शनिवार, 14 सितंबर 2013

जनाक्रोश को मिली मंजिल



1200 पन्नों की चार्जशीट, 86 गवाहियों और 243 दिनों की सुनवाई के बाद आखिरकार निर्भया बलात्‍कार और हत्‍या मामले को लेकर आंदोलित लोगों के आक्रोश को उसकी मंजिल मिल गयी। 'निर्भया' के माता-पिता का कहना था कि इस केस में इंसाफ बस फांसी की सजा है, तो वह इंसाफ हुआ। पिछले साल 16 दिसंबर की रात चलती बस में पैरा-मेडिकल छात्रा से हैवानियत की हदें पार करने वाले चारों दरिंदों विनय शर्मा, पवन कुमार उर्फ कालू, अक्षय कुमार सिंह और मुकेश के अपराध को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी का मानते हुए उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई। सजा सुनकर एक आरोपी विनय शर्मा रोने लगा। जज ने सजा सुनाते हुए कहा कि यह ऐसा अपराध है, जिसने समाज को हिलाकर रख दिया। ऐसे समय में जब महिलाओं के खिलाफ अपराध चरम पर हैं, कोर्ट इस तरह के खौफनाक और वहशीयाना अपराध को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
इस मामले के एक आरोपी राम सिंह की मौत के  बाद उसके खिलाफ ट्रायल खत्म कर दिया गया था। उसने 11 मार्च को तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर कथित रूप से खुदकुशी कर ली थी। जबकि एक आरोपी के घटना के वक्त नाबालिग होने की वजह से जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने उसे हत्या और गैंग रेप समेत आईपीसी की तमाम धाराओं के तहत दोषी मानते हुए अधिकतम तीन साल के लिए सुधार गृह भेज दिया है। इस किशोर के इस तरह बरी होने को लेकर भी बहस चल रही है जिसने इस कांड में सर्वाधिक बर्बर तरीकों का उपयोग किया था। उनका सवाल यह है कि जो रेप करने के लिए जरुरत भर जवान हो गया है वो जवानों वाली सजा का भी हकदार क्‍यों ना माना जाये।
सजा के पहले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक तबका फांसी की जगह उम्रकैद की वकालत कर रहा था। बहसें और भी हैं , इस मामले में नौ महीने में फैसले आ गये जैसा कि आम तौर पर नहीं हो पाता। देश भर के लोगों के गुस्‍से और अपराध की प्रकृति को दखते हुए दबाव में यह फैसला जल्‍दी हो पाया पर इससे इस तरह के अपराधों पर कोई अंकुश पडा हो ऐसा नहीं दिख रहा। निर्भया कांड के बाद लगातार देश भर में हो रही ऐसी घटनाओं की बारंबारता बतलाती है कि हमें बदले और न्‍याय से आगे जाकर बदलाव के बारे में भी सोचना चाहिए। कि हमने कौन सी व्‍यवस्‍था खडी की है जिसमें हमारे किशोर और युवा अपने भीतर एक दरिंदा छुपाए जी रहे हैं। क्‍या वे जन्‍म से दरिंदे थे, क्‍या वे किसी जंगल में रह रहे थे या जंगल से आए थे। और अगर नहीं, वे हमारे आपके बीच से, एक तथाकथति विकसित आधुनिक समाज से आए हैं तो हमे अपने पास-पडोस और अपनी सामाजिकता की उन दरारों को देखना होगा जिनमें वे हमारे साथ साये की तरह पल बढ रहे होते हैं। हमें अपनी उस मानसिकता के बारे में सोचना होगा जिसमें हम मर्द को शेर के रूप में परिभाषित करते हैं और इन तमाम मर्दों की तथाकथित मर्दानगी का शिकार उनकी ही मां-बहनें हुआ करती हैं। प्रभावशाली जातियों की हिंसाप्रियता और स्त्री विरोध किस तरह शक्ति की उनकी पारंपरिक अवधारणा से जुड़ता है और उस अवधारणा में राजनीति और शहरों से निर्यातित आधुनिकता की तलछट ने और क्या क्या जोड़ा है। यह सब हमारे शोध का विषय होना चाहिए।  


1 टिप्पणी:

Lalit Chahar ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} 15/09/2013 को ज़िन्दगी एक संघर्ष ..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल - अंकः005 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | सादर ....ललित चाहार