गुरुवार, 9 मई 2013

सर्जन वह है जिसमें तुम अपना सब कुछ करते हो उत्सर्ग - बरीस पास्‍तरनाक



उचित नहीं है शोहरत पा लेना ।
समारोहित होना प्रशंसा की बात नहीं ।
ज़रूरत नहीं है अपनी रचनाओं को कोषगत कर रखने की
और न ज़रूरत है रखने की उन्हें मेहराबी गर्भगृहों में ।
 
सर्जन वह है जिसमें तुम अपना सब कुछ करते हो उत्सर्ग
शोर व सरापा ठीक नहीं और न छा जाना दूसरों पर ग्रहण बनकर ही
तुम्हारे होने का जब कोई अर्थ नहीं लगता
तब कितनी लज्जाजनक है चर्चा हर व्यक्ति के अधरों पर ।

चेष्टा मत करो झूठे अधिकार वाली ज़िंदगी के लिए
बल्कि अपने कार्य-कलापों को ऐसे ढालो
कि दूर-दूर की सीमाओं तक तुम्हें प्यार मिले
और सुन सको तुम आनेवालों वर्षों में होने वाली अपनी चर्चा ।

जीवन में रिक्तता रखो, रचनाओं में नहीं
और अपने अस्तित्त्व और अपनी होनी के
सम्पूर्ण अध्याय को, सम्पूर्ण खंड को
रेखांकित कर रखने में मत हिचकिचाओ ।

अवकाश ग्रहण कर अनदेखे में
कोशिश करो प्रच्छन्न रखने की अपने विकास को
जैसे तड़के सुबह, शिशिर की कुहेलिका छ्पा कर रखती है
अपने अंक में सपनाते ग्रामांचल को ।

तुम्हारे जीवंत चरण-चिह्नों पर
दूसरे जाएँगे क़दम-ब-क़दम चलकर
किंतु अपनी पराजय से स्वयं तुम
अपनी विजय अलग मत दरसाओ ।

और एक क्षण के लिए कभी भी अपने जज़्बात को
मत छलो और न बहाना ही करो छलने का ।
किंतु ज़िंदा रहो यही असलियत है
जीवंत रहो, जीवंत और तपित रहो अंत तक ।
अँग्रेज़ी भाषा से अनुवाद : अनुरंजन प्रसाद सिंह

5 टिप्‍पणियां:

BHARAT CHETANA(भारत चेतना) ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायें है मुकुल जी

BHARAT CHETANA(भारत चेतना) ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायें है मुकुल जी

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

आनंदमय, बेहतरीन, लाजवाब और विचारों की सटीक अभिव्यक्ति | आभार

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज ( २३ जून, २०१३, रविवार ) के ब्लॉग बुलेटिन - छह नीतियां पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

Madan Mohan Saxena ने कहा…

उत्क्रुस्त , भावपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति .
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें .