हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

ज़िंदगी

एक चेहरा कहीं कोई धुंधला-सा था /
एक पैकर था वो भी था मुब्हम  बहुत /
कितनी मुद्दत से बस एक ही थी हवस /
किस जतन से उसे साफ़ कर देख लूं/
एक शक अपनी नज़रों पे भी था मुझे /
शायद आँखें ही धुंधला गयीं हो मेरी /
ज़िंदगी भर इसी एक कोशिश में था /
ऐसे मौक़े भी आये इसी दरम्याँ/
जब लगा मैंने भरपूर देखा उसे /
जिसमें फ़ितरत की हर एक शै थी निहां /
इक ज़रा नीलगूं ,इक ज़रा सब्ज़ था /
कुछ अलाव की गर्मी,हवा याद की/
ऐसे चेहरे की,पैकर की तशरीह क्या /
जिसको अलफ़ाज़ में बाँध सकते नहीं /
पर वहम था के देखा है उसको कहीं /
एक धुंधली झलक, एक धुंधली झलक/
जुस्तजू, जुस्तजू, जुस्तजू, जुस्तजू/
कितनी सदियों से कोशिश में सब हैं लगे/
एक शफ्फाफ सा कोई चेहरा दिखे /
इन सुराबों के पीछे हो कोई नदी/
इन पहाड़ों में शायद कोई आग हो/
जो है इंसान की मुख्तलिफ़ मौशिकी/
उनके अन्दर छुपा एक ही राग हो.
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1 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कितनी सदियों से कोशिश में सब हैं लगे/
एक शफ्फाफ सा कोई चेहरा दिखे /
इन सुराबों के पीछे हो कोई नदी/
इन पहाड़ों में शायद कोई आग हो/

बहुत खूब .. सुन्दर प्रस्तुति

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