कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

मीडिया कब तक बेचेगा समोसा और चाय

बीबीसी सहित तमाम मीडिया ने पिछले दिनों एक खबर चलाई थी 'आइआइटी में समोसे बेचने वाले का बेटा'। यह क्‍या तरीका है खबरें बनाने का। कल को अमित शाह जैसे राजनीतिज्ञ इसे 'बनिये का बेटा बना आइआइटीयन'  कह सकते हैं। जब वे गांधी को बनिया कह सकते हैं तो फिर उनसे और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है।
यह मीडिया क्‍यों राजनीतिज्ञों की भ्रष्‍ट भाषा को अपना आधार बना रहा। यह प्रवृत्ति इधर बढती जा रही, किसी भी सफल युवा को उसके आर्थिक हालातों के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करना, जैसे जरूरी हो। समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की नजर में छोटा क्‍यों हो। केवल पैसे वालों के ही बेटे क्‍यों बढें आगे।
यह जाति, पेशे, धर्म,गरीबी आदि के आधार पर बांटने की राजनीतिज्ञों की बीमारी को मीडिया क्‍यों हवा दे रहा। एक ओर गुड़,तेल,चूरन बेचने वाले रामदेव को मीडिया योगिराज बताता है जब कि रामदेव खुद अपना टर्नओवर(मुनाफा) बताते हुए खुद को मुनाफाखोर घोषित करते हैं।
यह लोकतंत्र है तो यह तो सहज होना चाहिए कि गरीब आदमी जिसकी संख्‍यां ज्‍यादा है उसको हर जगह ज्‍यादा जगह मिलनी चाहिए। खबर तो यह होनी चाहिए कि इस बार भी मुटठी भर अमीरजादों ने कब्‍जा कर लिया तमाम पदों पर।
संसद में साढे चार सौ के आसपास करोडपति हैं। तो यह सवाल बार-बार क्‍यों नहीं उठााया जाता कि भारत में अगर गरीब आ‍बादी है तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे। अखि‍र इस करोडपति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की।

1 टिप्पणी:

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ओछी मानसिकता का प्रतीक है यह सब ! अपने-अपने मतलब के लिए ऐसे जुमले उछाले जा रहे हैं।