कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 29 मई 2018

मैं शबाना - भारतीय समाज में एक औरत होने की विडंबना

यूसुफ रईस के उपन्‍यास 'मैं शबाना' से गुजरते हुए दो चर्चित उपन्‍यासों की कथाएं जहन में कौंधीं। एक जैनेन्‍द्र की 'त्‍यागपत्र' और दूसरी मिर्जा हाजी रूस्‍वा की 'उमराव जान अदा'। इनमें जो बात कॉमन है, वह है विडंबना। भारतीय समाज में एक औरत होने की विडंबना। कुर्रतुल एन हैदर की कहानी 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' भी इसी विडंबना को रूपायित करती है। जब तक यह विडंबना है इसे बारंबार सामने लाने की कोशिशें जारी रहेंगी, जारी रहनी चाहिए।
'मैं शबाना' में यही कोशिश की गयी है। उपन्‍यास की भाषा सहज और चित्रमयता लिये है। शबाना इस समाज से लडती है और करीब करीब लडाई जीतने को होती है कि विडंबना का विष उसके बचाए सपनों पर पानी फेर देता है। इस जहर की काट एक ही है शिक्षा। यह उपन्‍यास भी उस शिक्षा को आगे बढाने का एक माध्‍यम है। इसके लिए उपन्‍यासकार बधाई के पात्र हैं।

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