मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

नेताओं की भेंडचाल






भारतीय राजनीति में यह समय अपने नेताओं की भेंडचाल के लिए जाना जाएगा। ये नेतागण चाहे किसी भी पार्टी या क्षेत्र के हों, अपनी सारी अकल ये नकल में लगा रहे हैं। किसी नेता ने सरदार बल्‍लभ भाई पटेल की अद्वितीय मूर्ति बनाने की ठानी तो दूसरे ने रामायण मंदिर बनवाने का एलान कर दिया फिर तीसरा ही पीछे कैसे रहता सो वह बुद्ध की मूर्ति बनवाने पर पिल पडा। वैसे भी यह मुखौटाधारी समय है। मोदी की सभा होगी तो उसमें मोदी के मुखौटे बिकने लगेंगे, आप की सभा होगी तो उसमें गांधी टोपी पर टीप-टाप कर उसे बेचा और बांटा जाएगा। व्‍यक्तित्‍व और विचार आज गौण होते जा रहे हैं बस नकल कर लेनी है सामने वाले की, मुखौटे उपलब्‍ध हैं दुनिया भर के बस अपना नाप दे देना है।

अब पटेल पर मूर्ति बनेगी तो थोडा-बहुत उसे चर्चा में लाने भर को उनके विचारों की छतरी भी इधर-उधर तान दी जाएगी। पटेल की मूर्ति दुनिया में सबसे बडी बनायी जानी है तो लोग यह तय मान लें कि पटेल सबसे बडे नेता थे, गांधी, नेहरू, सुभाष सबसे बडे। लोग यह सोचने की जहमत नहीं उठाएंगे कि ये तमाम नेतागण अपने जमाने में अपना-अपना बडप्‍पन ताने नहीं चलते थे दसों दिशाओं में कि देखो बापू यह हमारा बडप्‍पन है अख्‍खा दुनिया में अव्‍वल, अब अपना यह सत्‍याग्रह और सदभाव का तम्‍बू-कनात समेटो और इस बडप्‍पन का लोहा मान लो।
अब नीतीश रामायण मंदिर बनाने में भिड गए हैं। नीतीश भी खुद को लोहिया से जोडते हैं। लोहिया रामायण मेला लगाने की बातें करते थे, इसकी बडी योजना थी उनकी। जिसमें भारत और दुनिया में जो सैकडो रामकथाएं हैं उनपर चर्चा कराने की मंशा थी उनकी, कि लोग जान सकें कि रामकथा एक वाल्‍मीकि की ही नहीं है, उसके कई रूप हैं और जिनमें अलग अलग कथा प्रसंग हैं। लोहिया की कोशिश  राम के बहाने इस सत्‍य को जाहिर करने-कराने की थी कि राम की कोई एक जड कथा नहीं है। लोगों ने अपने अपने परिवेश के हिसाब अपने अपने राम गढे हैं। जिससे लोग जान सकें कि किसी भी एक व्‍यक्ति द्वारा दूसरे व्‍यक्ति पर अपना राम थोपना उचित नहीं है, कि यह हमारे राम ही सर्वश्रेष्‍ठ हैं और इसी को पूजना होगा सबको। नीतिश ने लोहिया का नाम तो जपा पर उनकी भावना को समझने की जरूरत नहीं समझी और लग गए अपना झंडा उंचा कराने में, राम जी की सबसे उंची मूर्ति बनवा कर रामनाम लूटने में।
अब सरदार पटेल का कद उंचा करने की जददोजहद में भिडे मोदी को इससे मतलब नहीं कि सरदार के इस उंचे कद के नीचे भारत की कितनी जनता दब जाएगी। जैसी कि चर्चा है कि अगर मोदी की इच्छा के मुताबिक सरदार पटेल की मूर्ति बनाई जाती है तो बांध की ऊंचाई 20 से 25 मीटर ऊपर उठानी होगी और इसका नतीजा यह होगा कि आंशिक रूप से डूबे हुए क्षेत्र के हजारों परिवार पूरी तरह से डूब क्षेत्र में चले जाएंगे। इसके अलावा इतनी ही बड़ी आबादी आंशिक डूब क्षेत्र के दायरे में आ जाएगी। इन परिवारों के पुनर्वास के लिए पर्याप्त व्‍यवस्‍था कैसे होगी इस पर कोई विचार नहीं कर रहा।
अखिलेश बुद्ध की जिस मूर्ति निर्माण की परियोजना को आगे बढा रहे हैं उसकी घोषणा अफगानिस्तान में बामियान स्थित भगवान बुद्ध की मूर्ति तोड़े जाने के बाद प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने की थी। तत्‍कालीन सरकार ने मूर्ति बनाने का जो रिकार्ड बनाया था और उसे जिस तरह चुनाव के समय भुनाना चाहती थी उस पर चुनाव आयोग को टिप्‍पणी करनी पडी थी और मूर्तियों को ढंकवाने का आदेश देना पडा था। अब पिछली सरकार के उसी काम को आगे बढाने में अखिलेश सरकार भी लग गई है। पर यह विडंबना ही है कि जिस बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था और ईश्‍वर की पारंपरिक अवधारणा पर सवाल खडे किए थे उनके विचारों पर मंथन की जगह सरकारें उनकी मूर्ति बनवाने में अपनी सारी कूबत लगा रही है। पटना में  इससे पहले नीतीश कुमार एक विशाल बुद्ध स्‍मृति पार्क बनवा चु‍के हैं, जिसका निर्माण ढंग से पूरा भी नहीं हुआ था और उसके पत्‍थर उखडने लगे थे।  




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