कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शनिवार, 23 मई 2015

अकेला हूं मैं जैसे अकेले हैं तारे ...

अकेला हूं मैं
जैसे
अकेले हैं तारे
सारे के सारे
टिमटिमाते हें अकेले
और टूट जाते हैं ...

अकेले हैं वे
शि‍खरों को छूती सभ्यता
अकेली है जैसे

अकेला है वह
भरे हुए घर में
मोमबत्ती की लौ की ओर
बढता बच्चा

अकेला है जैसे ...

 इस कविता पर फेसबुक पर आयी टिप्‍पणियां - 

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Anurag Agney, Lalbahadur Ojha, Astha Sharma और 164 अन्य को यह पसंद है.
5 shares

Anju Sharma sunder kavita
29 अक्टूबर 2012

Manisha Kulshreshtha आखिरी पंक्तियाँ तो गज़ब!

Alok Kumar बहुत अच्छा !

Dhruv Gupt ज़िन्दगी को बड़ी अदा से जिया
गरचे तनहा हुए , वीरान हुए !
29 अक्टूबर 2012

Swatantra Mishra akela hai jaise kumar mukul


Dinanath Sahani like poem


Arun Pandey wah...

Om Prakash Pandey har taraf har jgah beshumar aadamee , phir bhee tanahaaiyon ka shikaar aadamee .

Shyam Bohare ·   yhi to vidmbna hai

Parmanand Shastri ati sundr.

Tajender Singh Luthra wah

डॉ. सुनीता एक बेहतरीन कविता.....अकेले तारे के संग/ हजारों सितारे भी टूटे हैं/जमी से अस्मा तक/ सारे बेचारे बिखरे हैं/कुछ बुदबुदाते हुए उठे हैं/कुछ गुदगुदाते हुए खिले हैं/बस सोचते हुए/ तारे ऐसे ही घुले-मिले हैं...डॉ.सुनीता
7 जनवरी 2013

Dharmendra Kumar Kushwaha nyc

Neetu Chaudhary har kissi ke dil me yaha khala h ....wese hamesha ki trah aapne bot gahre shabdo me baat kahi h

DrRaju Ranjan Prasad ..........हंसा जाए अकेला

Pritam Singh Bahut sunder .aapney ye panktiya likh kar kuchh ehsas kara diya

RaJat Rani Meenu achhi kavita hai

Ram Gurjar nicccc ...sir ji........

अवनीश सिंह चौहान mitra, ham sab akele hain

Vijendra Kriti Oar Mukul Ji bahut dinoke bad aapki kvita padhne ko mili hae.
28 सितंबर 2013

Mahesh Punetha अकेले कहाँ हैं हम .......आग ,हवा , पानी , भूमि और आकाश हैं हमारे साथ .......चाँद ,तारे और सूरज हैं हमारे साथ .......परिवार ,समाज ,देश और दुनिया है हमारे साथ ........अन्याय , अत्याचार , शोषण ,उत्पीडन के खिलाफ लड़ते लोग हैं हमारे साथ ......सुन्दर समाज का स्वप्न देखने वाले करोड़ों -करोड़ लोग हैं हमारे साथ ........अकेले कहाँ हैं हम ......
28 सितंबर 2013

Shatrujeet Singh fine

Sharma Ramakant Khoob , Bahut khoob !
28 सितंबर 2013

Ranjana Bisht sundar

Praveen Govind anupam

Dharmender Srivastava Akelay hain to kya gam hai............

Akhilesh Kumar बहुत खूब

Ashish Mishra Aapki kavitaon men se kai meri pasandida kavitayen hain par yahi bat is kavita ke bare men nahin kah pa raha hun.mujhe lagta hai ham ret ke kan aur taron ki tarah (ek dusare se alag )nahin balki ped ke patton ki tarah jude huye hain.yah sabgyata ki tarah akela vali bat kuch kam samajh men ayi.
13 मार्च 2014

Bholeshwar Upmanyu अकेला ...वाह

Kumar Mukul
शुक्रिया आशीश भाई, इस कविता में पहला अकेला आदमी वह वर्ग है जो इस सभ्यता का निर्माण करता है, यह सभ्यता उसे अकेला कमजोर करती जाती है, पर दूसरी चोटियों केा चूमती सभ्यता है उसका अकेलापन अलग है 13 मार्च 2014

Birendranath Bariar kaya bat hai mukul jee..

Prabal Mahto Bahut achchha... Likhna jari rakhen

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