मंगलवार, 7 अगस्त 2012

रैलियों के निहितार्थ

पाटलिपुत्र टाइम्‍स 1995 की संपादकीय टीम में रहकर लिखे गये संपादकीयों में कुछेक


पिछले पांच वर्षों में बिहार की राजनीति को जो एक मात्र शीर्षक दिया जा सकता है। वह 'रैलियों की राजनीति' ही हो सकता है। रैली की राजनीति कमोबेश थैली की राजनीति भी है। भारतीय राजनीति में रैली व थैली की राजनीति कांग्रेस से ही अन्‍य क्षेत्रीय पार्टियों को विरासत में मिली है। पर लालू प्रसाद ने इसे अपनी राजनीति का प्रतीक चिन्‍ह ही बना डाला। यादव, कुशवाहा, भंगी, तेली, कुर्मी और भाट तमाम रैलियां-महारैलियां पिछले पांच वर्षों में इस सरकार ने आयोजित करवाईं।
    एक नजर में चाहे यह जातीय जनजागरण की तरह लगता हो पर ध्‍यान से देखने पर यह साफ हो जाता है कि यह सत्‍ता को और ज्‍यादा केंद्रित करने की कोशिश है। एक ओर जहां पार्टियों का जनाआधारित या कैडर आधारित ढांचा टूट रहा है वहीं सत्‍ता को केंद्र की ओर से गांव से कस्‍बों की ओर खींचने की लगातार कोशिशों का नतीजा हैं ये रैलियां।
    रैलियों के कारण नेताओं को गांव-गांव घर-घर जाने की तकलीफों से छुटकारा मिलता है, थोडा चारा फेंककर वह गरीब जनता को नगरों-महानगरों में ही बुलवा लेती है और उसे अपनी अखंड-सत्‍ता के दर्शन करवा देती है। सत्‍तू-गुड के पैकेट और तमाम विधायकों  के आवासों पर भोजन की व्‍यवस्‍था, मुफत का आना जाना। फिर क्‍या कष्‍ट।
    बसों ट्रकों से भीड ले आना,बडी बडी कटआउट तैयार करवाना, यह सब आम फैशन हो गया है। पहले नेता की छवि से आकर्षित होकर भाषण सुनने के लोभ में भीड आती थी पर आज भीड को लाने की कीमत बसों ट्रकों की पेट्रोल से भरी टंकियां हैं।
    एक ओर पंचायती राज का झुनझुना दूसरी ओर जनता से बार-बार नगरों में आकर उनका राज वैभव, बाहुबल-धनबल देख जाने का आग्रह, यह किस लोकतंत्र की ओर जा रहे हैं हम। एक दिन ऐसा आएगा जब यह लोक इस तंत्र से उब जाएगा। वह तब भी आएगा पर इसे देखने नहीं , इसे नष्‍ट करने के लिए। इस तंत्र को उस स्थिति से बचने के लिए सचेत हो जाना चाहिए।



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