कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

सांस्कृतिक गौरवबोध को ध्वस्त करती ‘पुतैये’ - सुशील 'मानव'

संस्कृति

संस्कृति व्यक्ति एवं उसकी सावयवी व्यवस्था दोनों से श्रेष्ठ होती है। संस्कृति ही मनुष्य की भौतिक अभौतिककृतियों की वो संपूर्णता है जिसके जरिये वो अपने सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति कर पाता है। एक समाज जब अपनी संस्कृति का विकास करता है तो उसके साथ आवश्यक रूप से जुड़ता जाता है। समाज की सांस्कृतिक व्यवस्था के अनुकूल ही समाज के भीतर लोगों के व्यक्तित्व का विकास होता है, जिससे विभिन्न संस्कृति-तत्व व्यक्तित्व के आवश्यक अंग बन जाते हैं। इस प्रकार समाज के समस्त व्यक्ति अपनी संस्कृति को एक आदर्श के रूप में स्वीकार करते हुए उससे संबंधित होने के गर्व की अनुभूति करते हैं। चूँकि संस्कृति मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करती है तो उस समाज के सदस्य उसको विशेष महत्व देते हैं और उसे बनाये रखने के लिए वे तरह-तरह की विधियों एवं उपक्रमों को प्रयोग में लाते हैं। मनुष्य की संस्कृति के प्रति ऐसे विचार और संबंध के चलते ही कोई संस्कृति आदर्श, श्रेष्ठ और महानबनती-बनाई जाती है।संस्कृति का अस्तित्व मानव समाज पर आश्रित होता है। अतः अपने अस्तित्व के निमित्त ही संस्कृति व्यक्ति में स्वयं से संबंधित होने के गौरव का सौन्दर्य निर्मित करती है। संस्कृति के साथ महानता या श्रेष्ठता का आग्रह जुड़ना उससे जुड़े समाज के व्यक्ति में गौरव के बोध का कारण बनता है। चूँकि ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी समाज व्यवस्था वर्ण (रंग) आधारित है, जिसमें श्रेष्ठता का आधार ही वर्ण है, तो कहा जा सकता है कि सवर्ण संस्कृति की श्रेष्ठता का गौरवबोध नस्लवाद, रंगभेद पर टिकी है।
पुतैये
कवि कुमार मुकुल की कविता ‘पुतैये’ सवर्ण संस्कृति के उस गौरवबोध को ध्वस्त करती है। सभ्य होने के क्रम में इंसान कितने कम हुए हैं हम? ये सवाल खड़े करते हुए कविता मुठभेड़ करती है, सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बोध कराने वाली उन मनोग्रंथियों से जिनने उच्च जाति-वर्ग के व्यक्तियों में सौन्दर्य के विकार बोये हैं। जिनसेश्रेष्ठता का सौन्दर्य निम्नता के बरक्श घृणा का स्थायी भाव बनकर हिंसा एवं बर्बरता का संचार करता है। दलित नरसंहार जिसकी कुत्सित परिणति है।
‘पुतैये आये थे रात
जमात में
यूँ चरमराया तो था बाँस की चॉचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्ते के लोटे ने’

कविता में हत्यारों की जमात के लिए कवि ने ‘पुतैये’ शब्द का प्रयोग किया है। पुतैये शब्द पेंटर शब्द का हिंदी पर्याय है, जिसका इस्तेमाल ब्रेख्त ने हिटलर के संदर्भ में किया था। पेंटर अपने भावों की अभिव्यक्ति अपने पसंद के रंगों के माध्यम से करता है। पेंटर के हिंदी पर्याय से इतर पुतैये देशज शब्द है, जिसके देशज मायने हैं। दीवारों की पुताई करने वाले को भी पुतैये कहते हैं और चूल्हे की पुताई करना भी पुतइया कर्म है। पर पुतैये के कार्य तो सृजनात्मक होते हैं, फिर कवि नेपुतैये शब्द का इस्तेमाल हत्या, नरसंहार जैसे विनाशक कृत्य करने वालों के लिए क्यों किया ? क्या दलित वर्ग-जाति के लोग सवर्ण संस्कृति की दीवारों के दाग़-धब्बे हैं? जिन्हें ये पुतैये रात की स्याही मेंउन्हीं के लाल रंग से पोत देते हैं?
दरअसल संस्कृति अपने अस्तित्व के लिए ना सिर्फ मानव समाज पर आश्रित होती है, बल्कि संस्कृति ही एक समाज के स्वरूप को निर्धारित करके उसे दूसरे समाज से अलगाती भी है। परंतु आजादी के बाद बदली हुई राजनीतिक व्यवस्था, संचार और यातायात के साधन, संविधान प्रदत्त समता का अधिकार, शिक्षा, सामाजिक सुधार आंदोलनों और आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण के चलते दलित वर्ग-जाति के लोगों नें सवर्ण संस्कृति के बरक्श अपना संस्कृतिकरण कर लिया। संस्कृतिकरण के द्वारा निम्न जाति-वर्ग के लोगों ने उच्च जाति-वर्ग के सांस्कृतिक तत्वों को ग्रहण कर अपनी जीवन शैली को उच्च जातियों के अनुकूल बना लेते हैं, जिसके आधार पर वो उच्च सामाजिक स्थिति का दावा करने लगे। भौतिक स्थितियों को ना बदलन पाने की हालत में उन्होंने संस्कृति को सांकेतिक रूप से अपना लिया, जिससे उनका यथार्थ तो जहाँ का तहाँ रहा पर आभास बदल गया।
सवर्ण वर्ग की जीवन शैली, उनकी तरह उच्चशिक्षा की कामना, कपड़े पहनने का ढंग, बोल-चाल का सलीका, भाषा, विचार आदि अपना लेने के बाद उनमें एक सांस्कृतिक समरूपता आ गई। समाज में जाति का व्यावसायिक स्वरूप टूट जाने से सवर्ण संस्कृति और दलित संस्कृति का बड़ा विभेद खत्म हो गया। सवर्ण सांस्कृतिक मूल्य और जीवन शैली अपना लेने से उनका संपूर्ण जीवन परिवर्तन की प्रकिया में आ गया। संस्कृतिकरण के कारण जो निम्न समुदाय ऊपर उठना चाहता है वह उच्च जाति एवं सवर्णों के ईर्ष्या का पात्र बनता है। अतः जब तब उच्च वर्ग के लोग उनकी स्थिति को ललकारने लगते हैं।
कविता में बाँस की चांचर का दरवाजा और जस्ते का लोटा हत्या कर दिये गए वर्ग की आर्थिक-सामाजिक स्थिति का प्रतिमान है,जबकि लोटा,तावा, और दरवाजे द्वारा दर्ज किया गया अर्थहीन प्रतिरोध उनकी राजनीतिक स्थिति का, जिन्हें मारने वाले लोग जमात में आये थे। आख़िर समता का अधिकार देने वाला संविधान और उन अधिकारों को लागू करवाने का भरोसा देने वाले न्यायिक, प्रशासनिक संस्थाओं के होते कैसे कोई सवर्ण सांस्कृति की जमात नरसंहार का दुस्साहस कर लेती है ?
चूँकि संस्कृति ही समाज के संस्थाओं के स्वरूप एवं क्रिया-काल का निर्धारण करती है, अतः इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि भले ही संस्थाओं का स्वरूप संवैधानिक हों पर उनके सोचने और कार्य करने का तरीका सांस्कृतिक ही होता है जिसके चलते इन संस्थाओं द्वारा ‘पुतैयों’ को संरक्षण मिलता है। चूँकि मनुष्य के अस्तित्व से परे संस्कृतियाँ नहीं होती अतः मनुष्य के अस्तित्व पर हमला उसके संस्कृति पर हमला होता है।
‘पुतैये’ कविता में चूल्हा जीवन के रूपक की तरह प्रयुक्त हुआ है। लगभग हर धर्म के जीवन-दर्शन में देह को चूल्हे की ही तरह मिट्टी का बना माना गया है। चूल्हे का मुँह बाये जलते रहना जीवन का सूचक है। मौत के बाद जब व्यक्ति चूल्हे की मानिंद मुँह बा देता है, तो चूल्हे को फोड़कर उसका मुँह बंद कर दिया जाता है। चूल्हे के साथ ‘पोतनहरी’ भी पटक कर फोड़ दी जाती है। मृत्यु के पश्चात का ये कर्मकांड सवर्णवादी संस्कृति का अहम् हिस्सा है, जो कविता में बहुत ही सघनता से अभिव्यक्त हुई है।
चूँकि मनुष्य के अस्तित्व से परे संस्कृतियाँ नहीं होती अतः मनुष्य के अस्तित्व पर हमला उसके संस्कृति पर हमला होता है।चूल्हे की राख भूख के मुरझाने के बाद की प्राप्ति है, तृप्ति नहीं। उस प्राप्ति में बिल्ली के लिए भी भर-नींद सो सकने की गुंजाइश है,तृप्ति में नहीं। पुआल पर सोये पिल्ले आत्मरक्षा के दुर्बल कवच हैं, जिन्हें संस्कृति के मुताबिक थाली का आखिरी कौर भर मिलना था। बिल्ली की हत्या पर हत्तियारी के तहत सोने-चाँदी की बिल्ली की मूर्ति के दान का प्रावधान एवं कुत्तों मेंपितरों का अक्स देखने-दिखाने वाली सवर्ण संस्कृति के पुतैयों द्वारा दूसरी संस्कृति में पनाह पाये बिल्ली-पिल्लों की मौत सुनिश्चित करने के साथ ही कविता सवर्ण संस्कृति के विश्वगुरु बनने के दंभी दावों पर भी करारा चोट करती हुई जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से विचारों, विमर्शों के कई सूत्र शुरू होते हैं।
कुमार मुकुल की कविता 'पुतैये' कविता संग्रह ‘परिदृश्य के भीतर’ से -

पुतैये 

रात भीगना था ओस में
जिन चूल्‍हों को
सुबह पुतना था
मिटटी-गोबर-पानी और धूप से
पुत गये वे अपनों ही के खून से
पुतैये आये थे रात
जमात में

यूं चरमराया तो था बॉंस की चॉंचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्‍ते के लोटे ने
ढनमनाया था जोर से
चूल्‍हे पर पडा काला तावा भी
खडका था
नीचे गिरते हुए

पर बहादुर थे पुतैये
बोलती बंद कर दी सबकी
चूल्‍हे की तरह मुँह बा दिया सबने

चूल्‍हे की राख में घुसी
सोयी थी बिल्‍ली जो
मारी गयी
पिल्‍ले भी मारे गये
सोये पुआल पर।

हिटलर चित्रकार भी था और ब्रेख्‍त उसे व्‍यंग्‍य से पुतैया यानी पोतने वाला कहते थे। यह कविता बिहार के नरसंहारों के संदर्भ में है।

 Tuesday, January 3, 2017

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