6 कविता पुस्तकों पर लिखी गई एक विस्तृत टिप्पणी, जो समकालीन जनमत के अगस्त 2011 अंक में छपी है, उसका यह संक्षिप्त अंश है। ( चंद्रेश्वर,रंजीत वर्मा,विमल कुमार,मुकुल सरल,जितेंद्र कुमार )
‘‘यह कैसा समय है यारों/ तेजी से मिटता जा रहा है फर्क/ असली-नकली का/ खोटे सिक्कों से पटा पड़ा है बाजार/ छल भरी मुद्राओं और मुहावरों से/ ढंकी पड़ी है भाषा’’- ये पंक्तियां चंद्रेश्वर के संकलन ‘अब भी’ की कविताओं की मूल चिंता है। लगभग ढाई दशक तक कविता लेखन के बाद आया यह पहला संकलन कवि के धैर्य का सूचक है, जिसकी आज के दौर में जरूर सराहना की जानी चाहिए।
चंद्रेश्वर की कविताओं में बार-बार यह बेचैनी सामने आती है कि ‘चीजें बदल रही हैं’, अब ‘यकीन के साथ’ अपने घर, गांव, अंचल और देश को अपना नहीं कहा जा सकता यानी जो उसमें बदलाव आ रहे हैं, वे सुखद नहीं हैं, बेहतरी के सपनों के अनुरूप नहीं हैं। राजनीति, अर्थनीति, मानवीय संबंध और प्रेम तक की शक्ल को तेजी से बदलते हुए कवि देखता है- ‘‘कितनी तेजी से बदल रहा है बाजार...राजनेता दल बदल रहे हैं/ मनचले युवक लगातार बदल रहे हैं/ प्रेमिकाएं/ युवतियां प्रेमी’’। अन्याय, बेईमानी, धूत्र्तता, मक्कारी, झूठ, युद्ध, हिंसा, रक्तपात और घृणा ही जैसे जिंदगी के आसान रास्ते बन गए हैं, मगर कवि का कहना है कि ‘...जिंदगी आसान रास्तों पर/ चलने का/ नाम नहीं है !’’ यह जो आसान रास्ते पर चलने से इनकार है, उसकी वजह है विचार और उससे जुड़ी हुई ‘उम्मीद’। इस लिहाज से आलोचक चंद्रभूषण तिवारी की स्मृति में लिखी गई उनकी कविता देखने लायक है- ‘‘वे इंकलाब चाहते थे/...वे बेचैन थे अपने समय में/ साहित्य नहीं था उनके लिए/ कैरियर...। चंद्रभूषण तिवारी की जो विचारधारात्मक गरमाहट थी, उसे पाने की प्रतिबद्धता का इजहार कवि ने इस कविता में किया है। चंद्रेश्वर के इस संकलन में स्त्री-विमर्श के चालू उत्तेजक और सनसनी वाले फार्मूलों से अलग बिल्कुल सीधे और सहज अंदाज में आम स्त्री की आकांक्षा को अभिव्यक्त करने वाली कविताएं हैं, जो पाठकों को संवेदनशील बनाती हैं।
ठीक चंद्रश्ेवर की कविता ‘मेरा घर’ की तरह ही जम्मू की वरिष्ठ कवयित्री शकुंत दीपमाला ‘लड़की का आयतन’ में लिखती हैं- ‘‘एक घर था उसके आगे/ और एक घर/ उसके पीछे था/ परंतु दोनों में से/ कौन सा घर/ उसका अपना था’’। यह कविता ‘तवी जहां से गुजरती है’ किताब में संकलित है। अपनी भूमिका में प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने इस संकलन को पूरी हिंदी कविता के लिए एक विरल एवं अविस्मरणीय घटना कहा हैै। बेशक इस लिहाज से तो यह संकलन अविस्मरणीय है ही कि इसमें मनोज शर्मा, शेख मोहम्मद कल्याण, अशोक कुमार, राज जम्वाल, कमलजीत चैधरी, अमिता मेहता, शकुंत दीपमाला, महाराज कृष्ण संतोषी, पवन खजुरिया, संजीव भसीन, कृष्ण कुमार शर्मा, कपिल अनिरुद्ध, सुधीर महाजन यानी तेरह कवियों की कविताएं हैं। सारी कविताएं श्रेष्ठ ही नहीं होतीं, लेकिन कई बार यह देखना भी महत्त्वपूर्ण होता है कि साधारण से साधारण कविता भी कितने बड़े सवालों को उठाती है। कृष्ण कुमार शर्मा की एक कविता का शीर्षक ही है- ‘हंसी में मत टालिए’। भेडि़यों के बारे में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने कभी एक कविता लिखी थी, जो आज तक कविता पोस्टरों में नजर आती है, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद उन भेडि़यों की शिनाख्त संजीव भसीन भी अपनी कविता में करते हैं। लेकिन सर्वेश्वर ने कहा था- भेडि़या गुर्राता है तुम मशाल जलाओ, वह आह्वान इन कविताओं में नहीं हैं। इसकी वजहें भी हैं। मनोज शर्मा ‘चीख’ कविता में लिखते हैं- ‘‘अंधेरे में/ हम सभी चीख रहे हैं/ हथकडि़यां आदत या राहत लगती हैं/ कभी अगर/ बेडि़यों के जमीन से जुड़े तर्क/ हमें उकसाते हैं/ हम शोर मचाते हैं/ अपने जैसों के पीछे भागते/ मौलिक चीख भी भूल जाते हैं।’’ इन्हीं विडंबनाओं के भीतर से मौलिक चीख और प्रतिरोध की जरूरत का अहसास तीव्रता से उभरता है। जम्मू के इन कवियों की कविताओं में कुछ जगह सत्तर के दशक की कविता के मुहावरे भी नजर आते हैं।
ये मुहावरे रंजीत वर्मा के कविता संग्रह- ‘एक चुप के साथ’ में कुछ ज्यादा ही मुखर हैं, उनको पढ़ते हुए कई बार धूमिल और पाश की याद आती है। यह अलग बात है कि वे कई बार अपनी कविता से निबंधों-सा असर भी पैदा करते हैं। 28 वर्षों की काव्य-यात्रा में यह उनका दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। रंजीत वर्मा के यहां आत्मधिक्कार का स्वर नहीं है, बल्कि उसकी जगह गुस्सा और क्षोभ है। लगातार एक जिरह है, जो सामाजिक-राजनैतिक दुनिया के साथ तो है ही, साहित्य की दुनिया के साथ भी है। उन्हें इसका अहसास भी है कि उन्हें छोटा कवि माना जाता है, लेकिन बड़े कवियों से उनकी बहस इस बात को लेकर है कि वे जिस राह पर जा रहे हैं, वह कविता को जनता से दूर कर रही है। पूर्व से उठे प्रचंड तूफान, बिहार के किसान आंदोलन के आवेग, वियतनामी जनता की जीत के बावजूद कवि अपनी सृजन-यात्रा में जिन बदलावों को महसूस करता है, उसे लेकर कमोबेश सारे कवि चिंतित हैं- ‘‘ईमानदार रोज गिरता है यहां/ पछाड़ खाकर/ तिकड़मों के सामने/ सफल होने की भूख/ डकार चुकी है/ हमारा विवेक/ भय दिन-रात करता है पीछा/ फटे जूते पहने/ उद्वेलित मन/ और तमतमाया चेहरा/ अब तो कविताओं में भी/ मुश्किल से मिलता है।’(शहर बदल गया है)।
यह संयोग है कि आजकल कविता में प्रेम की आमद कुछ बढ़ गई है। इसी परिदृश्य में विमल कुमार की प्रेम कविताओं का संग्रह ‘बेचैनी का सबब’ आया हैै। चैवालीस कविताओं के इस संग्रह में प्रेम के प्रति एक किशोरसुलभ जिज्ञासा, आकांक्षा और अपनी चाहत को मूल्य बनाने की कोशिश के दिलचस्प अनुभव दर्ज हैं। दरअसल ये कविताएं एकतरफा प्रेम की कविताएं अधिक लगती हैं। इन प्रेम कविताओं में प्रेमी लगातार अपने प्रेम को आदर्शीकृत करने की कोशिश करता है और शिकायत या उलाहना के स्वर को छिपाने की कोशिश करता है, लेकिन उसे छिपा पाने में विफल है। दरअसल संग्रह की दूसरी कविता से जिस संशय की शुरुआत होती है, वह आद्यंत बरकरार रहता है- ‘जानता हूं अब असली चीजें नहीं मिलती बाजार में/ चांदनी चैक से करोल बाग तक/ नकली चीजों से अंटी पड़ी हैं दुकानें/ नकली लोग/ नकली दोस्ती/ नकली आत्मीयता/ और यह प्रेम भी/ अगर निकला नकली !’ (बाजार में प्रेम) अंतिम कविता जैसे इसी का स्वीकार है- ‘क्या कहीं नहीं था/ वह प्रेम/ सिर्फ एक/ खयाल था?...मछुआरों ने फेंका/ जीवन की नदी में/ एक जाल था!’
इस बाजारू वक्त में जहां बुराइयां भी शान से बिकती हैं और जहां सामाजिक परिवर्तन या मुक्ति की कोशिशों में बाधक आत्मकेंद्रित-उपभोक्तावादी व्यक्ति स्वातंत्र्य या दमनकारी-शोषणकारी अतीत और परंपरा को लेकर कोई अवसाद या आत्मभत्र्सना नहीं है, वहां अगर कोई कवि, गोरख पांडेय की कविता ‘बंद खिड़कियों से टकरा कर’ से भी ज्यादा सार्थक कविता लिख रहा है, तो उस पर ध्यान तो देना ही चाहिए। मुकुल सरल के पहले कविता संग्रह ‘उजाले का अंधेरा’ की बड़ी जबर्दस्त भूमिका नीलाभ ने लिखी है, जिसमें उन्होंने हिंदी कवियों के एक बड़े तबके को विपथगामी बताते हुए, मुकुल सरल को ढाढ़स बंधाने वाला कवि कहा है। मुकुल सरल दस साल सें लिख रहे हैं। यह उनका पहला संग्रह है, जो हिंदी अकादमी, दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में कई रंग की कविताएं और गजलें हैं। वैसी उनकी माने तो वे भावुक कवि-चितेरे हैं, दर्शन से घबराते हैं और उन्हें एक ही भाषा आती है। इसी एक भाषा में वे ‘देह के गुलाब’ लिखते हैं और ‘भीगा-भीगा चांद’ भी। जहां हिंदी कविता में लगातार प्रेम सहित कई चीजों को बचाने-बचाने की पुकार मची हुई है, मुकुल की कविता आश्वस्त करती है कि ‘सूखता ही नहीं/ प्रेम का समुंदर/ कोई कितने भी वाण चलाए।’ विमल कुमार की तरह मुकुल सरल की प्रेम कविताओं में संशय और सवाल नहीं हैं।
संवेदना और वैचारिक सरोकार के लिहाज से कवि जितेंद्र कुमार के कविता संग्रह- ‘समय का चंद्रमा’ को भी पढ़ा जाना चाहिए। उनकी कविताएं किसी के व्यक्तिगत जीवन के सुख-दुख और प्रेम-घृणा के बयान तक सीमित नहीं हंै। वे सिर्फ मध्यवर्ग की कविताएं नहीं हैं। कवि का साफ-साफ कहना है- ‘अधूरा होगा कवि का अनुभव-संसार/ मेरे गांव की अंगूठाछाप औरतों के जिक्र बिना।’ कवि भारतीय शासकवर्ग के निरंतर फासिस्ट और साम्राज्यवादपरस्त होते जाने के प्रति फिक्रमंद है। चाहे वह दुनिया में लोकतंत्र और न्याय के नाम पर बर्बरता ढाने वाला अमेरिकन साम्राज्यवाद हो या सामाजिक न्याय की आड़ में लूट और अपराध का नंगा नाच करने वाला कोई देशी राजनेता हो या बुर्जुआ राजनैतिक दलों का पिछलग्गू और समझौतापरस्त वामपंथ या कोई अराजकतावादी संगठन- उनके छद्म को उजागर करने में वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। जितेंद्र कुमार कविता को सामंती शक्तियों द्वारा किए जाने वाले जनसंहार का सामना कर रहे गरीब किसानों की चीख भी बताते हैं, गौर करने की बात यह है कि यहां खेत मजदूर ही किसान हैं। भूस्वामी, जो ढहते सामंती वर्चस्व और रिवाजों को बचाने की निरर्थक कोशिश कर रहे हैं, उनके प्रति एक गहरा व्यंग्य भाव है इस संग्रह की कई कविताओं में। इन कविताओं की अपनी एक राजनीति है, जो सामंती-सांप्रदायिक-अन्धधार्मिक प्रवृत्तियों, जनविरोधी लोकतंत्र, बाजारवाद- सबसे टकराती है। पर्यावरण बचाने का सवाल भी इस राजनीति या कहें इस कविता दृष्टि से बाहर नहीं है।
अब भी: चंद्रेश्वर
प्रकाशक-उद्भावना, राजनगर, गाजियाबाद
मूल्य-75 रु.
तवी जहां से गुजरती है: (सं- अशोक कुमार)
प्रकाशक- यूनीस्टार बुक्स प्रा. लि.
मूल्य- 150 रु.
एक चुप के साथ: रंजीत वर्मा
पुस्तक भवन, नई दिल्ली-110045
बेचैनी का सबब: विमल कुमार
प्रकाशक- संवेद, रोहिणी, दिल्ली
मूल्य- 20 रु.
उजाले का अंधेरा: मुकुल सरल
कश्यप पब्लिकेशन, गाजियाबाद-05
मूल्य- 190 रु.
समय का चंद्रमा: जितेंद्र कुमार
किताब प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, बिहार
मूल्य- 125 रु.
‘‘यह कैसा समय है यारों/ तेजी से मिटता जा रहा है फर्क/ असली-नकली का/ खोटे सिक्कों से पटा पड़ा है बाजार/ छल भरी मुद्राओं और मुहावरों से/ ढंकी पड़ी है भाषा’’- ये पंक्तियां चंद्रेश्वर के संकलन ‘अब भी’ की कविताओं की मूल चिंता है। लगभग ढाई दशक तक कविता लेखन के बाद आया यह पहला संकलन कवि के धैर्य का सूचक है, जिसकी आज के दौर में जरूर सराहना की जानी चाहिए।
चंद्रेश्वर की कविताओं में बार-बार यह बेचैनी सामने आती है कि ‘चीजें बदल रही हैं’, अब ‘यकीन के साथ’ अपने घर, गांव, अंचल और देश को अपना नहीं कहा जा सकता यानी जो उसमें बदलाव आ रहे हैं, वे सुखद नहीं हैं, बेहतरी के सपनों के अनुरूप नहीं हैं। राजनीति, अर्थनीति, मानवीय संबंध और प्रेम तक की शक्ल को तेजी से बदलते हुए कवि देखता है- ‘‘कितनी तेजी से बदल रहा है बाजार...राजनेता दल बदल रहे हैं/ मनचले युवक लगातार बदल रहे हैं/ प्रेमिकाएं/ युवतियां प्रेमी’’। अन्याय, बेईमानी, धूत्र्तता, मक्कारी, झूठ, युद्ध, हिंसा, रक्तपात और घृणा ही जैसे जिंदगी के आसान रास्ते बन गए हैं, मगर कवि का कहना है कि ‘...जिंदगी आसान रास्तों पर/ चलने का/ नाम नहीं है !’’ यह जो आसान रास्ते पर चलने से इनकार है, उसकी वजह है विचार और उससे जुड़ी हुई ‘उम्मीद’। इस लिहाज से आलोचक चंद्रभूषण तिवारी की स्मृति में लिखी गई उनकी कविता देखने लायक है- ‘‘वे इंकलाब चाहते थे/...वे बेचैन थे अपने समय में/ साहित्य नहीं था उनके लिए/ कैरियर...। चंद्रभूषण तिवारी की जो विचारधारात्मक गरमाहट थी, उसे पाने की प्रतिबद्धता का इजहार कवि ने इस कविता में किया है। चंद्रेश्वर के इस संकलन में स्त्री-विमर्श के चालू उत्तेजक और सनसनी वाले फार्मूलों से अलग बिल्कुल सीधे और सहज अंदाज में आम स्त्री की आकांक्षा को अभिव्यक्त करने वाली कविताएं हैं, जो पाठकों को संवेदनशील बनाती हैं।
ठीक चंद्रश्ेवर की कविता ‘मेरा घर’ की तरह ही जम्मू की वरिष्ठ कवयित्री शकुंत दीपमाला ‘लड़की का आयतन’ में लिखती हैं- ‘‘एक घर था उसके आगे/ और एक घर/ उसके पीछे था/ परंतु दोनों में से/ कौन सा घर/ उसका अपना था’’। यह कविता ‘तवी जहां से गुजरती है’ किताब में संकलित है। अपनी भूमिका में प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने इस संकलन को पूरी हिंदी कविता के लिए एक विरल एवं अविस्मरणीय घटना कहा हैै। बेशक इस लिहाज से तो यह संकलन अविस्मरणीय है ही कि इसमें मनोज शर्मा, शेख मोहम्मद कल्याण, अशोक कुमार, राज जम्वाल, कमलजीत चैधरी, अमिता मेहता, शकुंत दीपमाला, महाराज कृष्ण संतोषी, पवन खजुरिया, संजीव भसीन, कृष्ण कुमार शर्मा, कपिल अनिरुद्ध, सुधीर महाजन यानी तेरह कवियों की कविताएं हैं। सारी कविताएं श्रेष्ठ ही नहीं होतीं, लेकिन कई बार यह देखना भी महत्त्वपूर्ण होता है कि साधारण से साधारण कविता भी कितने बड़े सवालों को उठाती है। कृष्ण कुमार शर्मा की एक कविता का शीर्षक ही है- ‘हंसी में मत टालिए’। भेडि़यों के बारे में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने कभी एक कविता लिखी थी, जो आज तक कविता पोस्टरों में नजर आती है, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद उन भेडि़यों की शिनाख्त संजीव भसीन भी अपनी कविता में करते हैं। लेकिन सर्वेश्वर ने कहा था- भेडि़या गुर्राता है तुम मशाल जलाओ, वह आह्वान इन कविताओं में नहीं हैं। इसकी वजहें भी हैं। मनोज शर्मा ‘चीख’ कविता में लिखते हैं- ‘‘अंधेरे में/ हम सभी चीख रहे हैं/ हथकडि़यां आदत या राहत लगती हैं/ कभी अगर/ बेडि़यों के जमीन से जुड़े तर्क/ हमें उकसाते हैं/ हम शोर मचाते हैं/ अपने जैसों के पीछे भागते/ मौलिक चीख भी भूल जाते हैं।’’ इन्हीं विडंबनाओं के भीतर से मौलिक चीख और प्रतिरोध की जरूरत का अहसास तीव्रता से उभरता है। जम्मू के इन कवियों की कविताओं में कुछ जगह सत्तर के दशक की कविता के मुहावरे भी नजर आते हैं।
ये मुहावरे रंजीत वर्मा के कविता संग्रह- ‘एक चुप के साथ’ में कुछ ज्यादा ही मुखर हैं, उनको पढ़ते हुए कई बार धूमिल और पाश की याद आती है। यह अलग बात है कि वे कई बार अपनी कविता से निबंधों-सा असर भी पैदा करते हैं। 28 वर्षों की काव्य-यात्रा में यह उनका दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। रंजीत वर्मा के यहां आत्मधिक्कार का स्वर नहीं है, बल्कि उसकी जगह गुस्सा और क्षोभ है। लगातार एक जिरह है, जो सामाजिक-राजनैतिक दुनिया के साथ तो है ही, साहित्य की दुनिया के साथ भी है। उन्हें इसका अहसास भी है कि उन्हें छोटा कवि माना जाता है, लेकिन बड़े कवियों से उनकी बहस इस बात को लेकर है कि वे जिस राह पर जा रहे हैं, वह कविता को जनता से दूर कर रही है। पूर्व से उठे प्रचंड तूफान, बिहार के किसान आंदोलन के आवेग, वियतनामी जनता की जीत के बावजूद कवि अपनी सृजन-यात्रा में जिन बदलावों को महसूस करता है, उसे लेकर कमोबेश सारे कवि चिंतित हैं- ‘‘ईमानदार रोज गिरता है यहां/ पछाड़ खाकर/ तिकड़मों के सामने/ सफल होने की भूख/ डकार चुकी है/ हमारा विवेक/ भय दिन-रात करता है पीछा/ फटे जूते पहने/ उद्वेलित मन/ और तमतमाया चेहरा/ अब तो कविताओं में भी/ मुश्किल से मिलता है।’(शहर बदल गया है)।
यह संयोग है कि आजकल कविता में प्रेम की आमद कुछ बढ़ गई है। इसी परिदृश्य में विमल कुमार की प्रेम कविताओं का संग्रह ‘बेचैनी का सबब’ आया हैै। चैवालीस कविताओं के इस संग्रह में प्रेम के प्रति एक किशोरसुलभ जिज्ञासा, आकांक्षा और अपनी चाहत को मूल्य बनाने की कोशिश के दिलचस्प अनुभव दर्ज हैं। दरअसल ये कविताएं एकतरफा प्रेम की कविताएं अधिक लगती हैं। इन प्रेम कविताओं में प्रेमी लगातार अपने प्रेम को आदर्शीकृत करने की कोशिश करता है और शिकायत या उलाहना के स्वर को छिपाने की कोशिश करता है, लेकिन उसे छिपा पाने में विफल है। दरअसल संग्रह की दूसरी कविता से जिस संशय की शुरुआत होती है, वह आद्यंत बरकरार रहता है- ‘जानता हूं अब असली चीजें नहीं मिलती बाजार में/ चांदनी चैक से करोल बाग तक/ नकली चीजों से अंटी पड़ी हैं दुकानें/ नकली लोग/ नकली दोस्ती/ नकली आत्मीयता/ और यह प्रेम भी/ अगर निकला नकली !’ (बाजार में प्रेम) अंतिम कविता जैसे इसी का स्वीकार है- ‘क्या कहीं नहीं था/ वह प्रेम/ सिर्फ एक/ खयाल था?...मछुआरों ने फेंका/ जीवन की नदी में/ एक जाल था!’
इस बाजारू वक्त में जहां बुराइयां भी शान से बिकती हैं और जहां सामाजिक परिवर्तन या मुक्ति की कोशिशों में बाधक आत्मकेंद्रित-उपभोक्तावादी व्यक्ति स्वातंत्र्य या दमनकारी-शोषणकारी अतीत और परंपरा को लेकर कोई अवसाद या आत्मभत्र्सना नहीं है, वहां अगर कोई कवि, गोरख पांडेय की कविता ‘बंद खिड़कियों से टकरा कर’ से भी ज्यादा सार्थक कविता लिख रहा है, तो उस पर ध्यान तो देना ही चाहिए। मुकुल सरल के पहले कविता संग्रह ‘उजाले का अंधेरा’ की बड़ी जबर्दस्त भूमिका नीलाभ ने लिखी है, जिसमें उन्होंने हिंदी कवियों के एक बड़े तबके को विपथगामी बताते हुए, मुकुल सरल को ढाढ़स बंधाने वाला कवि कहा है। मुकुल सरल दस साल सें लिख रहे हैं। यह उनका पहला संग्रह है, जो हिंदी अकादमी, दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में कई रंग की कविताएं और गजलें हैं। वैसी उनकी माने तो वे भावुक कवि-चितेरे हैं, दर्शन से घबराते हैं और उन्हें एक ही भाषा आती है। इसी एक भाषा में वे ‘देह के गुलाब’ लिखते हैं और ‘भीगा-भीगा चांद’ भी। जहां हिंदी कविता में लगातार प्रेम सहित कई चीजों को बचाने-बचाने की पुकार मची हुई है, मुकुल की कविता आश्वस्त करती है कि ‘सूखता ही नहीं/ प्रेम का समुंदर/ कोई कितने भी वाण चलाए।’ विमल कुमार की तरह मुकुल सरल की प्रेम कविताओं में संशय और सवाल नहीं हैं।
संवेदना और वैचारिक सरोकार के लिहाज से कवि जितेंद्र कुमार के कविता संग्रह- ‘समय का चंद्रमा’ को भी पढ़ा जाना चाहिए। उनकी कविताएं किसी के व्यक्तिगत जीवन के सुख-दुख और प्रेम-घृणा के बयान तक सीमित नहीं हंै। वे सिर्फ मध्यवर्ग की कविताएं नहीं हैं। कवि का साफ-साफ कहना है- ‘अधूरा होगा कवि का अनुभव-संसार/ मेरे गांव की अंगूठाछाप औरतों के जिक्र बिना।’ कवि भारतीय शासकवर्ग के निरंतर फासिस्ट और साम्राज्यवादपरस्त होते जाने के प्रति फिक्रमंद है। चाहे वह दुनिया में लोकतंत्र और न्याय के नाम पर बर्बरता ढाने वाला अमेरिकन साम्राज्यवाद हो या सामाजिक न्याय की आड़ में लूट और अपराध का नंगा नाच करने वाला कोई देशी राजनेता हो या बुर्जुआ राजनैतिक दलों का पिछलग्गू और समझौतापरस्त वामपंथ या कोई अराजकतावादी संगठन- उनके छद्म को उजागर करने में वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। जितेंद्र कुमार कविता को सामंती शक्तियों द्वारा किए जाने वाले जनसंहार का सामना कर रहे गरीब किसानों की चीख भी बताते हैं, गौर करने की बात यह है कि यहां खेत मजदूर ही किसान हैं। भूस्वामी, जो ढहते सामंती वर्चस्व और रिवाजों को बचाने की निरर्थक कोशिश कर रहे हैं, उनके प्रति एक गहरा व्यंग्य भाव है इस संग्रह की कई कविताओं में। इन कविताओं की अपनी एक राजनीति है, जो सामंती-सांप्रदायिक-अन्धधार्मिक प्रवृत्तियों, जनविरोधी लोकतंत्र, बाजारवाद- सबसे टकराती है। पर्यावरण बचाने का सवाल भी इस राजनीति या कहें इस कविता दृष्टि से बाहर नहीं है।
अब भी: चंद्रेश्वर
प्रकाशक-उद्भावना, राजनगर, गाजियाबाद
मूल्य-75 रु.
तवी जहां से गुजरती है: (सं- अशोक कुमार)
प्रकाशक- यूनीस्टार बुक्स प्रा. लि.
मूल्य- 150 रु.
एक चुप के साथ: रंजीत वर्मा
पुस्तक भवन, नई दिल्ली-110045
बेचैनी का सबब: विमल कुमार
प्रकाशक- संवेद, रोहिणी, दिल्ली
मूल्य- 20 रु.
उजाले का अंधेरा: मुकुल सरल
कश्यप पब्लिकेशन, गाजियाबाद-05
मूल्य- 190 रु.
समय का चंद्रमा: जितेंद्र कुमार
किताब प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, बिहार
मूल्य- 125 रु.






1 comments:
एक अच्छी, संक्षोप्त समीक्षा जो पुस्तक पढने के लिये उकसाती है। धन्यवाद।
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