कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 24 अगस्त 2014

अनंतमूर्ति स्मृति - विनय कुमार की कविताएं

पटाखे की मौत
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पटाखे की मौत
वहां उधर
उस तरफ
उस गली में
उत्सव किस बात का
जहां थोड़ी देर पहले
पटाखों की भौंक

एक सजीव मूर्ति ने पूछा
दूसरी सजीव मूर्ति से
दूसरी ने पूछा तीसरी से
तीसरी ने चैाथी से
चैाथी ने पांचवीं से
और पूछने का सिलसिला
पहुंचा अंत तक

अंत ने पूछा अनंत से

कहा अनंत ने
थोड़ी देर पहले
थोड़ा-सा मरा मैं  
उसी का उत्सव था
बस  थोड़ा ही लम्बा
मृत्यु के क्षण से

किंतु
मैं तो अभी जीवित हूं
तुम्हारी जिज्ञासा में
उत्सव ही नहीं रहा
बेचारा
मरा पटाखे की मौत!

यू आर अनंतमूर्ति!
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हंसो हंसो हे सजीव मूर्ति
मैं नहीं तुम
तुम हो अनंतमूर्ति
यू आर अनंतमूर्ति!

मेरा क्‍या मेरा कौन...
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सारी की सारी
भूमि सत्ता की
सरिता भी
वन-पहाड़
सड़क
सदन
सौध्
सभी सत्ता के
मेरा क्या
मैं कौन

शायद मैं शब्दों में मग्न
सनसनाहट
मुद्रा भंगिमा भाव अर्थ की
विह्वल विचार
प्राण मैं
प्राणों की आकुलता मेरी
सत्ता को
मेरी आकुलता से आंच

राजकीय आदर का केन्द्र
किंतु मेरी काया निष्प्राण
हंसती है प्रश्न-दग्ध् पीढ़ी
हंसती है मेरी संतान!

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