कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

मुक्तिबोध की कविता : अज्ञात, शून्य और फैण्टेसी


‘ मौत अब नये-नये बच्चे जन रही है।
जगह-जगह दाँतदार भूल,हथियार-बन्द ग़लती है,जिन्हें देख,दुनिया हाथ मलती हुई चलती है।  
मुक्तिबोध  की 1966 में  लिखी गयी कविता  शून्य   की उपरोक्त्  अंतिम पंक्तियां आज के भारत के और दुनियाभर के माहौल को किस तरहप्रतिबिंबित करती हैं इसे कोई भी देख सकता है। हर जगह अपहरणबलात्कारखून-खराबे की खबरें जैसे आम हैं। आत्महत्या में हम अव्वल हैं। उत्तरप्रदेश में बलात्कार के बाद हत्या और विवाहिताओं को जलाने की खबरें रोजाना की है। नाइजीरिया में तीन सौ लडकियों का अपहरण बोकोहरम कर लेताहै तो सीरियाइराकअफगानिस्तान में आतंकवाद के बढते कदमों ने अमेरिका जैसे स्वयंभूदारोगा राष्ट्र के माथे पर शिकन ला दी है। इस कविता काआरंभ ही शून्य के इस ‘बर्बर’, ‘काले’ और ‘नग्न’ चेहरे से होता है जिसके ‘जबडे में मांस काट खाने के दरांतीदार दांत हैं’ और कवि इसके कारक के रूपमें हमारे भीतर वर्तमान ‘अभाव’ को देखता है जो समय की मार खा खाकर लोगों का ‘स्वभाव’ बनता जा रहा है। यह
 ‘शून्य उपजाऊ है 
जगह-जगह करवत,कटार और दर्रात,उगाता-बढ़ाता है
मांस काट खाने के दाँत।
इसी लिए जहाँ देखो वहाँ
ख़ूब मच रही हैख़ूब ठन रही है 
मुटठी भर लोगों के हाथों में पूंजी और सत्ता के केंद्रीकृत होते जाने से अभाव के इस दैत्य को शून्य में अपना जबडा फैलाने में मदद मिलती है,नतीजतन यह बीभत्स मार-काट है। मुक्तिबोध के यहां शून्य की फंतासी ठोस है इसलिए कि यह जनअभावों और उससे जन्मी समस्याओं कोप्रतिबिम्बि‍त करती है। ‘एक अरूप शून्य के प्रति’ कविता में भी उनका शून्य अपने जाने-पहचाने ठोसपन के साथ अभि‍व्यक्त होता है -
‘ रात और दिन
तुम्हारे दो कान हैं लंबे-चौड़े
एक बिल्कुल स्याह
दूसरा क़तई सफ़ेद 
मुक्तिबोध देख पाते हैं कि आम जन के मिथकीय चरित्र इस शून्य में ही पनाह पाते हैं और उसके सफेद-स्याह पक्षों को सामने लाते हैं -
और इस तरह ज़माने के शुरू से
आसमानी शीशों के पलंग पर सोए हो।
और तुम भी खूब हो,
दोनों ओर पैर फँसा रक्खे हैं,
राम और रावण को खूब खुश,
            खूब हँसा रक्खा है  
अभावों के इस शून्य से हम पार पा सकें तो हमें इन फंतासी का निर्माण करते इन अतिमानवी चरित्रों की जरूरत ही नहीं पडेगी। फिर हर साल इसशून्य में पैदा हो रहे रावण और राम के लिए जगह ही नहीं बचेगी। पर शून्य की विराटता के रखवाले इसके दांतदार बर्बर चेहरे को और तराशते जाते हैंताकि हर बार जब-जब होंही धरम के हानि की तर्ज पर राम-रावण का खेल आम जन को उलझाए रखने को रचा जा सके और उनके महामानता केप्रतिमानेां को समझने और उसे बिखेरने की ओर आम जन का ध्यान ही ना जा पाए कभी। उन सबके पास अपने अपने पुष्पक विमान हैं जो आम जनको देव-दानव की दुविधा में छोड कर अपने अपने स्वर्ग लोक को चले जाते हैं इस विश्वास के साथ कि उनके दांतदार शून्य में फिर फिर पैदा होते रहेंगेदेव-दानव और उसको खेल देखने दिखाने को वे भी अवतरित होते रहेंगे बारंबार। इसे मुक्तिबोध स्पष्ट देख पाते हैं -
सृजन के घर में तुम
मनोहर शक्तिशाली
विश्वात्मक फैंटेसी
दुर्जनों के घर में
प्रचंड शौर्यवान् अंट-संट वरदान!!
         खूब रंगदारी है,
तुम्हारी नीति बड़ी प्यारी है।
विपरीत दोनों दूर छोरों द्वारा पुजकर
         स्वर्ग के पुल पर
    चुंगी के नाकेदार
भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेटरिश्वतखोर थानेदार !!
शून्य को इस तरह भरा-भरा ठोस रूप में देखना कि ठोस के अस्त‍ितत्व को ही चुनौती मिलने ल्रगेमुक्तिबोध की अपनी खास पहचान है। इस तरहठोस को शून्य में लटका कर वे उसका ज्यादा सही आकलन कर पाते हैं। वैसे तो यह मुक्तिबोध की खूबी है पर उनके समकालीनकवियों के कविशमशेर बहादुर सिंह के यहां भी जहां तहां शून्य ऐसे ठोस चित्रों से भरा-भरा अभि‍व्यक्त हुआ है।  ऐसे मामलों में मुक्तिबोध से शमशेर की समानता यहहै कि दोनेां के यहां वह ठोसजीवन की किसी तल्ख सच्चाई को अभि‍व्यक्त करने का माध्यम बनता है। यहां हम शमशेर की कविता ‘यह शाम है’ को उदाहरण के रूप में सामने रखकर देख सकते हैं। इस कविता में कवि शाम के आसमान को जब देखता है तो वह उसे वायवीय और मेघाच्छादितआसमान की तरह नहीं दिखताइसके उलट वह उसे पके हुए अनाज के खेत जैसा और लहू-भरी दरातियों ओर आग से भरा दिखता है , क्योंकि उसमेंउसे गवालियार के मजूर का हृदय धुंऑं-धुंऑं सुलगता हुआ महसूस होता है। यहां हम देख सकते हैं कि आम जन का त्रास जिस तरह से मुक्तिबोध केशून्य को मथता है उसी तरह शमशेर का शून्य भी मजूरों और किसानेां की पीडा से ही उद्वेलित होता रहता है -
यह शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का।
लपक उठीं लहू-भरी दरातियाँ,
            - 
कि आग है :धुआँ धुआँ
सुलग रहा
गवालियार के मजूर का हृदय 
मुक्तिबोध के लिए शून्य ही सत्य है। क्योंकि तमाम संभावनाओं की सृष्टि के लिए स्पेश वहीं है। नये सितारों के जन्म का स्पेश वहीं है। जो भी नयीजीवंतता जन्म लेगी वह इस खालीपन में ही जन्म लेगी। बाकी जो ठोस है और ठस होने की ओर है वे सारे सितारों भी अपने लिए अपना अपनाब्लैकहोल इसी खाली स्पेश में रच रहे हैंऔर उसी काल विवर में उन्हें एक दिन आखि‍र को बिला जाना है , नष्ट हो जाना है। क्योंकि –
ये ज्योति-पिण्ड
ह्रदय में महाशक्ति रखने के बावजूद
अन्धे हैं नेत्र-हीन
असंग घूमते हैं अहेतुक
असीम नभस् में
चट्टानी ढेर है गतिमान् अनथक ’ 
इसलिए सर्जना का केंद्र वह शून्य ही है –
शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है
शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है
सत्य केवल एक जो कि
दुःखों का क्रम है ’ 
यहां मुक्तिबोध की विचार श्रृंखला बुद्ध के जीवन-निष्कर्ष कि ‘ दुख ही जीवन की कथा’ हैको स्वीकारती है।
'एक साहित्यिक की डायरीमें एक जगह मुक्तिबोध लिखते हैं - '...मुझे अज्ञात से डर लगता है   मालूम कौन सा अज्ञात अब मेरा इंतजार कर रहाहै  ... किंतु साथ ही इन विवशताओं से पराजित होने की आवश्यकता  नहीं है  ज्ञात  से अज्ञात की ओर जाने का कार्यक्रम बना डालो , डरो  नहीं ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विवशताएं टूटती रहेंगीउसकी सरहदें टूटती रहेंगी। लेकिन जिस दिन से आप केवल ज्ञात से ज्ञात कीओर जाएंगेउस दिन आप केवल अपनी ही  कील पर अपने ही आसपास घूमते रहेंगे।एक  तरह से देखें तो ज्ञात की  विवशाताओं को तोडने के लिएही मुक्तिबोध अज्ञात की ओर जाने का उपक्रम करते रहते हैं।  मुक्तिबोध का अज्ञात ज्ञात से विस्तृत है। इसी विस्तृत आकाश में उन्हें ज्ञात कीसीमाएं दिखती हैं और वे उसका मूल्यांकन करने को जगह निकाल पाते हैं।  उनका शून्य और अज्ञात ज्ञान या  विचार से खाली शून्य नहीं हैवहभविष्य के संभव विचारों से परिपूर्णता की ओर ले जाने वाला शून्य है। वह वो है जिसे अभी तक जाना नहीं जा सका हैना कि वहजिसका किअस्तित् ही नहीं है। इस शून्य में स्थित होकर ही वे वहां अवस्थित तमाम ग्रह-नक्षत्रों की वस्तुस्थिति को माप पाते हैंउसका मूल्यांकन कर पाते हैं।इसीलिए वे ज्ञात पर अज्ञात को तरजीह देते दिखते हैं।
इसीलिए मुक्तिबोध ज्ञात मात्र से रचना करने तक खुद को सीमित नहीं करते। जो अज्ञात है उस तक जाने के लिए शून्य के विचलित करनेवाले भंवरोंके पार जाने को अपनी अलग फैण्टेसी रचते हैं। क्योंकि ' कवि की यह फैण्टेसी भाषा को  समृद्ध बना देती हैउनमें नये अर्थ-अनुषंग भर देती है,शब्द को नये चित्र प्रदान करती है। इस प्रकारकवि भाषा निर्माण करता है। जो कवि भाषा का निर्माणा करता हैविकास करता हैवह निस्संदेह महानकवि है।इसलिए मुक्तिबोध की कविताओं की फैण्टेसी अगर अगाध लगती है और उसके पार जाने को परिश्रम करना पडता है तो यह  हमारी सीमाओंको बतलाता हैमुक्तिबोध की नहीं। मुक्तिबोध के फैण्टेसी के इस  अज्ञात क्षेत्र मेंशून्य में अगर हम उतरेंगे  और दूर तक जाएंगे तभी ज्ञात सूरज-चांद के अलावा बाकी के तमाम नक्षत्रों के दर्शन कर पाएंगे। उसमें उतरे  बिना हम दूर से ही शून्य को खाली मानकर अगर उसमें उतरने से बचेंगे तोबाकी ब्रह्मांड का पता नहीं पा सकेंगेअपनी ही गंगा तक सिमटे रह जाएंगे बाकी असंख्य आकाशगंगाओं का पता नहीं पा सकेंगे।
फैण्टेसी की ताकत की व्याख्या करते 'कामायनी : एक पुनर्विचारमें मुक्तिबोध लिखते हैं - '... ज्ञान-गर्भ फैण्टेसी वास्तविक जीवन ही का प्रतिनिधित्वकरती है। लेखक वास्तविकता के प्रदीर्घ चित्रण से बच जाता है। वहसंक्षेप मेंज्ञान-गर्भ फैण्टेसी द्वारासार-रूप में , जीवन की पुनर्रचना करता है।

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