रविवार, 12 जून 2011

महानता के प्रतिमानों की धज्जियां - कुमार मुकुल

ब्लॉगस्पॉट डाट काम
  


अपनी वर्गीय सीमा के बावजूद समानांतर मीडिया के रूप में ब्लॉग एक प्रभावी
विकल्प बनता जा रहा है। उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग के अंतरविरोधों को यह
बखूबी उजागर करता है। अन्ना हजारे के लोकपाल को लेकर किए गए अनशन पर
जमीन-आसमान एक करने वालों के बरक्स गांधीवाद का एक और आख्यान रचती इरोम
शर्मिला की एक कविता का अनुवाद http://anunaad-blogspot-com/  पर अशोक
कुमार पांडेय ने पोस्ट किया है -
खत्म कर दिया गया है सोचने का कौशल
सोचने के बारे में अब कोई प्रयोग नहीं
.......
खुल जाने दो कैद की दीवारों को
मैं नहीं जाऊंगी किसी और रास्ते पर
कृपा करके हटा दो काँटों की बेड़ियों को
मत सजा दो मुझे इस बात की
कि चिड़ियों के रूप में हुआ है मेरा जन्म...
इसी तरह http://teesraraasta.blogspot.com/ पर आनंद प्रधान ने चैनलों की
अच्छी खबर ली है। चैनलों की ये रिपोर्टें और कार्यक्रम वास्तव में,
दर्शकों के लिए मानव निर्मित आपदा से कम नहीं हैं। ऐसी रिपोर्टें
प्राकृतिक आपदाओं को लेकर न सिर्फ वैज्ञानिक समझ का मजाक उड़ाती हैं बल्कि
उस इंसानी जज्बे का भी अपमान करती हैं जो जापान और किसी भी अन्य देश में
पुनर्निर्माण के लिए साहस, धैर्य और दृढ़ता के साथ दोबारा उठ खड़ी होती ह।
इस प्रवृति पर आगे चोट करते वे लिखते हैं- आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही कई
हिंदी चैनलों पर जापानी सुनामी के बहाने महाप्रलय की पूर्व चेतावनियां,
महाविनाश के पांच संकेत और २०१२ में दुनिया के खत्म होने सम्बन्धी निहायत
ही अवैज्ञानिक, बे-सिरपैर के और डरावने विशेष कार्यक्रम चलने लगें। वैसे
भी हिंदी चैनलों का यह प्रिय विषय है। अकसर ही महाप्रलय और महाविनाश और
इस तरह दुनिया के खत्म होने की विशेष रिपोर्टें चलती रहती हैं जिनमें कुछ
फिल्मी और कुछ असली प्राकृतिक आपदाओं की फुटेज को मिक्स करके दर्शकों को
डराने और चैनल से चिपकाने की कोशिश होती है।
ब्लॉग ने एक जरूरी काम यह किया है कि उसने महानता के प्रतिमानों की
धज्जियां उडा दी है। यहां आपके छोटे-छोटे कार्य भी आपकी एक पहचान बनाते
हैं। लोगों के सामने अपने काम को लाते हुए उनकी सही-गलत राय से नये
रचनाकार अपनी भविश्य की राह तय कर पाते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक
मीडिया में उपेक्षा के षिकार रचनाकारों को प्रोत्साहित करने में ब्लॉगों
की अहम भूमिका है। http://shabdavali-blogspot-com/ पर अजित वाडनेकर एक
अरसे से शब्दों की बाबत लिखते आ रहे हैं। शंख शब्द की व्याख्या करते वे
लिखते हैं - शंख यूँ तो भारतीय संस्कृति में एक मांगलिक चिह्न है। यह एक
प्राचीन वाद्य भी है जिसका प्रयोग विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में होता
रहा है। शंखनाद एक चिरपरिचित शब्द है जिसमें मुहावरे की अर्थवत्ता है।
इसका अर्थ होता है किसी संकल्प की घोषणा, युद्ध की घोषणा आदि। शंख आकार
में छोटा हो या बड़ा, उसकी मूल बनावट एक सी होती है अर्थात उसका मध्यांग
बेहद फूला हुआ होता है जिसमें से होकर गूँजती हुई तेज आवाज निकलती है,
मगर इस संरचना के भीतर सिर्फ खाली स्थान ही होता है। वही ढोल की पोल।
मराठी में किसी शठ या मूर्ख व्यक्ति को भी शंख की उपमा दी जाती है अर्थात
जो सिर्फ बातें करना जानता है, या जिसके भीतर दिमाग नहीं होता। स्पष्ट है
कि ढपोरशंख ऐसा व्यक्ति है जो मूलतः अज्ञानी है, मगर ज्ञान बघारता नजर
आता है।
 
शब्दों के सफर के ये शोधपूर्ण आलेख आगे राजकमल से पुस्तकाकार प्रकाषित
भी हुए। 400 पृश्ठों की इस पुस्तक में 1500 से ज्यादा शब्दों की
व्युत्पत्ति और विवेचना संबंधी दिलचस्प ब्योरा है। इसी आकार में सफर का
दूसरा और तीसरा पड़ाव भी तैयार हैं और प्रकाशन की कतार में है।
शब्दों के सफर की बाबत अजीत लिखते हैं - उत्पत्ति की तलाश में निकलें तो
शब्दों  का बहुत दिलचस्प सफर सामने आता है। लाखों सालों में जैसे इन्सान
ने धीरे -धीरे अपनी शक्ल बदली, सभ्यता के विकास के बाद से शब्दों ने
धीरे-धीरे अपने व्यवहार बदले। एक भाषा का शब्द दूसरी भाषा में गया और
अरसे बाद एक तीसरी ही शक्ल में सामने आया। .......शब्द की तलाश दरअसल
अपनी जड़ों की तलाश जैसी ही है। शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा
विज्ञानियों का नजरिया अलग-अलग होता है। मैं न भाषा विज्ञानी हूं और न ही
इस विषय का आधिकारिक विद्वान। जिज्ञासावश स्वांतःसुखाय जो कुछ खोज रहा
हूं, पढ़ रहा हूं, समझ रहा हूं ...उसे आसान भाषा में छोटे-छोटे आलेखों में
आप सबसे साझा करने की कोशिश है यह।
 
भाशा को लेकर कई तरह के काम ब्लॉगर करते रहते हैं। ये काम आम पाठकों को
बहुत तेजी से हिन्दी की ओर आकर्शित कर रहे हैं। इनकी बदौलत अब हिन्दी की
ओर आमलोगों का झुकाव बढता जा रहा है। अनुनाद सिंह का
http://pratibhaas.blogspot.com/  ऐसी ही एक साइट है। इस साइट पर हम कई
तरह के फान्ट परिवर्तक एक साथ प्राप्त कर सकते हैं। ये फान्ट परिवर्तक
आसानी से आपके क्रुतिदेव, चाणक्य फान्टों  आदि में लिखे गए आलेखों को
इंटरनेट के लिए उपयोगी फान्ट मंगल या यूनिकोड में बदल देते हैं। यहां
हिन्दी के उपकरणों यानि साफ्टवेयरों के बारे में भी जानकारी मिल जाएगी।
इसके अलावे गूगल बुक्स ने जो ढेरों किताबे अपने साइट पर उपलब्ध करा रखी
हैं उनमें करीब तीन सौ अच्छी किताबों की सूची आप यहां पा सकते हैं।
ब्लॉग पर आप हर किस्म की सामग्री पा सकते हैं। यहां कोई बंदिष नहीं है।
कहानी, कविता, आलेख, संस्मरण, नोट्स कुछ भी। सामान्यतः लोग आकार में
छोटी-छोटी चीजें ही यहां प्रस्तुत करना चाहते हैं। चूंकि यहां पाठकों के
पास समय की कमी और सामग्री की भरमार होती है और उसी में उन्हें अपना
चुनाव करना होता है। फिर भी जो अपनी लंबी दास्तानें लिखना चाहते हैं , वे
लिखते ही हैं। नीलाभ का मोर्चा http://neelabhkamorcha.blogspot.com/ पर
कथाकार अष्क के पुत्र कवि, अनुवादक नीलाभ अपने संस्मरणों की लंबी-लंबी
इक्कीस किस्तें लिख चुके हैं। इसी बहाने वे पिछले पचास सालों की
साहित्यिक हलचलों का जायजा लेते चल रहे हैं। स्मृतियों की व्याख्या करते
नीलाभ लिखते हैं - स्मृतियों के साथ यही दिक्कत है, जिन्हें आप अक्सर याद
करते हैं और दूसरों को बताना चाहते हैं , वे ठीक बताने के समय गायब हो
जाती हैं। आगे वे ज्ञानरंजन को उदृत करते हैं - स्मृति ज्यों-त्यों
इतिहास नहीं है। वह लगातार विकृति की ओर बढते-बढते एक नये अजूबे संसार
में पहुंच जाती है.....बोर्खेज कहते हैं - कि पहली बार किसी को याद करना
उसको बदलना है, दूसरी बार, तीसरी बार याद करना काफी बदलना है। जिस तरह
अनुवाद.....

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