हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र

शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

अनुभूतियां - नरेश अग्रवाल

सचमुच हमारी अनुभूतियां

नाव के चप्पू की तरह बदल जाती हैं हर पल

लगता है पानी सारे द्वार खोल रहा है खुशियों के

चीजें त्वरा के साथ आ रही हैं जा रही हैं

गाने की मधुर स्वर लहरियां गूंजती हुई रेडियो से

मानों ये झील के भीतर से ही आ रही हों

हम पानी के साथ बिलकुल साथ-साथ

और नाव को धीरे-धीरे बढ़ाता हुआ नाविक

मिला रहा है गाने के स्वर के साथ अपना स्वर

और हम खो चुके हैं पूरी तरह से,

यहां की सुन्दरता के साथ।


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