

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