हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र

शुक्रवार, 9 दिसम्बर 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकतंत्र की हिफाजत के लिए आयोजित हुआ तीसरा पटना फिल्मोत्सव- सुधीर सुमन


शासकवर्ग जिन सच्चाइयों पर पर्दा डाल रहा है, उसे सामने ला रहा प्रतिरोध का सिनेमा: कुंदन शाह

‘‘प्रतिरोध का सिनेमा एक ऐसा समारोह है जो हमारी व्यथा और हमारी आवाज को पर्दे पर लाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकतंत्र की हिफाजत जैसी थीम पर पूरी दुनिया में इस तरह का फिल्मोत्सव शायद ही आयोजित होता हो। वैश्विक स्तर पर ऐसी जनप्रतिबद्ध फिल्मों के समारोह कम ही होते हैं। फिल्मों के जरिए यह बेहद जरूरी कोशिश उन सच्चाइयों को सामने लाने की है, जिस पर शासकवर्ग पर्दा डाल देना चाहता है या जिनको हमसे छिपाना चाहता है।’’ जन संस्कृति मंच-हिरावल द्वारा स्थानीय कालिदास रंगालय में आयोजित तीसरे प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक कुंदन शाह ने ये विचार व्यक्त किए। कुंदन शाह ने कहा कि हमारी व्यक्तिगत समस्याएं भी व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि वे सबकी समस्या हैं, हमारी, हमारे समाज और देश की समस्यों की असली वजहों को हमसे छिपाया जा रहा है। टेलिविजन और न्यूज चैनल को भी उन सच्चाइयों और वजहों को दिखाने नहीं दिया जाता। कारपोरेट जिस तरह हमारी प्राकृतिक संपदा को हड़प रहे हैं, वह बेहद खतरनाक है। कुपोषण, भूख, भ्रष्टाचार और लूट आदि समस्याओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बेशक ज्यादातर लोग शिकार हैं और इस व्यवस्था में फंसे हुए हैं, पर यह ऐसा वक्त है जब सच को जानना जरूरी है, यह जानना जरूरी है कि इराक, लिबिया पर कब्जे के पीछे की सच्चाइयां क्या हैं और हमारे बुनियादी मुद्दों की सरकारों द्वारा उपेक्षा और उनके कारपोरेट प्रेम की वजहें क्या हैं। कुंदन शाह ने जर्मनी में नाजी सत्ता के खिलाफ लिखे गई मार्टिन निमोलर की चर्चित कविता- पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए/ मैं चुप था, क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था/ फिर वे ट्रेड यूनियनिस्टों के लिए आए, मैं चुप था, क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनिस्ट नहीं था/ फिर वे यहूदियों के लिए आए, मैं चुप था, क्योंकि मैं यहूदी नहीं था/ अंत में वे मेरे लिए आए और मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था, सुनाते हुए कहा कि ऐसा माहौल न हो, इसके लिए जनता को हर मोर्चे पर प्रतिरोध करना होगा और व्यापक एकता बनानी होगी।
फिल्मोत्सव स्वागत समिति के अध्यक्ष बीबीसी के बिहार संवाददाता वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने दर्शकों और अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि जिस राज्य में भ्रष्टाचार का ग्राफ सभी राज्यों से उंचा है, जिस राज्य में प्रतिरोध शासन को कतई पसंद नहीं है, वहां प्रतिरोध का सिनेमा का आयोजन जनता की ताकत को बढ़ाने वाला कदम है।
प्रतिरोध का सिनेमा फिल्मोत्सव के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि जो बड़ी पूंजी द्वारा संचालित माध्यम हैं, वे जनता को भ्रमित कर रहे हैं और उसे अकेला कर रहे हैं, लेकिन प्रतिरोध का सिनेमा की कोशिश यह है कि दुनिया भर में मनुष्य के पक्ष में निर्मित सिनेमा को व्यापक जनता तक ले जाया जाए, उसकी सामूहिकता को ताकत प्रदान किया जाए।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मशहूर कवि आलोकधन्वा ने कहा कि पूंजीवाद ने जो चमकीला मुखौटा लगा रखा है, उस मुखौटे को उतारकर उसके असली चेहरों को दिखाने का प्रयास है प्रतिरोध का सिनेमा। जिस राज्य में परिवर्तन के लिए लहू बहाने वालों को पीछे धकेलकर जनता के हित का पाखंड रचा जा रहा हो, वहां ऐसे फिल्मोत्सव का आयोजन स्वागत योग्य है, जिनमें दिखाई जाने वाली फिल्मों में पूरे तंत्र का असली चेहरा नजर आता है। इस मौके पर मंच पर अर्थशास्त्री नवलकिशोर चैधरी, इतिहासकार प्रो. डेजी नारायण, कवि मदन कश्यप, पत्रकार अग्निपुष्प, फिल्म सोसाइटी आंदोलन से जुड़े आर.एन. दास और कवयित्री प्रतिभा भी मौजूद थे। संचालन जसम की राष्ट्रीय पार्षद समता राय ने किया।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश के दौर में ‘जाने भी दो यारों’ का प्रदर्शन 
फिल्म प्रदर्शन की शुरुआत कुंदन शाह की सर्वाधिक चर्चित फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ की प्रस्तुति से हुई। 1983 में प्रदर्शित यह फिल्म आज की राजनीति, नौकरशाही और पत्रकारिता में पैदा हुए भीषण भ्रष्टाचार की भविष्यवाणी सी करती लगती है। आज जबकि व्यस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले और उसके संरक्षक भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का पाखंड करते हैं, तब इस फिल्म को देखना अपने आप में पूरे भ्रष्ट तंत्र के बारे में गंभीरता से सोचने को विवश करता है। आज कामेडी के नाम पर जो भौंडापन परोसा जा रहा है, उसे भी यह फिल्म आईना दिखाती लगी। दर्शकों की कुंदन शाह के साथ विचारोत्तेजक बातचीत भी हुई।‘जाने भी दो यारो’ के अंत और शीर्षक को लेकर भी दर्शकों ने सवाल किए। कुंदन शाह ने कहा कि वे अमिताभ की फिल्मों की तरह भ्रष्टचारियों को गोली मार देने वाली फिल्में नहीं बना सकते, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार का अंत नहीं हो सकता। ‘जाने भी दो यारो’ में भ्रष्ट ठेकेदार को जीतते हुए दिखाना या सत्य हमेशा जीतता है और बुराई हारती है, इस धारणा पर व्यंग्य करते हुए दिखाना उनके पक्ष में नहीं है, बल्कि फिल्म का मकसद यह है कि दर्शक इस परिस्थिति के बारे में सोचने को विवश हों और इसे बदलने के रास्ते की तलाश करें।  
स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक पूंजीवादी शोषण और भ्रष्टाचार का यथार्थ नजर आया
पटना फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत भारतीय सिनेमा इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण फिल्म ‘नीचा नगर’ के प्रदर्शन से हुई। पूंजीवादी व्यवस्था में मौजूद भीषण शोषण, अथाह पाखंड और जनकल्याण के दावों की आड़ में छिपी स्वार्थलिप्सा का पर्दाफाश करने वाली इस फिल्म को मशहूर फिल्म निर्देशक चेतन आनंद ने बनाया था। 1946 में बनी इस फिल्म ने प्रतिष्ठित कान्स फिल्मोत्सव में बेस्ट फिल्म का ग्रांडप्रिक्स पुरस्कार प्राप्त किया था।यह भारतीय सिनेमा मंे सामाजिक-राजनीतिक यथार्थवाद की शुरुआत करने वाली फिल्म मानी जाती है। इतने वर्ष बाद भी इस फिल्म को देखते हुए यह स्पष्ट महसूस होता है कि ब्रिटिश हुकूमत ने इसे क्यों प्रतिबंधित किया होगा। पूंजीवादी सत्ता के जनकल्याण के पाखंड को यह आज भी बड़ी कारगर तरीके से उजागर करती है। ‘नीचा नगर’ उन गरीब और अभावग्रस्त लोगों की बस्ती है, जिसके लोग म्यूनिस्पिल कारपोरेशन पर काबिज एक अमीर द्वारा इमारतें बनाने के लिए गंदे नाले को बस्ती की ओर मोड़ देने से बीमारी की चपेट में हैं। वे चाहते हैं कि नाला जिधर पहले बहता था, उधर ही उसका रुख किया जाए। लेकिन विरोध करने पर उनके इलाके में पानी की सप्लाई को खत्म कर दिया जाता है, इलाज के लिए अस्पताल बना दिया जाता है, लेकिन बीमारी की वजह नाले को हटाया नहीं जाता। नगर का जो पूरा तंत्र है, उसमें शामिल लोगों के अपने-अपने स्वार्थ हैं। जो जनता को अपने हक के लिए संगठित करते हैं, यह तंत्र उन्हें ही जनविरोधी साबित करने की कोशिश करता है, लेकिन नीचा नगर के लोगों का संघर्ष जारी रहता है और उनकी अंत में जीत होती है।
बीजू टोप्पो और मेघनाथ द्वारा निर्देशित डाक्यूमेंटरी ‘विकास बंदूक की नाल पर’ ‘नीचा नगर’ की परंपरा को ही आज के संदर्भों में आगे बढ़ाते हुई प्रतीत हुई। उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जिस तरह विकास के नाम पर कारपारेट कंपनियां, सरकार और पुलिस बर्बरतापूर्ण तरीके से जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों के हक से बेदखल कर रही हैं, यह डाक्यूमेंटरी इसी का पर्दाफाश करती है। इसी तरह अमरीकी निर्देशिका एनी लियोनार्ड की ‘दी स्टोरी आॅफ स्टफ’ में लोकसंस्कृति पर उपभोक्तावाद के विनाशकारी प्रभावों को उजागर करने वाली फिल्म थी। माइकल मूर की बहुचर्चित डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘फारेनहाइट 9/11’ को देखते हुए पूंजीवादी व्यवस्थाओं और कारपोरेट कंपनियों के सरगना अमेरिका के बर्बर सैन्य रणनीति के मकसद को दर्शकों ने बखूबी समझा। उन्होंने महसूस किया कि अमेरिका के लिए लोकतंत्र और इंसाफ शब्द सिर्फ पाखंड है। अपने फायदे और मुनाफे के लिए उसने इराक पर हमला किया था। पूंजीवादी व्यवस्थाओं के जरिए न लोकतंत्र को बचाया जा सकता है और न ही मनुष्य को, इसे इन फिल्मों ने स्पष्ट किया। इस तरह से ‘नीचा नगर’ के म्युनिस्पल कारपोरेेशन से लेकर विश्व साम्राज्यवाद तक शोषण, भ्रष्टाचार, छल और दमन का तो तार जुड़ता है, उसे दर्शकों ने बड़ी सहजता से समझा। निश्चित तौर पर ये लोगों की राजनीतिक समझदारी को बढ़ाने वाली और सच्चे जनतंत्र के लिए एकजुट होने की उन्हें प्रेरणा देने वाली फिल्में थीं।

फिल्म हमारी जिंदगी के यथार्थ को पेश करने वाली एक कला है, महज बाजारू प्रोडक्ट नहीं
प्रतिरोध का सिनेमा में दिखाई जाने वाली फिल्मों ने यह साबित किया कि फिल्में महज उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों के प्रचार का माध्यम नहीं हो सकती। फिल्म अंततः एक कला माध्यम है और विचार व यथार्थ से उसका गहरा नाता होता है। एक अच्छा फिल्मकार प्रकृति और मनुष्य की जिंदगी के प्रति उत्तरदायी होता है, वह बाजार की बंदिशों का अतिक्रमण करता है। बर्ट हांसरा की फिल्म ‘ग्लास’ मानो इस बात का सटीक उदाहरण थी। गये तो थे वे कांच उद्योग पर एक विज्ञापन फिल्म बनाने, लेकिन कांच से निर्मित होती बोतलों में छिपी कलात्मकता को उन्होंने अपनी डाक्यूमेंटरी में दर्ज किया और यह बेहद प्रभावशाली फिल्म मानी गई। हांसरा की अद्भुत कलादृष्टि से रूबरू होना पटना के फिल्म दर्शकों के लिए अनोखा अनुभव था।
हांसरा की ही दूसरी फिल्म ‘जू’, जो एक मूक फिल्म है, उसमें भी इस निर्देशक की प्रयोगशीलता और विलक्षण कलात्मक नजरिये को लोगों ने बखूबी महसूस किया। बेशक इन फिल्मों ने दर्शकों को एक नए कलात्मक आस्वाद और यथार्थबोध से जोड़ा। एंब्राॅस बीयर्स की लघुकथा पर आधारित फिल्म ‘एॅन अकरेंस आॅफ आउल क्रीक ब्रिज’ भी इसी श्रेणी की फिल्म थी, जिसमें युद्ध के दौरान फांसी की सजा पाये एक ऐसे किसान के मन में झांकने की कोशिश की गई है, जो वहां से भाग जाने का सपना देखता है।

मैं तुम्हारा कवि हूं: एक साधारण आदमी की असाधारण गाथा
युवा फिल्मकार नितिन पमनानी की फिल्म ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ जनकवि विद्रोही की जिंदगी और कविताओं पर आधारित फिल्म है, जो देखने में बिल्कुल साधारण लगते हैं, पर उनकी जिंदगी असाधारण है। दिल्ली से लेकर बिहार तक जनता और उसके आंदोलनों से जुड़े लोग उनकी कविताओं के दीवाने हैं। वे कविताएं लिखते नहीं, बल्कि कहते हैं। सुविधाहीनता के बावजूद उनकी मस्ती, बेबाकी एवं विद्रोही तेवर को इस फिल्म ने बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया। फिल्म के सहनिर्देशक इमरान ने बताया कि वे वामपंथी छात्रनेता चंद्रशेखर के जीवन पर आधारित फिल्म ‘एक मिनट का मौन’ से प्रभावित होकर डाक्युमेंटरी निर्माण से जुड़े। अपने युवा साथियों के साथ मिलकर ‘डिजाल्व स्टूडियो’ की स्थापना की और आजकल प्रतिरोध का सिनेमा आंदोलन और दिल्ली फिल्म अर्काइव्स में सक्रिय हैं। उनसे दर्शकों ने विद्रोही पर फिल्म बनाने की जरूरत और फिल्म के राजनीतिक सरोकार को लेकर कई सवाल भी किए। जनकवि विद्रोही के बारे में जेएनयू से आए मार्तंड ने भी अनुभव दर्शकों से साझा किए।

भारतीय जनता के आक्रोश की संगठित अभिव्यक्ति 
देश में लोकतंात्रिक अधिकारों के लिए चल रहे जनांदोलनों की आवाज बनीं फिल्में
भारत में आज मौजूदा तंत्र किस तरह जनता के संवैधानिक-लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर रहा है, यह पटना फिल्मोत्सव के आखिरी दिन पी. बाबूराज व सी. शरतंचद्र निर्देशित मलयालम फिल्म 1000 डेज एंड अ ड्रीम,  अजय टीजी की ‘अंधेरे से पहले’ और हाओबम पबन कुमार की फिल्म ए एफ एस पी ए 1958 में अत्यंत प्रभावशाली तरीके से नजर आया। ‘1000 डेज एंड अ ड्रीम’ में कोकाकोला कंपनी के साथ उद्योगपतियों, मीडिया और राजनीतिक पार्टियों की साठगांठ के विरुद्ध ग्रामीणों की मुहिम को दर्शाया गया है। ‘अंधेरे से पहले’ छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में जिंदल थर्मल प्लांट द्वारा जमीन हड़पे जाने के खिलाफ आदिवासी किसानों के सतत संघर्ष को सामने लाने वाली फिल्म थी। इन फिल्मों को देखते हुए पटना के दर्शकों ने महसूस किया कि आज की व्यवस्था के छल और साजिशों का जैसा सामना वे खुद कर रहे हैं या आसपास के समाज में जो जनविरोधी घटनाएं घट रही है, वैसी ही परिस्थितियां देश के दूसरे हिस्सों में भी है। फिल्मोत्सव की आखिरी फिल्म ‘ए एफ एस पी ए 1958’ में दर्शकों ने मणिपुर में विशेष सशस्त्र बल अधिनियम की आड़ में आम जनता के शांतिपूर्ण जनांदोलनों के बर्बर दमन के सच को देखा। यह सच्चाई बेहद विचलित करने वाली और आक्रोश से भरने वाली थी। यह फिल्म उस राष्ट्रवाद पर भी सवाल खड़ा करती है, जिसके पहरुए देश के ही एक भाग की जनता पर बर्बर अत्याचार करते हैं और देश के शेष हिस्से के लोगों तक उस दमित-उत्पीडि़त जनता की आवाज को पहुंचने नहीं देते या विरोध करने वाली जनता को उग्रवादी व आतंकवादी के तौर पर प्रचारित करते हैं। इस तरह ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ फिल्मोत्सव दमित-उत्पीडि़त जनता की व्यथा और आक्रोश को देश के दूसरे हिस्सों की जनता की पीड़ा और गुस्से से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता लगा। आज का सिनेमा किस तरह जनसंघर्षों को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा सकता है और किस तरह व्यापक जनांदोलन का वाहक हो सकता है, इसे उड़ीसा में खनन कंपनियों से अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासियों पर सूर्यशंकर दास द्वारा बनाई गई छोटी-छोटी फिल्मों ने बखूबी जाहिर किया। यह संघर्ष के बीच रहकर बनाई गई फिल्में हैं। फिल्मकार ने आदिवासी नौजवानों को भी कैमरे थमा दिए हैं और उनके जरिए औद्योगिक प्रदूषण, पुलिसिया बर्बरता, राजनीतिक साजिश, गैरकानूनी बेदखली की वह सच्चाई सामने आ रही है, जिसे आज की मीडिया में सामने नहीं आने दिया जाता। दरअसल छल, भ्रष्टाचार और पाखंड पूंजीवाद की जन्मजात खासियत होती है। मानवीय संबंधों के स्तर पर भी पूंजीवाद इसी तरह की प्रवृत्तियांे को बढ़ाता है, आखिरी दिन दिखाई गई 7 मिनट की फिल्म ‘प्राइसलेस’ इसी का साक्ष्य लगी।
तीसरे प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव’ का समापन ‘हम होंगे कामयाब’ गीत के गायन से हुआ। फिल्मोत्सव आयोजन समिति के सारे सदस्य और कार्यकर्ता इस दौरान मंच पर मौजूद थे।

पटना फिल्मोत्सव में देवानंद को श्रद्धांजलि दी गई

पटना फिल्मोत्सव के आयोजन के दौरान ही के विख्यात अभिनेता देवानंद के निधन की सूचना मिली। एक मिनट का मौन रखकर उन्हें भावभीनी श्रद्धाजंलि दी गई। फिल्मोत्सव के मुख्य अतिथि निर्देशक और पटकथा लेखक कुंदन शाह ने कहा कि देवानंद अपने आप में अद्वितीय अभिनेता थे। उनकी फिल्म ‘गाइड’ के सारे चरित्र परंपराओं को तोड़ने वाले चरित्र हैं। उन्होंने फिल्म उद्योग में पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों के प्रति उनके गहरे संबंधों की चर्चा की तथा बताया कि उन्होंने कई लोगों को फिल्मों में जगह दी। कुंदन शाह ने कहा कि वे हमारे लिए हमेशा युवा थे, शारीरिक रूप से न होने के बावजूद वे हमारे लिए हमेशा युवा ही बने रहेंगे।
समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि देवानंद पिछली चार पीढि़यों के प्रिय कलाकार थे। उनकी जीवन शैली और पर्दे पर निभाए गए उनके किरदार आज भी नौजवान पीढ़ी की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं। हिंदुस्तानी समाज में परंपरागत मूल्यों और आधुनिकता के बीच का जो द्वंद्व है, वह आज भी जारी है और देवानंद आधुनिकता और आजादी की आकांक्षा को अभिव्यक्ति देने वाले फिल्मकार और अभिनेता है। वे जिंदगी के रोमांस और जीवंतता को आवेग देने वाले अभिनेता थे। फिल्म प्रदर्शन के दौरान देवानंद की स्मृति में उनकी मशहूर फिल्म ‘गाइड’ के अंश दिखाए गए।

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