मंगलवार, 22 अगस्त 2017

श्रम की गांठ से उपजी कविताएं - राजू रंजन प्रसाद

अपनी पीढ़ी के एक कवि की चर्चा धूमिल की पंक्ति से शुरू करने के लिए विज्ञजन से क्षमा की आशा रखता हूं। ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ मैं इसे थोड़ा सुधारकर कहना चाहता हूं कि ‘आदमी’ होना कविता लिखे जाने की पहली और अनिवार्य शर्त है। व्यक्तित्व के फ्रॉड से ‘बड़ी’ कविता नहीं लिखी जा सकती। बड़ी कविता से मेरा मतलब महान कविता से कतई नहीं है। बड़ी कविता अपनी संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में ‘जेनुइन’ होती है। यहां रचना-प्रक्रिया का उल्लेख अकारण नहीं है। समीक्ष्य काव्य-संग्रह ‘परिदृश्य के भीतर’ के कवि को मैंने पूरे एक दशक तक (यह क्रम अब भी जारी है) जाना और ‘झेला’ है। एक ईमानदार और मुखर आदमी को ‘झेलना’ सहज और आसान नहीं होता। इस कवि को मैंने जब भी अपने पास पाया-उसे बोलता-बड़बड़ाता हुआ ही पाया। इतने दिनों तक चप्पलें साथ चटखाने (घसीटने) के बाद मैंने यही महसूस किया कि ‘चुप्पी उसके लिए मौत से भी ज्यादा त्रासद और भयावह है।’
‘परिदृश्य के भीतर’ में सन् 1988 से 99 तक की कुल इक्यानवे कविताएं शामिल हैं। इन तमाम कविताओं का प्रथम पाठक/श्रोता होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इसलिए इन कविताओं की रचना-प्रक्रिया में आनेवाली एक-एक चीज से परिचित हूं। कइयों के तो मुझे दृश्य तक याद हैं कि किन परिस्थितियों में वह कविता जन्म ले रही थी। कहना होगा कि कुमार मुकुल की कविताओं का क्षितिज काफी विस्तृत है। घर-परिवार और आस-पास की चीज से लेकर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य तक इनकी कविताओं में सहज भाव से शामिल होते हैं। इनकी कविता सोमालिया की दैन्य स्थिति से शुरू होती है और पहाड़, पत्नी से होती हुई महानगरीय जीवन से पलायन करती संवेदना तक को अपना निशाना बनाती है। प्रकृति पर इनके पास सबसे अधिक कविताएं हैं मानो वह उनकी मुट्ठी में हो।
‘सोमालिया’ संग्रह की सबसे छोटी कविता है, लेकिन इस छोटी-सी कविता के माध्यम से कवि विश्वव्यापी ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का सबसे अधिक प्रत्याख्यान करती है। पूंजीवाद के भ्रष्टतम रूप ने पूरी मानवीय संवेदना को किस हद तक अमानवीय बना डाला है,उसके पूरे अर्थशास्त्र को इन दो पंक्तियों की कविता से जाना जा सकता है। कविता की पूरी विकास-यात्रा को समझने के लिए इसको उद्धृत करना अत्यंत अनिवार्य है;
‘मुट्ठी भर
अन्न के लिए
गोलियां
मुट्ठी भर
और सभ्यता के कगार पर
आ पहुंचे हम।’

इसे उद्धृत करने का एकमात्र कारण यह नहीं है कि यह छोटी है और ऐसा करना मितव्ययी होना अथवा सुविधाजनक है, बल्कि यह संग्रह की कविता एवं कुमार मुकुल की चेतना का प्रस्थान-बिंदु है। यहां से मुकुल की कविता के कैनवास खुलते हैं।
इस ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का रक्तबीज है महान औद्योगिक क्रांति के गर्भ से उपजी बाजार की फासीवादी संस्कृति। उपभोक्तावाद ने हमारी तमाम संवेदना को ग्रस रखा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्ल में नव-फासीवादी ताकतें हमारे बीच फिर से पसरने लगी हैं। एक ईमानदार और संवेदनशील कवि भला इस अमानवीय, त्रासद स्थिति को अपनी नियति मानकर चुप कैसे बैठा रह सकता है। उसके पास इतने तफसील हैं इसके कि वह पूरी विनाशलीला को बगैर किसी धुंध के साफ-साफ देख रहा है। संग्रह की दूसरी कविता ‘कउआ’ इसी सत्य को उद्घाटित करती है। कउए को शायद पता नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कितना खाद्य-अखाद्य बना डाला है। किसी को अलग से बताने की जरूरत शायद ही अब शेष हो कि प्रति-वर्ष लाखों की संख्या में गायों का निधन पॉलिथीन खाने से हो रहा है और हमारी अत्यंत ‘सहनशील’ हिंदू सभ्यता कुछ भी कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन को आये दिन सरकारी वक्तव्यों में जिस तरह पेश किया जा रहा है,लगता है, यह कोई महान् उपलब्धि हो। पचास वर्षों से अधिक के आजाद भारत के इतिहास में गुलामी की याद अब भी ताजा है और कवि की सचेत आंखें उसके फैलते जाल को अपनी पराधीनता का तंबू मान रही हैं। कहना होगा कि भारत में अंग्रेजों का आगमन एक विशुद्ध व्यापारिक कंपनी के रूप् में हुआ था लेकिन धीरे-धीरे देशी निजामों की अदूरदर्शिता और सामान्य जन की ‘कोउ नृप होहिं हमें का हानि’ वाली मुद्रा की वजह से शासक बन बैठे थे। आज स्थिति उससे दो कदम आगे तक जा चुकी है जब हम खुद उसके आने का जश्न मना रहे हैं और सारी दुनिया के सामने दांतें निपोरकर अपना अहोभाग्य बता रहे हैं। सूत्र रूप में यह कहना होगा कि कवि अपने दैनिक जीवन में गांधीवादी शैली से काम चलाते हैं। अपने आस-पास अभावों की एक दुनिया सृजित कर।
कुमार मुकुल से असहमति की गुंजाइश तब होती है जब वे कहते हैं,
‘संस्कृतियों के
इतने रंग-बिरंगे टीलों को छोड़
गंगा की ओर मुंह किए
कहां भागा जा रहा है कउवा।’

हमारे प्यारे कवि के लिए शहर संस्कृति के रंग-बिरंगे टीले से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ‘कउवा’ मुकुल की अकेली कविता नहीं है जिसमें शहर के प्रति उपेक्षा का भाव है बल्कि संगह की जिस किसी कविता में भी शहर आता है,वह हीनता-बोध और अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होता है और कवि की कुपित संवेदना का शिकार होता है। इस प्रसंग में कवि की भिन्न-भिन्न कविताओं से चुनी गई पंक्तियों को यहां रखने की अनुमति चाहूंगा। ‘मर्यादाएं हम तोड़ेंगे’ कविता की अंतिम पंक्तियां कुछ इस तरह की हैं,
‘बंदरों-भालुओं से अंटी अयोध्या को
पीटेंगे बांधकर

इसी कंकरीट के जंगल में।’
ऐसा कहते हुए कवि अयोध्या की संपूर्ण ऐतिहासिक गरिमा और उससे जुड़ी हमारी जातीय स्मृतियों को एक गैर-जरूरी चीज साबित कर डालता है। एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘प्यार में’। कविता यों शुरू होती हैः
‘प्यार में महानगरों को छोड़ा हमने
और कस्बों की राह ली
अमावस को मिले हम और
आंखों के तारों की रोशनी में
नाद के चबूतरे पर बैठे हमने
दूज के चांद का इंतजार किया
और भैंस की सींग के बीच से
पश्चिमी कोने पर डूबते चांद को देखा।’
इससे पहले कि मैं कुछ कहूं कवि अपनी ‘पुतैये’ कविता का स्मरण करे। क्या शहर इतना अमानवीय है कि प्यार करने के लिए अब किसी को कस्बों की राह थामनी होगी ? कवि स्वयं लिखता है;
‘महानगर में अब भी तीखा है महुआ
अब भी सुंदर हैं लड़कियां यहां।’
कवि को शायद इस बात का अंदाजा हो कि कस्बों में जो प्रेम-संबंध हैं, जीवन का जो माधुर्य है, उसकी रक्षा के लिए लाखों मजदूर और भिन्न-भिन्न पेशों की चाह लिए नौजवान प्रति-वर्ष किसी-न-किसी शहर को अपना गंतव्य बनाते हैं। यहां उनके हाथों को काम और गांवों में चल रहे/पल रहे प्रेम-संबंधों को खुराक की नमी मिलती है।
शहर के प्रति कवि का जो नजरिया है वह ऐतिहासिक विकास की गलत समझ से बना लगता है। बाजार-संस्कृति का विरोध करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि आप प्रगति ही के महत्व को नकार दें। शहर सिर्फ विषैला सर्प नहीं है जो हमेशा फन काढ़े बैठा हो कि कब आदमी आये और उसे डंस लें। अज्ञेय के यहां शहरों के लिए तिरस्कार का भाव है और गांवों का चित्रण ऐसा करते हैं मानों वहां हमेशा ‘ढोल और मादल’ बजते हों। कवि केदारनाथ सिंह के लिए शहर वैसी जगह है जहां इच्छाएं पलती हैं। अब इस सवाल का जवाब तो कुमार मुकुल ही देंगे कि क्या शहरों में स्वयं इसका विरोध करनेवाले कवि और लेखक नहीं बसते ? आपके पास आंकड़ों की कमी नहीं, और आप बता सकते हैं कि शहरों से गांवों के लिए दया की भीख मांगनेवाले कितने गंवई कवि हैं जिन्हें हम भी जानते हों। क्या हम इस बात को कहने का साहस कर सकते हैं कि कविता के जन्म लेने से पाठकों तक लाने का सारा कारोबार इन्हीं नगरों-महानगरों में अंजाम पाता है। हमारे ज्ञान को दुरुस्त करनेवाली कौन-सी किताब और ‘कठिन वक्त की कविता’ की कौन-सी पत्रिका है जिसके कारखाने गांव में हैं ?
शहरों का इतिहास हमारी प्रगति की कहानी कहता है जिसमें लाखों-करोड़ों मजदूरों का श्रम लगा है। संस्कृति के इन टीलों को निर्मित करने में हमारे फौलादी हाथ काम आये हैं। इन्हीं टीलों में किताबों से अंटे तंग से तंग कमरे में अरुण कमल जैसे सुकवि की आत्मा बसती है। उसके एक कोने में सूर्य की तरह उद्भाषित होता पितरिया लोटा भी होता है।
इसी प्रसंग से संबंधित ‘चबूतरा’ शीर्षक की दो कविताएं भी चर्चा की खासतौर से अपेक्षा रखती हैं। इसमें भी कुएं के माध्यम से गांव और शहर (माफ कीजिए, कवि इसे महानगर कहता है) की आत्मा का हमें फर्क बताया गया है। एक कुआं कवि के गांव में है जिसके
‘चबूतरे के पास ही
मेंहदी लगी थी
जो आज तक हरी है
दिन में जिस पर लंगोट सूखते हैं
और रात में उगते हैं सफेद सपने।’

आगे
‘एक कुआं है
महानगर में भी
बिना चबूतरे के
उसके निकट जाने पर ही
पता चलता है कि कुआं है।’

और ऐसा शायद इसलिए है कि ‘महानगर’ के कुएं के लिए कवि की कोई स्मृति नहीं है। इस कुएं के पास कवि ने शाम भी न गुजारी होगी, रात की कौन पूछे। इसीलिए कवि और उनके वर्ग के लोगों के लिए इसका महातम साल में केवल एक बार छठ के अवसर पर जगता है। लेकिन चाय की गुमटीवाला ऐसा नहीं सोचता जिसकी चाय के लिए पानी इसी कुएं से जाता है। सुबह-सुबह कुछ दूधिए भी अपना गेरू वहीं धोते हैं। भिखमंगे भी भरी दोपहरी में वहीं नहाते हैं। कवि को शायद यह मालूम हो कि यह मुहल्ला शहर का वह हिस्सा है जिसका शहरीकरण होना अभी बाकी है। पड़ोस के कई भूखंड अब भी खाली पड़े हैं जिनमे बिल्लियां चूहों के साथ बेखौफ खेलती हैं। जैसे ही अगहन में धान पकते हैं कि उसकी एक लरछी अपनी चोंच में दबाए गौरैया कवि के घर में दाखिल हो जाती है। लेकिन कवि हैं कि
‘कंक्रीट के इस जंगल में
मौसम की निर्जनता
मुझे ही नहीं
इस घरेलू चिड़िया को भी खलेगी।’

कविता का पैरा अभी खत्म भी न होने पाया कि कवि की राय महानगर को लेकर बदल जाती है। वे लिखते हैं, ‘इस नये बसते शहर के पड़ोस में धान की फसल कटेगी।’ शहर के गिर्द फसल की हरियाली हो तो कवि को भला क्या उज्र!
कुमार मुकुल की कविता की विशेषता इस बात में है कि बड़ी-से-बड़ी बात को कम-से-कम शब्दों में कह डालती है। इस लिहाज से संग्रह में कई ऐसी कविताएं हैं जिनमें स्थितियों का ऐसा जबर्दस्त चित्रण है कि एक साथ भाव के कई स्तर खुलते हैं। सामंती व्यवस्था और मानसिकता के विरुद्ध चल रहे नक्सलबाड़ी आन्दोलन को कवि दृश्य-चित्रण प्रस्तुत कर शब्दों की कितनी मितव्ययिता प्रदर्शित करता है-इसका बेहतर नमूना पेश करती है ‘पुतैये’ कविता। कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह हैं;
‘यूं चरमराया तो था बांस की चांचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्ते के लोटे ने
ढनमनाया था जोर से
चूल्हे पर पड़ा काला तावा भी
खड़का था
नीचे गिरते हुए।’

कितने कम शब्द और कहने के लिए कितनी बड़ी बात। कविता की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे अनायास शमशेर की ‘उषा’ कविता की याद हो आई। अद्भुत चित्रात्मकता इन दोनों कविताओं की जान है। ऐसे ही विरल अवसर के लिए एंगेल्स ने कभी लिखा था कि विचार जितने ही छिपे हों लेखक के लिए उतना ही अच्छा है। क्या इन कविताओं में विचार छिप सके हैं ? एंगेल्स की इस उलटबांसी( ?) का कई जनवादी आलोचक तक ने अर्थ लगाया कि विचार कविता के लिए उपयुक्त नहीं है!
कवि जब अपनी दैनिक जिंदगी में बातचीत या बहसों में होता है तो सीधे हमला करता है लेकिन कविताओं में कई बार प्रकारांतर से चीजों को बे-पर्द करता है। एक कविता ‘बाई जी’ शीर्षक से है जो दरअसल पत्नी को संबोधित करके लिखी गई है। इस कविता के माध्यम से कवि ने घर के सामंती ढांचे की विद्रूपताओं को दिखाने की कोशिश की है। यह घर जिसे हमने सभ्यता-संस्कृति के विकास की एक खास अवस्था में गढ़ा था,आज इस बीसवीं शती के अंतिम दौर में भी एक स्त्री के अस्तित्व को लील जाना चाहता है। संस्कृति की सुरक्षा में खड़ी की गईं ये दीवारें एक स्त्री के गुनगुनाने मात्र से कैसे बेतरह कांपने लगती हैं। जिस भयावह स्थिति की ओर कुमार मुकुल ने ईशारा किया है, उसी भयावहता को दूर तक तानते हुए आलोक ने लिखा है घर की जंजीरें कितनी बड़ी दिखायी देती हैं जब कोई लड़की घर से भागती है। यहां नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है।
मुकुल जी का संग्रह इस कारण से भी महत्वपूर्ण है कि वह श्रम की महत्ता को सीधे-सीधे स्थापित करता है। पूरा संग्रह ऐसी पंक्तियों से भरा है जो श्रम की दुनिया से कवि के जुड़ाव को प्रदर्शित करती है। निम्न मध्यवर्ग का वह तबका जो महान श्रम से जुड़ा नहीं होता शीघ्र ही अवसाद के गहरे अंधेरे में चला जाता है। बारी-बारी से तमाम चीजों की अर्थवत्ता समाप्त होने लगती है। श्रम हमें ऐसे अवसाद से बचाता है और व्यक्तित्व को एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। इसीलिए हमारे कवि के जीवन में अवसाद पल-दो-पल की चीज है। उदासी डरावनी नहीं है बल्कि एक ‘धारदार हीरा’ है। कवि गहरे आत्मविश्वास से कहता है, ‘उदासी आंखों में पैठ गयी तो
सोचता हूं दौड़ूं और उदासी को
पीछे छोड़ दूं।’

ऐसा वही कह सकता है जिसमें काम करने की अदम्य लालसा हो। मुझे नेहरु की याद आती है जब वे कहते हैं, ‘शायद मुझे एक उड़ाका होना चाहिए था-इसलिए कि जब जिन्दगी का धीमापन और उदासी मुझ पर छाये, तो मैं उड़कर बादलों के कोलाहल में समा जाता।’ विज्ञजन कहेंगे, यह तो एक तरह का रोमान है। सही है; किन्तु यह जीवन और श्रम के महान उद्येश्यों से पैदा हुआ है। मुकुल की कविताएं श्रम की गांठ से उपजी कविताएं हैं।

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