रविवार, 12 जून 2011

चुप रहने की जगह अमेरिका नहीं है - कुमार मुकुल

ब्लाॅगस्पाट.काॅम

ब्लाॅग ने वैकल्पिक मीडिया के रूप में अपनी अच्छी जगह बना ली है। इस पर आप मीडिया में हो रहे अधुनातन परिवर्तनों पर अच्छी सामग्री पा सकते हैं। अब यह कहा जा सकता है कि मीडिया पर कोई भी शोध ब्लाॅग जगत को अनदेखा कर नहीं किया जा सकता। अखबारों में मास्टहैड में आ रहे परिवर्तनों पर प्रमोद जोशी ने अपने ब्लाॅग  ीजजचरूध्ध्चतंउंजीमेी.इसवहेचवज.बवउ  पर अच्छी टिप्पणी की है। वे लिखते हैं - अखबार के मास्टहैड का इस्तेमाल अब इतने तरीकों से होने लगा है कि कुछ लोगों के लिए यह दिलचस्पी का विषय नहीं रह गया है। फिर भी 14 मई के टेलीग्राफ के पहले सफे ने ध्यान खींचा है। इसमें मास्टहैड अखबार की छत से उतर कर फर्श पर चला गया है।
अखबार के ब्रैंड बनने पर तमाम बातें हैं। पत्रकारों और सम्पादकों, खबरों और विश्लेषणों से ज्यादा महत्वपूर्ण है ब्रैंड। ...लेफ्ट या राइट। कंजर्वेटिव या लिबरल। कांग्रेसी या संघी। ...दुनिया भर की खबरों को एक पर्चे पर छाप दो तो वह अखबार नहीं बनता। सिर्फ मास्टहैड लगा देने से वह अखबार बन जाता है। और इस तरह वह सिर्फ मालिक की ही नहीं पाठक की धरोहर भी होती है। बहरहाल...हाल में बड़ी संख्या में अखबारों ने अपने मास्टहैड के साथ खेला है। हिन्दी में नवभारत टाइम्स तो लाल रंग में अंग्रेजी के तीन अक्षरों के आधार पर खुद को यंग इंडिया का अखबार घोषित कर चुका है। ऐसे में टेलीग्राफ ने अपने मास्टहैड के मार्फत नई सरकार का स्वागत किया है। अच्छा-बुरा उसके पाठक जानें, पर बाकी अखबार दफ्तरों में कुलबुलाहट जरूर होगी कि इसने तो मार लिया मैदान, अब इससे बेहतर क्या करें गुरू। क्या कोई बता सकता है कि इसका मतलब कुछ अलग सा करने के अलावा और क्या हो सकता है?
अपने ब्लाॅग मीडिया स्कूल ीजजचरूध्ध्अंतजपांदंदकं.इसवहेचवज.बवउध् पर वर्तिका नंदा ने मीडिया के मॉल में धर्म की सेल शीर्षक से मीडिया के बाबावाद की अच्छी खबर ली है। वे लिखती हैं - अंग्रेजी आउटलुक ... में बाबा रामदेव हैं। आत्मविश्वास से लबरेज केसरिया चोगे में बाबा के बैकड्राप में संसद भवन है। कहानी का सार कहने के लिए वैसे तो यह तस्वीर ही काफी है। ...आउटलुक जैसी तमाम बड़ी पत्र-पत्रिकाएं पिछले कई दिनों से इस बहस से जूझ रही हैं कि योग गुरू को खुद को योग तक ही सीमित रखना चाहिए या राजनीति के मैदान में उतर कर एक नई तरह की राजनीतिक कपाल भाति को जन्म देना चाहिए। ...सवालों की यह नई उगी फसल बाबाओं के उस बढ़ते वर्चस्व की कहानी कहने के लिए काफी है जो एक दशक में महाकाय हो गई है और इस काम में टेलीविजन ने बाबाओं की ताकत बढ़ाने के कैप्सूल का काम बखूबी निभाया है।
      दरअसल योगगुरू के साए में बाबा ने खुद को विश्वविख्यात ब्रांड में बदल डाला है, जो हर्बल और आयुर्वेद की दवाएं बेचता है।
ब्लाॅग जगत की एक मुख्य खूबी यह है कि यहां सबकुछ अनिश्चित है। कब कहां कौन सा मैटर किस रूप में मिल जाए इसे आप पहले से तय नहीं कर सकते। हजारों ब्लाॅगर हैं कब किसके मन में क्या फुरे और वह क्या लिख मारे ....पता नहीं। किसकी गठरी में क्या है, कौन अंदाजे...। युवा चिंतक प्रसन्न चैधरी ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर का इंदिरादेवी के नाम एक पत्र डाला है अपने ब्लाग ीजजचरूध्ध्चतंेंददंबीवनकींतल.इसवहेचवज.बवउ पर, इसमें अपनी अमेरिका यात्रा को याद करते हुए रवीन्द्रनाथ ने अमेरिकावासियों का मूल्यांकन कर डाला है, वे लिखते हैं - ....जब मैं अमेरिका गया तो मैंने सोचा कि कुछ दिन चुपचाप आराम करूँगा । लेकिन चुप रहने की जगह अमेरिका नहीं है । वह देश मूकं करोति वाचालं है ... मैंने कहा मैं अंग्रेजी नहीं जानता, लेकिन वह बात भी मुझे अंग्रेजी ही में कहनी पड़ी इसलिए किसी ने मेरा विश्वास नहीं किया और कहने लगे, तुम तो अच्छी-खासी अंग्रेजी बोलते हो । .... इस तरह अमेरिका में उन्होंने मेरी गटई दबाकर वक्तृता बाहर निकाल ली ।
इसी तरह रविरतलामी ने अपने ब्लॅाग  ीजजचरूध्ध्ूूू.तंबींदंांत.वतहध्  पर हरिशंकर परसाईं का व्यंग्य पत्र डाला है। कवि कहानीकार का झगडा तो हमेशा का है तो परसाई जी इस पर हाथ साफ करने से कैसे बाज आते। वे लिखते हैं - .... श्रीकांत वर्मा ने .... कहा कि कविता लिखना ऊंचे दर्जे का काम है और कहानी लिखना घटिया काम है कवि जब ऊंचा काम करना चाहता है तब कविता लिखता है और घटिया काम करना चाहता है तब कहानी लिखता है। किसी कवि के मन में कोई घटिया काम करने की जैसे जेब काटने की इच्छा हो तो वह जेब न काट कर एक कहानी लिखेगा। यही बात कहानीकार कवि पर लागू होती है। अश्क कहानीकार है मगर जब जब उनकी इच्छा कोई घटिया काम करने की हुई है जैसे पीछे से किसी को लत्ती मार देने की उन्होंने कविता लिख दी है। राजेन्द्र यादव भी कभी कभी फौजदारी मामले को टालने के लिए कविता लिखते हैं।
जब हर चीज ब्लाॅग पर उपलब्ध है तो फिर समीक्षा ही क्यों अपवादी रहे ...।  ीजजचरूध्ध्ंचअंक.इसवहेचवज.बवउ  पर अनुराग वत्स ने कुछ गंभीर पुस्तकों की समीक्षाएं देनी आरंभ की है। मार्केस की चर्चित किताब  वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड की समीक्षा करते हुए यह ब्लाॅग लिखता है - मार्केस की यह किताब किन्हीं इतिहासों या किन्हीं भविष्यों के बारे में नहीं है। यह किन्हीं क्षणों और किन्हीं क्षणभंगुरताओं के बारे में भी नहीं है। हद से हद यह किन्हीं संभ्रमों और स्वप्नों के बारे में है, जहां वास्तविक सर्वथा अवास्तविक और अवास्तविक सर्वाधिक वास्तविक है। जहां अपनी नींद गंवा देने वाला एक शहर है, इसके बावजूद  जहां चार हजार मजदूरों की हत्या भी एक अफवाह है, खबर नहीं। मृत्यु के उस तरफ हमारी प्रतीक्षा कर रही नारंगी सीटियां और अदृश्य गेंदें आखिर कैसी होंगी? आइनों का शहर मरीचिकाओं का शहर कैसे बन जाता है?
वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड स्वप्नों और आकांक्षाओं का आख्यान है। यह आकांक्षा का एकांत है। प्रेम का एकांत, कामना का एकांत। प्रेम मनुष्यता का सबसे बड़ा दुस्साहस है , नश्वरता के एक प्राकृतिक तर्क का उल्लंघन। इसीलिए दुख, क्षरण और एक वैभवशाली एकांत ही आकांक्षाओं का हासिल हो सकता है।या हो सकता है?

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