कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 1 जनवरी 2018

कुमार मुकुल - काव्य पाठ - फेसबुक एक आत्‍मालोचना

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