कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

सोमरस क्‍या है ?

ऋग्‍वेद के अनुसार -
मन्‍द्रस्‍यरूपंविविदुर्मनीषिण: - विद्वान लोग मदकर सोमरस का स्‍वरूप जानते हैं।
स: पवस्‍वमदिन्‍तम।
सोम को अत्‍यंत प्रमत्‍त करने वाला बताया गया है।
सोम को स्‍वर्ग से बाज ले आया था। एक जगह इसके पृथ्‍वी से पैदा होने का भी जिक्र है। सोम धुनष से छूटे बाण की तरह और अश्‍व की तरह और बाज पक्षी की तरह स्‍वर करता है। सेाम को अधिकतर हरित रंग का बताया गया है ओर पत्‍थरों से कुचलकर इसका रस निकलता है। सोम को कवि, क्रान्‍तकर्मा कहा गया है। सोम गोचर्म के उपर पत्‍थरों के साथ क्रीड़ा करते हैं। उनसे धन-धान्‍य, संतति और शुत्रु के विनाश की कामना की जाती है। सोम के शोधक गोचर्म और मेषचर्म हैं। सोम बाहुओं द्वारा सांशोधित, वसतीवरी-जल से  सिंचित काष्‍ठपात्र में निहित अपने स्‍थान को गमन करते हैं।
स:पवश्‍च मदाय कंनृचक्षा:देववीतये। इन्‍द्रो इति इन्‍द्राय पीतये।।1।।
सोम तुम नेताओं के दर्शक हो। तुम देवों के आगमन या यज्ञ के लिए इन्‍द्र के पान, मद और सुख के लिए क्षरित होओ।
उतत्‍वामरूणंवयं गोणिअहमोमदायकम। ।3।।
सोम मद के लिए रक्‍त-वर्ण तुम्‍हें हम दुग्‍ध अादि से संस्‍कृत करते हैं।
गोणि:श्रीणीतमत्‍सरम।
मदकर सोम को दूध आदि से संस्‍कृत करते हैं।
परीतो वायवे सुतं गिर: इन्‍द्राय मत्‍सरम। अव्‍योवारेषु सिंचत।।10।।31।। ऋग्‍वेद
स्‍तोताओ तुमलोग वायु और इन्‍द्र के लिए अभिषुत और मदकर सोम को अभिषव देश से लेकर सिंचित करो।
सोम के लिए मद चुलाने वाले और मदकर का प्रयोग पचासों बार हुआ है। इंद्र के मद के लिए हम सोम को बनाते हैं ऐसा लिखा गया है। सोम के क्षरित होने का जिक्र भी बार बार है। ऋत्विक लोग सोम को मेष के रोएं से यानि उन से छानते हैं। सोम की माताएं नदियां हैं। सोम ने वृत्र का वध करते समय इंद्र की रक्षा की थी।  
सोम तुम अतीव मादक हो, चमसों में बैठते हो, तुम बहुसंख्‍यक और शोभन वीर्य धन क्षरित करो। सोम दूध व दधि संस्‍कृत होकर क्षरित होकर दशापवित्र की ओर द्रोण कलश में जाते हैं। रक्‍त-वर्ण, हरितवर्ण, पिंगलवर्ण सोम। काम वर्षक सोम जलधारा से बनाए जाते हैं।
सोम राक्षसों को नष्‍ट करते हैं मतलब राक्षस सोमपान नहीं करते थे।
सोम उसी तरह तरंग पैदा करते हैं जैसे रथी अश्‍व को चलाता है। शोधित गतिपरायण सोम सरलता से आकाश की ओर जाते हैं, वे जलपात्र की ओर जाते हैं। सोम को मनुष्‍य बनाते हैं और देवता पीते हैं। सोम तुम उस इन्‍द्र के लिए बहो जिसने 99 शत्रु पुरियाें को नष्‍ट किया है।
एक जगह लिखा है - कार्यकुशल स्त्रियां सुंदर वीर्यवाले अपने पति सोम के क्षरणशील होने की इच्छा करती हैं।
यस्‍य:तेमद्यंरसमतीव्रमदुहन्ति।
तुम्‍हारे मदकर और क्षिप्र मददाता रस को हम पत्‍थरों से दुहते हैं।
जैसे घोड़े को जल में मार्जित किया जाता है उसी तरह सोम को दूध-दहि आदि से मार्जित किया जाता है।
सोम हर तरह के भय को नष्‍ट करते हैं।
सोम जौ के सत्‍तू में मिलाया जाता है ऐसा भी जिक्र है।
इंद्र के लिए सोम काले चमड़े वाले राक्षसाें को दूर हटाते हैं। सोम शिशु के समान नीचे मुंह करके रोते भी हैं। एक जगह सोम को इंद्र भी कहा गया है। सोमपान कर ही इंद्र युद्ध को जाते हैं। अंतरिक्ष की अप्‍सराएं यज्ञ में बैठकर पात्राों में सोम को क्षरित करती हैं। सोम को पृथवी का पुत्र भी कहा गया है।
जैसे स्‍त्री पुरूष को सुख देती है उसी तरह सोम यजमान को सुख देते हैं। जो तुम्‍हारा पान करता है उसके सारे अंगों में प्रभु होकर तुम विस्‍तृत हो जाते हो। परिपक्‍व शरीर वाले ही तुम्‍हें ग्रहण व धारण कर सकते हैं।
तुम्‍हारे रस को पीकर पापी लोग प्रमत्‍त वा आनन्दित न हों ऐसी भी प्रार्थना की गयी है। मधुरभाषी वेन लोग यज्ञ में सोमाभिषव करत हैं। सोम युद्ध में जाते हें और महान अन्‍न को जीतते हैं।
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ऋग्‍वेद संहिता - सायण भाष्‍य संवलित, चौखंबा प्रकाशन - सप्‍तम अष्‍टक - प्रथम अध्‍याय से सोम वर्णन आरंभ होता है। मंडल 9 अध्‍याय 2 सूक्‍त 45 से लेकर अध्‍याय 7 सूक्‍त 113 तक करीब साढे तीन सौ पृष्‍ठों मे लगातार सोम का वर्णन है।

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