कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

मिथक प्‍यार का

बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में...


बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में
वहां पाती है जगत कुएं का
जिसकी तली में होता है जल
जिसमें चक्‍कर काटत हैं मछलियों रंग-बिरंगी

लड़की के हाथों में टुकड़े होते हैं पत्‍थर के
पट-पट-पट
उनसे अठगोटिया खेलती है लड़की
कि गिर पड़ता है एक पत्‍थर जगत से लुडककर पानी में
टप...अच्‍छी लगती है ध्‍वनि
टप-टप-टप वह गिराती जाती है पत्‍थर
उसका हाथ खाली हो जाता है
तो वह देखती है
लाल फ्राक पहने उसका चेहरा
त ल म ला रहा होता है तली में
कि
वह करती है कू...
प्रतिध्‍वनि लौटती है
कू -कू -कू
लड़की समझती है कि मैंने उसे पुकारा है
और हंस पड़ती है
झर-झर-झर
झर-झर-झर लौटती है प्रतिध्‍वनि
जैसे बारिश हो रही हो
शर्म से भीगती भाग जाती है लड़की
धम-घम-घम

इसी तरह सुबह होती है शाम होती है
आती है रात
आकाश उतराने लगता है मेरे भीतर
तारे चिन-चिन करते
कि कंपकंपी छूटने लगती है
और तरेगन डोलते रहते हैं सारी रात
सितारे मंढे चंदोवे सा

फिर आती है सुबह
टप-झर-धम-धम-टप-झर-झर-झर

कि जगत पर उतरने लगते हैं
निशान पावों के

इसी तरह बदलती हैं ऋतुएं
आती है बरसात
पानी उपर आ जाता है जगत के पास
थोडा झुककर ही उसे छू लिया करती है लड़की
थरथरा उठता है जल

फिर आता है जाड़ा
प्रतिबंधों की मार से कंपाता

और अंत में गर्मी
कि लड़की आती है जगत पर एक सुबह
तो जल उतर चुका होता है तली में

इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं
और फफक कर भाग उठती है वह
भाग चलता है जल तली से।

9 टिप्‍पणियां:

L.Goswami ने कहा…
मिथक को परिभाषित करती अच्छी कविता.
preeti ने कहा…
behtareen ...
वन्दना ने कहा…
गज़ब्…………………बेहतरीन्…………………शानदार ………………लाजवाब्…………………अब तो शब्द भी कम पड रहे हैं।
वन्दना ने कहा…
फिर क्‍यों खींचते हैं पहाड़

बेहद गहन सोच का पर्याय है आपका लेखन्।
वन्दना ने कहा…
इच्छाओं की उम्र नहीं होती

क्या गज़ब का लेखन है……………नतमस्तक हूँ।
आज आपका ही लिखा पढ रही हूँ और अपने को धन्य कर रही हूँ।
shabdsrijan ने कहा…
आपकी यह कविता अपनी सहजता में उदात्त की ओर ले जाने वाली खिडकियां खोलती है।
योगेंद्र कृष्णा
सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप भावपूर्ण रचना।
वाणी गीत ने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं

अद्भुत ...!
arun c roy ने कहा…
मुकुल जी आपकी कवितायेँ पढना ए़क अनुभव है.. किसी और लोक में ले जाती है आपकी कविताएं, आपके गीत ... पहली कविता आपकी.. इच्छाओं की उम्र नहीं होती पढ़ी थी और आज भी जेहन में ताज़ी है कविता ... बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में... पढ़ कर तो अपने बचपने में चला गया जब ए़क लड़की यूं ही झाँका करती थी मेरे घर के आगे के कुए में ! समय बीतता गया वो लड़की बड़ी हुई लेकिन उस बूढ़े कुए की तरह उसके सपने सूख गए और वो लड़की पांच लड़कियों को जन्म देकर पिछले साल जुगार गयी... लगता है ... आज भी वो लड़की झांकती है मेरी आँखों में... उस बूढ़े कुए में... जो सूख गया है अब ! झकझोर दी है आपकी कविता !

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