कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

उत्‍सवता मुझे रास नहीं आती

अरसा बाद आज चेतन का फोन आया।
पूछा - क्‍या हो रहा, बोले - रजाई में हूं।
मां कैसी हैं...। ठीक हैं।
इधर दिल्‍ली नहीं आए।
मेने बताया कि एकाध दिन को आया था पर मिल नहीं सका। होली में कुछ ज्‍यादा वक्‍त मिलेगा तो मिलते हैं उस वक्‍त।
फिर उन्‍होंने पूछा - कैसा रहा साहित्‍योत्‍सव।
मैंने कहा - उत्‍सव आदि में मेरी रूचि नहीं। यह सेलिब्रिटी लोगों के लिए है।
सोचा,अब सोशल मीडिया के चलते साहित्‍य में भी सेलिब्रेटी दिन-दूरी रात चौगूनी दर से बढ रहे तो मंच तो चाहिए।
इससे पहले आगरा में पहली बार साहित्‍योत्‍सव की रिपोर्टिंग के लिए गया था, बेमन से। तो जो रिपोर्ट बनी वह उनके अनुकूल नहीं थी, पर लोगों को पसंद आयी।
यहां जयपुर में तीन साहित्‍योत्‍सव हुए एक साथ आगे-पीछे। मैं सीधे इनमें से किसी से जुड़ा भी नहीं था। साहित्यिक संगठनों से भी मेरा हमेशा से लगभग ना के बराबर संबंध रहा है। दिल्‍ली रहने लगा तो जसम की सदस्‍यता भी दिलायी गयी मुझे। पर इससे कोई अंतर नहीं पड़ा। क्‍येाकि जसम के बिहार के तमाम साथी पहले से ही निकट रहे हैं।
इससे पहले सहरसा में जलेस से तब जुडे रामचैतन्‍य धीरज ने मुझे जोडना चाहा था। पर मेरी कभी भी रूचि साहित्यिक संगठनों से जुडकर साहित्‍य में जगह बनाने में नहीं रही। इन संगठनों के कार्यक्रम जो भी मुझे खींचते थे, उनमें मैं शिरकत करता था, बिना भेद-भाव के।
पर उत्‍सवता मुझे रास नहीं आयी। मंच पर खुद को श्रोता से अलग होकर बोलना भी मुझे अच्‍छा नहीं लगा कभी। एक घेरे में बैठकर मैं पूरे दिन बातें कर सकता हूं पर अलग से लोगों को संबोधित करना मेरे लिए सहज नहीं। मंच से केवल कविता पाठ कर पाता हूं मैं, सहजता से। बाकी अगर कभी मुझे बोलना पड़ा तो वक्‍तव्‍य को लिखकर ले जाना मेरे लिए जरूरी होता है अक्‍सर।
तो इन साहित्‍योत्‍सवों के समय मैं दिल्‍ली था परिवार के साथ। वहां एक शाम अच्‍युतानंद म‍िश्र, कुमार वीरेन्‍द्र, अजय प्रकाश, इरेन्‍द्र, राजेश चन्‍द्र, मजीद अहमद अादि साथियों से बातें हुईं। साहित्‍योत्‍सव की खबरें फेसबुक के माध्‍यम से कुछ आयीं मुझे तक। प्रेम भारद्वाज की वाल से पता चला कि वे जयपुर में हैं। उन्‍हीं से पता चला कि विष्‍णु खरं भी आये हैं। तो अफसोस हुआ कि जयपुर रहता तो इन लोगों से बातें करना अच्‍छा लगता। एक संजीव कुमार की पोस्‍ट से पता चला कि संदीप मील की सक्रियता से जलेस ने भी उत्‍सव किया। मील का एक दो बार फोन आया था, बारिश के चलते तय समय पर हमलोग म‍िल नहीं सकें। पर जनपर्व की कोई सूचना इसके पहले मुझे नहीं थी। प्रलेस के कार्यक्रम की जानकारी थी मुझे और अपनी वाल पर उसे मैंने शेयर भी किया था। फिर गोविंद जी से भेंट हुई तो मैंने उन्‍हें बताया था कि मैं तो भई साल की इकलौती अखबारी छुटिटयों में दिल्‍ली जा रहा।

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बैंक की साख पर बट्टा है ये घोटाला : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Sanjay Grover ने कहा…

उत्सवता में शामिल होने, न होने का हक़ सबको होना चाहिए, आपको भी है। इसमें कोई भी असामान्य बात नहीं है।