शनिवार, 6 सितंबर 2014

बहन भाषाएं हिंदी-उर्दू



हिंदी-उूर्द जैसी बहन भाषाओं को सांप्रदायिकता की जमीन से देखने वालों को इसे लेकर लोगों में दरार डालने में सफलता नहीं मिली और उच्च्तम न्यायालय ने भी पच्चीस साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उर्दू को प्रदेश की दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिए जाने को उचित ठहराया। देखा जाए तो कुछ लोगों और संगठनों द्वारा जनता से जुडे तमाम मसलों को राजनीतिक लाभ-हानि के हिसाब से अवसरवाद की छडी से पीटना उन्हें किसी भी मुल्क को आगे बढने से रोकनेवाली भूमिका ही प्रदान करता है। उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में उर्दू को सरकारी कामकाज की दूसरी भाषा घोषित करने के फैसले पर गुरुवार को अपनी स्वीकृति की मुहर लगाते कहा है कि इस देश के भाषाई कानून कठोर नहीं बल्कि भाषाई पंथनिरपेक्षता का लक्ष्य हासिल करने के लिए उदार हैं।
1989 में उत्तर प्रदेश सरकार ने यूपी राजभाषा कानून में संशोधन कर उर्दू को प्रदेश की दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया था। उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन उर्दू को प्रदेश में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलना रास नहीं आ रहा ।  सम्मेलन के वकील श्याम दीवान का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 345 के प्रावधानों को बारीकी से समझा जाए तो हिंदी के साथ किसी दूसरी भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा नहीं दिया जा सकता। प्रदेश सरकार ने सिर्फ अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने के लिए ऐसा किया है। पर प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपील पर व्यवस्था देते कहा कि संविधान के भाषाओं से संबंधित अनुच्छेद 345 में ऐसा कुछ नहीं है जो हिंदी के अतिरिक्त राज्य में एक या अधिक भाषाओं को दूसरी भाषा घोषित करने से रोकता है।  शीर्ष अदालत ने इस संबंध में बिहार, हरियाणा, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे कई राज्य विधानमंडलों का उदाहरण देते कहा कि इन राज्यों ने हिन्दी के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं को भी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता दी है। दिल्ली में हिन्दी के साथ ही पंजाबी और उर्दू को दूसरी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। पीठ ने यहां तक कहा कि अगर कोई भाषाई संगठन राष्ट्रपति के पास जाकर किसी भाषा को राजभाषा के दर्जे में शामिल कराने की मांग करता है तो राष्ट्रपति चाहें तो सीधे राज्य सरकार को उस भाषा को राजभाषा में शामिल करने का निर्देश दे सकते हैं। इन प्रावधानों को व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए न कि संर्कीण रूप में।  
भाषा को लेकर उटपटांग दलीलें देकर आम जन को विभाजित करने वालों को अपनी समझ साफ करने की जरूरत है। हिन्दुस्तान के ख्यातिप्राप्त शायर रघुपति सहाय फिराक अपनी पुस्तक उर्दू भाषा और साहित्यमें स्पष्ट लिखते हैं –ऐसे बीसो हजार उदाहरण दिए जा सकते हैं जिससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदी शब्दों को एक विशेष ढंग से बोलने या लिखने का नाम उूर्द है। यह ढंग या शैली ही उर्दू भाषा की आधार-ि‍शला है।वे यह भी लिखते हैं कि – यह समझना भ्रम होगा कि हिंदी शब्दों में केवल अरबी और फारसी शब्दों को मिला देने से उर्दू बनती है। शत प्रतिशत हिंदी शब्दों से भी बनी हुई उर्दू गद्य और कविता की किताबों मिलती हैं।इसलिए भाषा को किसी जात या जमात से जोडकर सतही ढंग से देखे जाने से आगे जाकर हमें उसकी जनमत में पसरी जडों को पहचानना होगा।


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