कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 7 मई 2013

खून फिर खून है ...साहिर लुधियानवी


ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढता है तो मिट जाता है
खून फिर खून है, टपकेगा तो जम जायेगा

खाक-ए-सेहरा पे जमे या कफ़-ए-कातिल पे जमे
फ़रक-ए-इन्साफ़ पे या पा-ए-सलासल पे जमे
तेघ-ए-बेदाद पे या लाश-ए-बिस्मिल पे जमे
खून फिर खून है टपकेगा तो जम जायेगा

लाख बैठे कोइ छुप छुप के कमीन गाहों में
खून खुद देता है जल्लादों के मसकन का सुराग
साजिशें लाख उढ़ाती रहें ज़ुलमत का नकाब
ले के हर बूंद निकलती है हथेली पे चराग

ज़ुल्म की किस्‍मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहो
जब्र की हिकमत-ए-पुरकार के ईमा से कहो
मेहमल-ए-मजलिस-ए-अकवाम की लैला से कहो
खून दीवाना है, दामन पे लपक सकता है
शोला-ए-तुंद है, खिरमन पे लपक सकता है

तुम ने जिस खून को मकतल में दबाना चाहा
आज वो कुचा-ओ-बज़ार में आ निकला है
कहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन के
खून चलता है तो रुकता नहीं सन्गीनों से
सर जो उठता है तो दबता नहीं आईनों से

ज़ुल्म की बात ही क्या, ज़ुल्म की औकात ही क्या
ज़ुल्म बस ज़ुल्म है, आगाज़ से अंजाम तलक
खून फिर खून है, सो शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें के मिटाओ तो मिटाये ना बने
ऐसे शोले के बुझाओ तो बुझाये ना बने
ऐसे नारे के दबाओ तो दबाये ना बने

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