मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना
जब मैं और कवि बलभद्र बक्सर के बहुचर्चित गांव बगेन पहुंचे हमारे अदंर रहस्य-रोमांच से भरपूर कई किस्से उभरने-मिटने लगे। ...मुन्ना सिंह के गीत की पंक्ति ‘जहंवा वीर बहादुर सुपरस्टार ए बबुआ.. जिला भोजपुर ह भारत के सिंगार ए बबुआ’ बार-बार हमारे कानों में एक प्रश्न बनकर गंूज रही थी....
हमें इसी गांव की तलाश थी। पफर्क सिर्फ इतना ही था कि हमें एक सशक्त रचनाकार के घर जाना था। हमारी इस यात्रा में उसी गांव के एक मित्रा संकटमोचन बन पथप्रदर्शन कर रहे थे। उनके नेतृत्व में हम सधे पांव अपनी मंजिल पहंच गए। ईंट से बने एक नवनिर्मित घर के दरवाजे पर मित्र ने दस्तक दी। छोटी सी एक बच्ची बाहर आई। हमने पूछा- ‘विजेंद्र दा हैं?’ बच्ची अंदर चली गई। दूसरे ही पल हमारे विजेंद्र दा हमसे मुखातिब हुए। चिरपरिचित मुस्कुराहट के साथ बड़ी गर्मजोशी से वे हम दोनों से मिले।...
सांवले रंग, सामान्य कद के चुस्त-दुरुस्त व्यक्ति हैं विजेंद्र अनिल। अब इनकी नौकरी के तीन-चार वर्ष ही शेष हैं। बगेन में ही जन्में, पले और बढ़े। जुलाई 1963 में लगभग 18 साल की उम्र में ‘आग और तूपफान’ शीर्षक से इनका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। तब चीन की ओर से नेपफा और लद्दाख में हुई सैनिक कार्रवाई के प्रति इनका कवि-हृदय कापफी तिलमिलाया हुआ था। इसलिए ‘आग और तूपफान’ में राष्ट्र के प्रति एक युवोच्छवास की जो अभिव्यक्ति देखी गई वह वाजिब थी। इनके लिए वह समय इनकी ‘इनकी परीक्षा का नहीं, परिचय का समय था।’ यह बात उसी पुस्तक की भूमिका में हिंदी के प्रसि( समीक्षक डा. नागेश्वर लाल ने कही है। ‘आग और तूपफान’ के बाद अगले ही वर्ष विजेंद्र अनिल का हिंदी में एक सामाजिक उपन्यास ‘उजली-काली तस्वीरें’ प्रकाशित हुआ। उसके बाद भोजपुरी उपन्यास ‘एगो सुबह एगो सांझ’ 1967 में छपा, जिसे भोजपुरी का तीसरा उपन्यास माना जाता है। उन्होंने अपने गांव से ही 1968 से 1970 तक अपने संपादन में ‘प्रगति’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। पिफर ये कहानियों में रमे। ‘विस्पफोट’ और ‘नई अदालत’ नाम से इनके दो कहानी संग्रह क्रमशः 1984 और 1989 में प्रकाशित हुए। हिंदी कहानी के क्षेत्रा में इन दोनों संग्रहों ने विजेंद्र अनिल को कापफी प्रसि(ि दिलाई। इस प्रसि(ि में इनके भोजपुरी जनगीतों ने भी चार चंाद लगा दिए। ‘उमड़ल जनता के धार’ तथा ‘विजेंद्र अनिल के गीत’ नाम से दो भोजपुरी गीतों का संग्रह भी आया। इन दोनांे संग्रहों के गीतों में से कई गीत जनता की जुबान पर बस गए थे।
उस दिन लगभग उनसे एक बजे दोपहर से लेकर पांच बजे शाम तक होनेवाली हमारी बातचीत में उनके लेखन और जीवन के ढेरों प्रसंग उभर कर सामने आए। इस बीच हमारे पथ प्रदर्शक मित्रा कुछेक औपचारिकताओं के बाद हमसे विदा ले अपने घर जा चुके थे। विजेंद्र दा के पुराने खपड़ैल दलान में वह बैठकी जमी हुई थी। पता चला कि उसी दालान के दरवाजे पर कभी ‘लेखक कलाकार मंच’ का बोर्ड टंगा हुआ रहता था। तो इस तरह हमें पता चला कि वे सिर्फ लेखक ही नहीं, बल्कि मंच कलाकार भी रहे हैं। 1980 में इन्होंने अपने गांव में ‘प्रेमचंद अध्ययन केंद्र’ भी स्थापित किया। प्रेमचंद पर तीन-चार गीत भी लिखे। प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’, ‘पूस की रात’ और ‘सवा सेर गेहूं’ का खुद भोजपुरी में नाट्य रूपांतरण कर गांव के लड़कों के साथ उसका मंचन भी किया। लेखक-कलाकार मंच के बारे में हमारे पूछने पर उन्होंने बताया था- ‘‘इस मंच का बकायदे एक संविधान था। इस तरह के प्रयासों के केंद्र में सामाजिक जागरूकता के विकास की भावनाएं थीं। गांव के अनपढ़ लोगों में, किसानों व मजदूरों की समझ को उन्नत करने की दिशा में ऐसे संगठित प्रयास किए गए। लगभग सौ से अधिक लोग इस मंच के सदस्य थे।’’ विजेंद्र दा उस मंच के समाप्त हो जाने से दुखी थे। उन्होंने बताया कि इस सामाजिक-सांस्कृतिक मंच को नष्ट-भ्रष्ट करने की नीयत से असामाजिक व पुरातनपंथी लोगों ने जाति-पांति व निजी स्वार्थों के आधार पर ‘धर्म संघ’ का गठन किया। ‘लेखक-कलाकार मंच’ को तोड़कर अलग-अलग मंच बनाए। इस तरह के लोगों ने मंच के खिलाफ यह भी प्रचारित किया कि मंच के लोग गरीब-गुरबों को प्रशिक्षित कर किसी खास मकसद की ओर ढाल रहे हैं।
विजेंद्र अनिल के शुरुआती दौर की इन गतिविधियों को जानकर हमें और गहरे उतर कर बात करने की इच्छा हुई थी। हम जानना चाहते थे कि विजेंद्र अनिल जिस संघर्षशील जनपक्षीय साहित्यिक, सांस्कृतिक रचनाशीलता के लिए चर्चित हुए जा रहे थे, उसका प्रभाव उनके ग्रामीणों पर कैसा रहा? इस संबंध में उन्होंने एक वाकया सुनाया कि बात तब की है जब उनके लिखे गीत-गजलों को लोगों ने जुबान देना शुरू कर दिया था। उनका बहुचर्चित हिंदी जनगीत ‘ये तो सच है कि सभी शीशमहल टूटेंगे, मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना’ लिपिबदृध रूप में गांव के किसी आदमी को मिल गया था। गीत लिए वह आदमी डाॅ. नागेश्वर लाल के पास पहुंचा- ‘‘आप बताइए कि इसमें क्या लिखा गया है?’’ डाॅ. लाल उसके हाव-भाव ताड़ गए। उसवक्त उन्होंने उसे टरका दिया।...सामंतों, जमींदारों के बीच एक खुसर-पुसर होती रही। कई दफे इन गीतों को गानेवालों को राह चलते रोका-टोका भी गया। ि फर भी विजेंद्र अनिल की सादगी और सच्ची निष्ठा के सामने उग्र रूप से किसी के आने की हिम्मत नहीं पड़ी।.......
अपनी रचनाओं के प्रकाशन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि व्रजकिशोर नारायण के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका ‘जनजीवन’ में मेरी प्रारंभिक कहानी ‘मंजिल कहां है’ ;64-65 में छपी थी, तो उस वक्त पारिश्रमिक के बतौर दस रुपये मिले थे। मैं काफी खुश था। आगे चलकर श्रीपत राय के संपादन में निकलनेवाली चर्चित पत्रिका ‘कहानी’ में मेरी अधिकांश कहानियां प्रकाशित हुईं। अपनी रचना प्रक्रिया को उन्होंने सीधे-सीधे जनसंगठनों से प्रभावित बताया। केवल एक साहित्यकार की तरह काम करने इनका इरादा कभी नहीं रहा। ढेरों पारिवारिक जिम्मेवारियों के बावजूद इन्होंने संगठन की ओर भी ध्यान दिया। संगठन यानी वामपंथी राजनीति की क्रांतिकारी धारा- सीपीआई ;एमएल। ये ‘जन संस्कृति मंच’ के संस्थापक सदस्यों मंे भी एक रहे। सांगठनिक व्यस्तताओं की वजह से कभी-कभी इन्हें कुछ घाटे भी सहने पड़े। जैसे अपनी ‘फर्ज’ कहानी को बढ़ाकर उपन्यास का रूप देने की इच्छा अब तक पूरी नहीं कर पाए। इनका मानना है कि पटना और दिल्ली के बंद कमरों में रहकर भोजपुर के गांवों के विभिन्न रूपों तथा उसके संघर्षों को लेकर कोई कहे कि मैं इसकी अभिव्यक्ति कर रहा हूं तो यह सर्वथा झूठ है। ऐसा कतई संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि तब इस दौर में इसको लेकर भैरव प्रसाद गुप्त से मेरी काफी बहसें हुआ करती थी। उनका मानना है कि तथ्यान्वेषण के लिए तो जनजीवन के करीब जाना होगा। यह जोखिम महाश्वेता देवी ने खूब उठाया। अन्यथा ‘विरसा मुंडा का तीर’ तथा एक हद तक ‘मास्टर साब’ जैसी बहुचर्चित रचनाएं संभव नहीं होतीं। अखबारों के कतरन के आधार पर तो सूचनात्मक कहानियां ही लिखी जा सकती हैं। हाल के वर्षों में आई मनमोहन पाठक की रचना ‘गगन घटा घहरानी’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जनसंघर्षों को लेकर लिखा गया यह एक समृद्ध उपन्यास है। जनसंघर्षों की बात आगे बढ़ी तो विजेंद्र दा स्मृतियों में चले गए। उन्हें अच्छी तरह याद है कि 1980-82 केे आसपास सीपीआई ;एमएल या उससे जुड़े अन्य संगठनों का नाम लेकर कहानी लिखने से लोग डरते थे। वे कहते हैं कि उस वक्त तक ‘विस्फोट’ जैसी कहानी खोजे नहीं मिलती।... अब जबकि 70-80 की स्थितियां बदल गई हैं तब लोग उस दौर की कहानियां लिख रहे हैं। जब वक्त था तो लोगों ने लिखने से परहेज किया और आज जब स्थितियां खुली हुई हैं तब उन विषयों का बाजार गर्म है। स्मृतिजीवी होना तो लगता है हिंदी कहानी की नियति हो गई है। इसे उन्होंने अवसरवाद की संज्ञा से नवाजा।
अपनी समकालीनों पर चर्चा करते हुए विजेंद्र दा ने कहा कि उस वक्त ज्ञानरंजन की कहानी ‘घंटा’ तथा ‘वर्हिगमन’ बड़ी चर्चा में थी। हालांकि इस कहानी का पात्र अंत में उच्छृंखल हो जाता है, िफर भी उसमें विद्रोह की चेतना मुखर है। काशीनाथ सिंह की कहानी ‘माननीय होम मिनिस्टर के नाम’, कामतानाथ की कहानी ‘छुट्टियां’ और इन्हीं का एक उपन्यास ‘एक और हिंदुस्तानी’, शेखर जोशी, मार्कण्डेय, अमरकांत तथा इसराइल की कुछ कहानियां तब काफी चर्चा में थीं और मुझे अच्छी लगती थीं। रेणु, मधुकर सिंह तथा मधुकर गंगाधर को मैं पढ़ता था। मधुकर सिंह की कहानियों के कई शेड्स हैं। नई कहानी के संबंध में विजेंद्र दा की साकारात्मक प्रतिक्रिया रही। विजेंद्र अनिल मानते हैं कि उस समय सचमुच बड़ी सकारात्मक कहानियां आईं। स्वयं प्रकाश पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ‘उनकी अपनी एक टेकनीक है। वे कहानियों में कई चीजें खोल नहीं पाते। कहीं-कहीं तो चीजों को हल्के अंदाज में भी लेते हैं।
देर तक चलने वाली हमारी बातचीत के बीच ही विजेंद्र दा ने हमें गरमागरम पराठे भी खिला दिए...। हमने उन्हें छेड़ा भी कि ‘‘विजेंद्र दा, आज की तरह तो कितने ही दौर गुजरे होंगे इस जगह? घर के लोग कहां तक सहयोगी रहे?’’ उन्होंने एक संक्षिप्त सा जवाब दिया- ‘‘स्थितियां हमेशा अनुकूल रहीं। पत्नी की भूमिका भी सदैव सहयोगी रही।’’ हमने पूछा- ‘‘ आपके जीवन का वह पल जो आज भी आपको रोमांचित कर जाता हो, कृपया बताएं?’’ विजेंद्र दा ने मुस्कुराते हुए अपनी आंखें बंद कर ली और याद किया- ‘‘तब मैं बीएससी का छात्र था। शाम के समय प्रतिदिन टहलने जाया करता था। सो उस दिन भी निकला घूमने। दूसरे दिन िफजिक्स की परीक्षा थी। अचानक रेलवे बुक स्टाॅल पर अपनी ही किताब दिख गई । ‘उजली-काली तसवीरें’ पहली प्रकाशित किताब, जिसके प्रकाशन की सूचना तक नहीं थी मुझे। मुझसे रहा नहीं गया। किताब खरीद ली और परीक्षा की परवाह किए बगैर रात भर पढ़ता रहा। अपनी किताब और खरीदकर पढ़ना, वह भी परीक्षा के समय। इस रोमांचकारी खुशी को भुलाए नहीं भूलता मैं।
पेशे से शिक्षक और एक भरे-पूरे घर के मुखिया के रूप में विजेंद्र दा आज भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इधर उन्होंने बहुत कम लिखा है। हमने इसे भी एक सवाल बनाया। हमने पूछा- ‘‘विजेंद्र दा, क्या वजह है कि आजकल आपका लेखन ठहरा-ठहरा सा है?’’ साधारण सी अन्यमनस्कता लिए उनका उत्तर था- ‘‘विभिन्न तरह की व्यस्तताओं के चलते समय नहीं मिल रहा है। इसलिए कहानियां नहीं लिख रहा हूं। गिनाने के लिए कुछ भी लिखते जाना मुझे अच्छा नहीं लगता। इसके बावजूद मैं पूरी तरह से बदलती जा रही परिस्थितियों का अच्छी तरह अध्ययन करना आवश्यक समझता हूं। किसी निष्कर्ष तक पहुंचते ही जरूर लिखना प्रारंभ करूंगा।’’ बहरहाल, इसी लंबी वार्ता के बाद हम भी एक निष्कर्ष तक पहंुचे कि विजेंद्र दा समकालीन लेखन से जरूर अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। उनकी बातों से लगा भी कि उन्हें अब भी अपने हमदम की जरूरत है। खैर, हमने देर शाम को उनसे विदा ली। इन शुभकामनाओं के साथ कि आप जल्द ही अपनी परिस्थितियों से उबरें और समाज तथा जनजीवन को दिशा देने वाली रचनाओं से हमें समृद्ध करें।
गोधूली गहराती जा रही थी। रास्ते मंे घर पहुंचने की चिंता बलवती हो रही थी। कवि बलभद्र इस चिंता को तोड़ते हुए लगातार गुनगुनाए जा रहे थे- ‘‘ये तो सच है कि सभी शीशमहल टूटेंगे, मेरे हमदम मेरी आवाज को जिंदा रखना।’
कवि सुमन कुमार सिंह और बलभद्र ने विजेंद्र अनिल से यह लंबी बातचीत 2001 में की थी, जो 9 अगस्त 2001 के दैनिक हिंदुस्तान के मध्यांतर परिशिष्ट में शब्दसाक्षी स्तंभ में प्रकाशित हुआ था। 2 नंबबर 2007 को ब्रेन हैमरेज के आघात से एकाध सप्ताह पहले ही कथाकार सुरेश कांटक से मुलाकात में उन्होंने नए सिरे से जमकर लिखने की योजना से अवगत कराया था। इधर उन्होंने आलोचक नागेश्वर लाल ;जिनका दो वर्ष पहले निधन हो गया पर एक लंबा लेख लिखा था। इस बीच 2003 में अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के स्थापना सम्मेलन के लिए उन्होंने पांच गीत लिखे थे।



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