हमारे कारवॉं को मंजिलों का इंतजार है , ये आंधियों , ये बिजलियों की पीठ पर सवार है , तू आ कदम मिला के चल , चलेंगे एक साथ हम , अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला जमीन पर , तू जिन्‍दा है तो जिन्‍दगी की जीत में यकीन कर - शैलेंद्र

सोमवार, 25 जुलाई 2011

ग़ज़ल




 

आँखों में सजाए चलते थे,    पलकों  पे उठाये चलते थे 
वो ख़्वाबों की इक नगरी थी ,सब अपने-पराए चलते थे 
ऐसा न हुआ  इक लम्हा भी  राहों पे अकेलापन अखरे
कुछ दूर तलक तो साथी थे फिर याद के साए चलते थे
इन ज़रदारों की दुनिया में हर वक़्त अना मजरूह हुई
हम   छोटी-छोटी   बातों के एहसान  उठाए चलते थे  
अफ़सानों के ही लोग थे वो ,वो लोग कहानी जैसे थे 
बोसीदा  चादर क़दरों की  सीने से  लगाए चलते  थे 
इस पुररोशन माहौल में हम क्या टूटी-बिखरी बात करें
हाँ, चेहरे थे बीमार से कुछ ,कुछ ज़ख्म छुपाए चलते थे 
क्या भूल गए ये याद नहीं ,पर कुछ तो सचमुच  भूले हैं 
तुम ही कहना क्या राहों पे हम सर को झुकाए चलते थे 
इक ख़्वाब से दीगर ख़्वाब में वो दाख़िल भी हुए क्या चुपके से 
ख़ामोश  हुए 'कुंदन 'साहब    कोहराम मचाए   चलते   थे
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