कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती

यह कविता मैंने 1989-90 में लिखी थी। तब पटना से सीपीआई का एक दैनिक जनशक्ति निकला करता था, उसमें आलोचक व कवि डॉ.खगेन्द्र ठाकुर ने मेरी दो कविताएं छापी थीं, जिनमें एक यह भी थी। 2000 में जब मेरा तरीके से पहला कविता संकलन परिदृश्य के भी‍तर निकला तो मैंने उसकी कविताओं के चयन का काम अनुज कवि नवीन को दिया था, तो यह कविता अपने अलग मिजाज के चलते संकलन में नहीं ली गयी थी। 2006 में जब मेरा दूसरा संकलन ग्यािरह सितंबर और अन्य कविताएं छपी तो उसमें कविताएं चयन का काम मैंने अपने कवि मित्र आरचेतन क्रांति को दिया था,उसमें यह कविता संकलित की गयी। 2006 में कादंबिनी में यह कविता विष्णु नागर ने छापी। अब जाकर 2009 में अग्रज कवि मित्र रामकृष्णा पांडेय ने जब भोपाल से निकलने वाले अखबार नवभारत के एक विशेषांक, जिसका संपादन डॉ.नामवर सिंह ने किया, के लिए विषय आधारित कविता मांगी तो मैंने यही कविता दी उन्हें , जो वहां छपी भी। अब चौथी बार यह कविता जन संस्‍कृति मंच की स्‍मारिका में छपी है। पहली बार इस कविता का पारिश्रमिक कुछ नहीं था,कादंबिनी से 500 रूपये मिले थे और नवभारत से इस कविता के लिए 2000 मिले। तो कविता की रचनाप्रक्रिया ही नहीं उसकी प्रकाशन प्रक्रिया भी मजेदार होती है

इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती


ये इच्छाएँ थीं
कि एक बूढ़ा
पूरी की पूरी जवान सदी के विरुद्ध
अपनी हज़ार बाहों के साथ उठ खड़ा होता है
और उसकी चूलें हिला डालता है

ये भी इच्छाएँ थीं
कि तीन व्यक्ति तिरंगे-सा लहराने लगते हैं
करोड़ों हाथ थाम लेते हैं उन्हें
और मिलकर उखाड़ फेंकते हैं
हिलती हुई सदी को सात समंदर पार

ये इच्छाएँ ही थीं
कि एक आदमी अपनी सूखी हडि्डयों को
लहू में डूबोकर लिखता है
श्रम-द्वंद्व-भौतिकता
और विचारों की आधी दुनिया
लाल हो जाती है

इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती
अगर विवेक की डांडी टूटी न हो
बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों
तो खेई जा सकती है कभी-भी
इच्छाओं की नौका
अंधेरे की लहरों के पार।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…
कविता की प्रकाशन प्रक्रिया रोमांचित करती है।
और कविता पर तो क्या कहूं।
June 7, 2009 2:14 AM

Udan Tashtari ने कहा…
बहुत बढिया.
August 22, 2008 10:15 AM


दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…
इस यथार्थ कविता की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास।
August 22, 2008 10:27 AM

pallavi trivedi ने कहा…
इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती
अगर विवेक की डांडी टूटी न हो
बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों
तो खेई जा सकती है कभी-भी
इच्छाओं की नौका
अंधेरे की लहरों के पार।
कितनी सही बात...सचमुच इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती है!
August 22, 2008 10:55 AM

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…
इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती
अगर विवेक की डांडी टूटी न हो
बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों
तो खेई जा सकती है कभी-भी
इच्छाओं की नौका
अंधेरे की लहरों के पार।
kamal kee rachna, bahut sunder.
August 22, 2008 12:21 PM

2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व 'विजयादशमी' - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Unknown ने कहा…

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