हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र

बृहस्पतिवार, 11 अगस्त 2011

आगे आती थी हाले-दिल पे हंसी

 मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मुझे क्या हो रहा है .दरअसल मैं कुछ असली ,कुछ ख़ालिस खोजने के फ़िराक में हूँ.और यह खोज बड़ी मुश्किल होती चली जा रही है.बेशर्मी इस क़दर है कि जो  किसी चीज़ के लिए जितना प्रतिबद्ध ,जितना कमिटेड होने का स्वांग रच रहा है वह उसी चीज़ को किसी पक्के दलाल की तरह हज़ारों बार बेच रहा है .उसी की खा रहा है .और इतनी गंभीरता ओढ़े रहते हैं कि आपको हिम्मत नहीं होगी कि कह सकें कि क्यों मज़ाक़ कर रहे हो यार ,हाथों में गजरा और गले में लाल रुमाल बाँध कर क्यों नहीं अपने असली रूप में आ जाते हो .कविता ,जाति,देशभक्ति ,अगड़े ,पिछड़े ,ग़रीबों ,महिलाओं कोई भी विषय हो उसके एक्सपर्ट और जांनिसार बनकर उसको पूरा एक्सपोज़ कर ,पूरा उत्तेजक बनाकर बेचने के पीछे पड़े हो यार .बेशर्मी की हद है.लगता है खालिस खोजना छोड़ दूं या इन स्वतः घोषित या सर्वमान्य विषय विशेषज्ञों में तो उसे नहीं ही ढूंढूं .पहले तो हंसी आती है अब बक़ौल चचा ग़ालिब वह भी नहीं आती ---
"आगे आती थी हाले- दिल  पे हंसी /
अब किसी बात पर नहीं आती /"       

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