शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

मैंने गलत सवाल नहीं उठाया था - प्रकाशन विवाद

  • Kumar Mukul शिल्पायन ने साल भर पहले ही मेरी इस किताब के प्रकाशन से मना कर दिया था एक विवाद के बाद पर अभी भी किताब इस साईट पे बिकती दिख रही है इसके क्या मानी है ,मित्र समझाएं
    मंगलवार को 21:01 बजे ·
  • Raju Ranjan ‎...order dekar dekhiye book aapke ghar pahunchti hai ki nahi ....agar pahunchti hai to editor ka purba hawa bahana padega....
    मंगलवार को 21:04 बजे · · 1
  • Ashish Pandey इसका अर्थ है कि डाटाबेस में एडिटिंग नहीं की गई !!और यदि फ्लिपकार्ट में add हो रही है तो उन्होंने छापी है फिर !!किसी अन्य के द्वारा आर्डर करके मंगवाएँ फिर आगे की बात हो सकती है ..
    मंगलवार को 21:09 बजे · · 2
  • Kumar Mukul देखते हैं इस तरह कर के भी ,उन्होंने नहीं छापी है जैसा वे कह रहे हैं तो इस तरह के झूठे विज्ञापन के क्या मायने ,यह तो नेट की चीजों की अविस्वसनिअता बतलाता है
    मंगलवार को 21:16 बजे ·
  • Ashish Pandey यह लापरवाही है.... बात चलते ही अपडेट तो कर दी !रिमूव करने पर सीक्वल प्रोग्रामिंग को बदलना होगा उस पर काम नहीं किया !!क्योंकि फिर इसके बाद जो पुस्तकें आई होंगी सबके कोड पुनः भरने पड़ेंगे सो मेहनत से बचने के लिए यह लापरवाही है ...
    मंगलवार को 21:21 बजे ·
  • Anju Sharma Mukul ji, ye laparvahi se jyada to beimani lag rahi hai.....
    मंगलवार को 21:25 बजे ·
  • Kumar Mukul haan beimani to hai hi, salon is kitab ka bigyapan hans aadi patrikaon me hota raha...ab lekhak ke pas dekhne ko net pe yah jhutha prachar hai,is kitab ke saath ki baki kitabon pe bhi to sawal uthta hai ki unme bhi kisi ke sath to aisa nahi hua
    मंगलवार को 21:51 बजे · · 1
  • Kumar Mukul अवनीश सिंह चौहान, माया मृग, सत्‍यानंद निरूपम, अशोक कुमार पांडेय आदि इस विषय से जुडे मित्रों से आग्रह है कि वे इस बारे में मेरी मदद करें कि मैं इस फ्राड से कैसे निपटूं
    मंगलवार को 22:06 बजे ·
  • Ashok Kumar Pandey Behtar ho ki aap us website par case kijiye. Lalit ka saaf kahna hai ki unhone yah kitab nahi chhapi hai. kya aapne is website se tathyon ki chhanbeen kii hai? Apka shilpayan ke sath kya samjhauta hua tha? contract ki sharten kya thiin? Yahan Public manch par koi hal nahi niklne vala. Yahan beimani ka aarop lagane se behtar hota ki aap Legal karyvahi karte.
    बुधवार को 00:53 बजे · · 1
  • Kumar Mukul अभी शिल्‍पायन के प्रकाशक ललित जी का फोन आया कि नेट पर यह उनके दवारा नहीं डाला गया है,कि मैं इसे हटा लूं, मैंने कहा कि आप फेशबुक पर हैं और वहां आप यह बात लिख दें कि यह विज्ञापन आपके दवारा नहीं
    बुधवार को 00:54 बजे ·
  • Kumar Mukul और जब तक यह नेट पर है मेरा अधिकार बनता है कि मैं इसे इस तरह सामने रखूं
    बुधवार को 00:55 बजे ·
  • Kumar Mukul अगर यह गलत है तो यह केस ललित जी करें क्‍योंकि मेरी ही नहीं तमाम किताबों की बाबत वहां लिखा है मतलब सारी किताबों कोप्रिट एशिया इस तरह बेच रहा है या उसका कोई इस्‍तेमाल कर रहा है
    बुधवार को 00:58 बजे ·
  • Kumar Mukul अशोक जी अगर कोई समझौता नहीं हुआ था तो फिर हंस अदि पत्रिकाओं में 200 रूपये पुस्‍तक की कीमत के साथ जो विज्ञापन आए वो बिना समझौते के क्‍यों आ गये
    बुधवार को 01:03 बजे ·
  • Ashok Kumar Pandey समझौता नहीं हुआ था, यह आप बता रहे हैं. आमतौर पर सही तरीका यही होता है कि पहले कांट्रेक्ट हो उसके बाद किताब छपे. खैर यह आपके और उनके बीच का मामला है. अब जब प्रकाशक कह रहा है कि किताब छपी ही नहीं है, वह बाज़ार में उपलब्ध नही है, उसके कैटलाग में नहीं है...तो एक वेबसाईट पर यह कैसे है यह वेबसाईट से पूछा जाना चाहिए. संभव है कि पहले यह योजना में रही हो, इसका विज्ञापन भी किया गया हो, फिर चूंकि कोई कांट्रेक्ट था ही नहीं तो प्रकाशक ने अपनी सुविधा से इसका प्रकाशन न किया लेकिन वेबसाईट ने इसे अपने यहाँ से हटाया भी नहीं. मेरा बस यह कहना है कि इस मंच से इसका कोई हल निकल ही नहीं सकता. बेहतर यही होगा कि इस वेबसाईट तथा प्रकाशक से बात कर मुद्दा सुलझाया जाय.
    बुधवार को 04:00 बजे · · 2
  • Kumar Mukul अशोक जी आपसे जैसी कि अभी बात हुयी आपने वेबसाईट को मेल किया है तो उसका जवाब आने दीजिए, रही बात प्रकाशक की तो मेरी ओर से आप ही बात कर लें और मुझे बातएं, मेरा बस इतना कहना है कि जब तक मेरी किताब का नाम पिंट एशिया पर शिल्‍पायन के साथ टैग है मैं उस तस्‍वीर को यहां और बाकी जगह जारी करूंगा, बाकी कमेंटस मैं हटा सकता हूं अगर उसमें कुछ आपत्‍तीजनक हो,
    बुधवार को 04:11 बजे ·
  • Alok Srivastava मुकुल जी...अगर प्रकाशक ने आपकी पुस्तक को प्रकाशित ही नहीं किया तो किसी भी वेबसाइट पर इसे जारी करना और दिखाना गैरकानूनी है.
    मै तो बोलूँगा की आप इस वेबसाइट से और प्रकाशक से पहले पूरा जवाब मांगे...हो सकता है की गलती से वेबसाइट पर से पुस्तक हटाई नहीं गयी हो और शायद सचमुच में पुस्तक नहीं छपी हो क्योकि पुस्तक का आवरण भी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है.
    लेकिन किसी भी परिस्थिति में ये सरासर गलत है और प्रकाशक को इस का जवाब देना ही होगा...आप कृपया गूगल में सर्च कर के देखिये की ये पुस्तक कही किसी और वेबसाइट पर भी तो उपलब्ध नहीं है..
    बुधवार को 07:56 बजे · · 2
  • Kumar Mukul आपने सही कहा आलोक जी, मैंने पिछले विवाद के समय ही प्रकाशक से कहा था कि आप इस साइट पर से मेरी किताब हटवा दें क्‍योंकि आपकी बाकी सारी किताबें का भी प्रचार वहां हैं, पर उन्‍होंने फिर कोई जवाब नहीं दिया, वे बस एकतरफा चाहते हैं कि मैं इसकी कोई चर्चा ना करूं,अब मेरी किताब नाम कीमत के साथ अगर कहीं दिख रही तो मुझे उसकीचर्चा का अधिकार कैसे नही है
    बुधवार को 08:14 बजे ·
  • Kumar Sujeet Singh Kanhaiya मैंने printasia को अभी enquiry भेजी है. साइट ने २४ घंटों में जवाब देने की बात कही है. जवाब मिले तो आगे का पता चले:
    कविता का नीलम आकाश
    Author : कुमार मुकुल
    Language: Hindi
    Kindly inform the ISBN and year of publication of this book.
    How long it will take you to send the book after order?
    Thanks
    बुधवार को 08:37 बजे · · 1
  • Kumar Mukul चलिए भाई अच्‍छा किया आपने , देखें जवाब क्‍या आता है, और इधर का लिखा कुछ पढाइए
    बुधवार को 08:54 बजे ·
  • Kumar Sujeet Singh Kanhaiya यह प्रकाशन का उद्योग कुछ अजब है.
    कम्प्यूटर संबंधित मेरी दो अंग्रेजी पुस्तकें दिल्ली के गलगोटिया और कलकत्ता के एक प्रकाशक ने छापी थीं. गलगोटिया ने तो धेले भर रायल्टी न दी (पुस्तक की 5 प्रतियाँ दी थी!) जबकि पुस्तक कम से कम एक तो विदेशी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में भी है. दूसरे ने तीन साल बाद मात्र कुछ सौ प्रतियों की बिक्री दिखा कर एक चेक भेजा जो bank से bounce हो गया. गुस्से में कानूनी नोटिस भेज कर उस चेक की रकम का ड्राफ़्ट ले पाया पर आगे कोई उम्मीद नहीं.
    एक बड़ी पत्रिका को दो तीन बार कुछ कविताएँ भेजीं – संपादक इतने मेहरबान सिद्ध हुए कि जिस दिन रचना पहुँची उसी दिन बिना कोई पर्ची तक लगाए जवाबी लिफ़ाफ़े में भरवा दी (आजकल तो स्पीडपोस्ट की डिलिवरी डेट मिल जाती है, वापसी लिफ़ाफ़े पर डाकखाने की मुहर भी दिख जाती है) – दो दिन रख कर फेंकते तो लगता कम से कम किसी सहायक ने तो दो मिनट दिए होंगे भेजे कागजों को.
    बुधवार को 09:14 बजे · · 1
  • Jayprakash Manas मैंने शिल्पायन के मालिक और व्यवस्थापक श्री शर्मा जी से बात की । उन्होंने बताया कि उनकी बात हो चुकी है आज ही कुमार मुकुल जी से । अच्छा होगा दोनों आपस में बात करके स्पष्ट करलें ।
    बुधवार को 09:16 बजे · · 1
  • Kumar Mukul हां मानस जी , हुई बात का जिक्र मैंने उपर किया है
    बुधवार को 10:02 बजे · · 1
  • Om Nishchal Mukul Bhai.jab kitab chhapi hi nhi to vigyapan se koi hani to nahi ho rahi. ulte prachar hi ho raha hai.hone dijiye, jab kahin aur se chhap jayegi to prakashak khud chinta karega.
    बुधवार को 22:41 बजे · · 4
  • Kumar Mukul प्रिंट एशिया का जवाब जो उन्‍होंने लेखक मित्र कुमार सुजीत सिंह कन्‍हैया को भेजा है - From:
    Date: Thu, Feb 2, 2012 at 6:04 PM
    Subject: Enquiry about a Book
    To: kss.kanhaiya@gmail.com

    Dear KSS Kanhaiya,

    Thank you for contacting Printsasia Customer Support.

    Sorry to say that the book "कविता का नीलम आकाश" you are looking for is out of stock at the moment.

    Please feel free to contact us, in case you find any book which is of your interest.

    Thanks,

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    बीते कल 08:58 बजे · · 1 ·
  • Kumar Sujeet Singh Kanhaiya इतना तो अब लग ही रहा है कि प्रकाशक ने printasia (एवं शायद अन्यों को भी) पुस्तक की खबर प्रकाशन के पूर्व ही दे दी होगी और अब तक पुस्तक की उपलब्धता की सूचना तथा पुस्तक की details (ISBN, प्रकाशन तिथि, मुखपृष्ठ का चित्र आदि) अब तक न दी है। शायद वे अभी भी प्रकाशित करने की योजना में हों और शर्तें तय करने की आवश्यकता हो।
    बीते कल 09:09 बजे ·
  • Kumar Mukul प्रकाशन से तो वे उसी समय इनकार कर चुके थे जब मैंने प्रिंट एशिया पर पहली बार किताब का यह विज्ञापन देखा और किताब आने के पहले ऐसे विज्ञापन के खिलाफ लिखा था , खैर देखते हैं कब तक प्रिंट एशिया पर यह विज्ञापन रहता है, नेट के तौर तरीकों का भी तो कुछ पता चले
    बीते कल 09:14 बजे · · 1
  • Om Nishchal मुकुल मेरे भाई, जीवन बस इसी एक काम के लिए नहीं है। इसका विनियोग
    केवल रचनात्‍मकता के लिए होने दो। प्रकाशन और नेट का तंत्र कुछ कुछ
    रहस्‍यवाद-सा है। इसकी सम्‍यक् टीका मुश्‍किल है।
    22 घंटे पहले · · 1
  • Maya Mrig आदरणीय मुकुल जी, कोई भी कार्रवाई से पूर्व पुस्‍तक का आदेश देकर वास्‍तविक स्थिति जानना, साथ ही संबंधित दोनों पक्षों से संवाद बहुत जरुरी है। यदि यह प्रकाशन पूर्व दी गई सूचनाओं पर आधारित विज्ञापन है तो प्रकाशक का दायित्‍व था कि संबंधित वेबसाइट को सूचना देते कि यह पुस्‍तक प्रकाशित नहीं की जा रही है कृपया इसे विज्ञापन से हटा दें, वेबसाइट को जब तक अधिकृत सूचना ना मिले वे इसे प्रकाशित या हटाने का काम नहीं करते...शिल्‍पायन बहुत सम्‍माननीय प्रकाशन संस्‍थान है, उसे तुरंत इस बारे में पूरी जानकारी देकर भ्रम दूर करना चाहिए और आवश्‍यक हो तो लेखक से क्षमायाचना करने में संकोच नहीं होना चाहिए।
    21 घंटे पहले · · 5
  • Sunita Kumari कभी-कभी ऐसा हो जाना स्वभाविक है लेकिन उसे सुधारा जा सकता है...
    21 घंटे पहले ·
  • अवनीश सिंह चौहान aadarneey maya mrig jee se mein sahamat hoon....
    16 घंटे पहले ·
  • Kumar Mukul चलिए मित्रों की बातों से बल मिला , कि मैंने गलत सवाल नहीं उठाया था, अब देखें कुछ ललित जी को भी समझ में आता है कि नहीं , अब मैं साइट से नाम हटने का इंतजार करूंगा ...बस, माया जी, ओम निश्‍चल जी, अवनीश जी सुनीता जी और कन्‍हैया जी आदि तमाम मित्रों का मैं आभारी हूं कि उनकी बातों से मुझे नैतिक बल मिला

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