कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

अरुण कमल का मूल स्‍वर करूणार्द्र और भय की भीतियों से भरा है...


अरुण कमल   
अरुण कमल की कविता नए इलाके मेंजो उनके चर्चित संग्रह की पहली शीर्षक कविता भी है, में दरअसल पुराने इलाकों की ही खोज है। कभी कवि गाँव-कस्बे की ज़िंदगी को छोड़ शहर आया था। फिर शहर महानगर में तब्दील होता गया। जब तक ताकत थी कवि भी उस गति में रमा रहा, पर अब गति से तालमेल ना बैठने पर उम्र के साथ उसे फिर उसी दुनिया में लौटने की सूझ रही है, जहाँ से शहर के तिलस्म में बंधा वह निकला था। आज लौटने की कोशिश करने पर वह देखता है कि वे इलाके भी अब पुराने ना रहे। उनसे तालमेल और कठिन है। ऐसे में ना खुदा ही मिलावाली परेशानी में फंसा कवि जार-जार स्मृत्तियों का रोना रो रहा है -
 
'
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढहा हुआ घर
और खाली जमीन का टुकड़ा जहाँ से बाएँ
मुड़ना था मुझे
...
यहाँ रोज कुछ बन रहा है
रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
'

 
कवि का महानगर के जिस सघन हिस्से में रहना होता है, वहाँ विकास उध्र्व दिशा में एक सीमा तक होकर अवरुद्ध हो गया है। इस जड़ता ने कवि स्वभाव को भी जड़ बना दिया है। अपनी ही उस जड़ता से ऊबा कवि नए इलाकों में जाता है तो एक-दूसरे किस्म की जड़ता (जिसे वह स्मृति के नाम से पुकार कर एक भ्रम पैदा करना चाहता है) को ढूंढ़ता है। रोज कुछ बनना उसे पसंद नहीं। उसे ढहा हुआ घर चाहिए। खाली भूखंड चाहिए।

 
'
अब यही है उपाय कि हर दरवाजा खटखटाओ
और पूछो,
क्या यही है वो घर
?'

 
कवि कोई खास घर खोज रहा है। जो खाली भूखंडों और ढहे घरों के बीच ही पहचान में आता था। दरअसल नए मकानों के होते कब्जे को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। जबकि रघुवीर सहाय इस भेड़-धसान संस्कृति को खूब पहचानते थे। वे लिखते हैं -यह संस्कृति ऐसे ही बूटे-ऊँचंगे मकानों को गढ़ेगी।अरुण कमल इन मकानों के अजनबीपन को न पहचान पा रहे हैं न भेद पा रहे हैं। बस बिसूर कर रह जाते हैं वे-

 
'
समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास
'

 
स्पष्ट है कि महानगरीय जीवन के आदी कवि को देर तक खोजना भारी पड़ रहा है। और पानी चला आ रहा है। हालाँकि घर बेशुमार हैं, पर उनसे उसका कोई संबंध नहीं है। नए विकास को वह स्मृत्ति के नाम पर खारिज कर देना चाहता है। नए विकास की अपनी नयी स्मृत्तियाँ होंगी ही, जिन्हें वह जानना भी नहीं चाहता।
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर।अब ऊपर वाले पर ही भरोसा है। वही रास्ता निकाले शायद। कुल मिलाकर यही अरुण कमल की कविताओं की पृष्ठभूमि है। एक फिजूल के भय की कृत्रिमता से पैदा हैं अधिकांश कविताएँ उनकी। जिनमेंबादल के घिरने का आतंक अकास के ढहने जैसा है।जहाँ स्मृत्ति का मानी जड़ अविवेकपूर्ण स्थितियों से है। ए.एल. बाशम अद्भुत भारतमें लिखते हैं कि यूरोप में साधारणतः मेघों की गरजन...अशुभ मानी जाती है। परंतु भारत के लिए वे...सौभाग्य सूचक समझे जाते हैं। अरुण कमल अंग्रेजी शिक्षक हैं, उन पर यूरोपीय कविता के प्रभाव के रूप में भी इस भय को हम देख सकते हैं। क्या कवि ने खुद भी कोई पीपल रोपा है कभी, आखिर विरासत के भरोसे स्मृतियाँ कब तक साथ देंगी।
'
न पाप कमाया न पुण्य ही रहा अक्षत'। यही कवि की पीड़ा है। न पीपल रोपा, उसे कटने-बिकने से बचा सका। और मुक्ति भी नहीं मिली। शायद यह दुख कवि को बार-बार सालता है।
अरुण कमल की कविताओं में विविधता काफी है। शमशेर, से लेकर आलोक धन्वा तक के ध्वनि-प्रभावोंवाली कविताएँ वहाँ मिल जाएँगी। कुछ पंक्तियाँ देखें -
 
'
वह क्यों रुक गया था उस रात वहाँ उस मोड़ पर
सुफेद मकान के आगे जो बत्ती की रोशनी में
और भी सुफेद लग रहा था...(फरमाइश)'

 
संग्रह की अनुभवशीर्षक कविता तो शमशेर की कापी-सी लगती है।

 
'...
पता नहीं आज भी आयेगी या नहीं
और तड़केगा रोम-रोम बलतोड़ की पीड़ा से
तसर वस्त्र के भीतर। मेरे दिल में इतनी मेखें हैं
कि तन सकते हैं प्यार के हजार शामियाने
पर हाय जिस किसी काग को कासिद बनाया
वही कंकाल पर ठहर गया। (मेख)
'

 
प्यार के शामियाने के लिए मेखें ही काफी नहीं हैं, कवि, थोड़ा खम भी पैदा करो।
फरमाइश, उस रात, आदि कई अच्छी कविताएँ हैं
अरुण कमल की। 'उस रात' कविता कवि 'एक आवारा कुत्‍ते की आत्‍मकथा' के बहाने व्‍यवस्‍था के लिए खतरा बनते जाते भूखे-आवारा- पागल आदमी की त्रासदी लिखता है -
 
'
मैंने किसका कया बिगाडा था
अगर भूख न होती और सडे मांस का लोंदा
तो कभी कोई पागल न होता'

 
अरुण कमल का मूल स्‍वर करूणार्द्र और भय की भीतियों से भरा है। इसे परंपरा में हम तुलसीदास के यहां देख सकते हैं। विनय पत्रिका में एक जगह तुलसी याचना के स्‍वर में कहते हैं कि - ' हे राम,तुमने बहुत से पापियों को तारा है, फिर मुझ कुत्‍ते के मुख से रोटी छीनकर खाने वाले इस अधम पर भी कृपा करो।'यह एक तरह की आत्‍मप्रताडना है और राम की आलोचना भी कि तुम जाने कैसे कैसे पपियों को तो तार देते हो फिर मुझे गरीब को ही भूल जाते हो। अरुण कमल के यहां आत्‍मप्रताडना का रूप बारहा मिलता है -''मेरे सरोकार' में एक जगह वे लिखते हैं -' कया नाली का कीडा जीना बंद कर देता है...मेरा भी यही सरोकार हे - जीना और इस धरती को जीने योग्‍य बनाना'



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