मंगलवार, 17 मई 2011

आखिरी सालों में पिता

पिता की क्रिया के दौरान घर में रिश्ते के सारे लोग जुटे थे। पिता को लेकर तमाम चर्चाएं होती रहती थीं। मां की ईच्छा के अनुसार मुझे अनिच्छापूर्वक गरूड़पुराण का पाठ सुनना पड़ रहा था। इस दौरान मैंनें पुराण पर लिखने के लिए तमाम नोट्स लिए। सोचा कि इस पुराण पर कानूनन रोक लगनी चाहिए क्योंकि इसमें सती प्रथा की महिमा का बखान किया गया है और तमाम गड़बडि़यां हंै जिन पर आगे लिखूंगा। इस बीच मां अक्सर पिता के सपने में आने की चर्चा करते रोने लगतीं बहन पूछतीं कि क्या मुझे सपने में पिता आते हैं। पर मेरे सपने में पिता कभी नहीं आए। पर इन सवालों के बाद मैं पिता के बारे में सोचने लगता। तब मार तमाम बातें याद आतीं।
    इधर अब घर खाली हुआ लोगों से तो मैंने पिता की रैक पर पड़ी चीजों को तलाशा कि जानूं कि इन आखिरी सालों में पिता क्या सोचते-गुणते थे। पिता पुजारी किस्म के थे पर उन्होंने कभी घर में किसी पर पूजा के लिए दबाव नहीं डाला। उनकी रैक में रामचरितमानस हमेशा रहती थी। आक्सफोर्ड की एक डिक्शनरी जो उन्हें 1964 में ब्रिटिश काउंसिल द्वारा प्रेजेंट की गयी थी, भी हमेशा साथ रहती थी। इधर मेरी किताबों की रैक से कुछ किताबें उन्होंने अपने रैक पर ला रखीं थीं। जिनमें पंचतंत्र, हितोपदेश आदि थीं। लेनिन की राज्य और क्रांति और कम्यूनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र भी इधर के दिनों में उनकी रैक पर दिख रही थी। ये किताबें मैंने 1984 में एक डेढ रूपये में पटना स्टेशन गोलंबर से खरीदी थीं जो हाल के दिनों में ऐसे ही आलमीरे से निकाल बाहर ला रखी थी। इसके अलावे भक्तिगीतों की दो किताबें थीं, जिनमें एक बहन ले गयी। गांधी के प्रिय भजनों का संग्रह भी हाल के दिनों में उनके बिछावन पर रहता था। वे अंग्रेजी शिक्षक थे सो ग्रामर की एक पुरानी किताब उनके साथ चली आ रही थी अरसे से। उनके कालेज के कोर्स का पोएट्री सेलेक्शन जो कभी मैंने संभाल रखी थी वह भी वहां थी। इसके अलावे होम्योपैथी की एकाध किताब और एक किताब सपनों के विश्लेषण पर।
    फिर मैने बाकी कागज पत्तर भी खंगाल डाले उनके। कोई भी बात लिखने के पहले वे श्रीराम अवश्य लिखते थे। इस तरह श्रीराम के बाद वे क्या क्या लिखते थे यह जानना रोचक रहा मेरे लिए। एक जगह उन्होंने इकबाल की पंक्तियंा लिख रखी थी-अय आबे मौजे गंगा, वह दिन है याद तुझको, उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा...चीनो अरब हमारा...मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का अनुवाद दो जगह उन्होंने हाथों से लिख रखा था जिनमें प्रकृति के रहस्यों के बारे में अपने ज्ञान की सीमा के बारे में लिखा गया है- इसके पहले सत भी नहीं था, असत भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था, छिपा था क्या कहां किसने ढका था....।
    एक जगह उन्होंने एक श्लोक और उसका अर्थ लिखा था-जिसका किया हुआ पाप उसके बाद में किए हुए पुण्य से ढक जाता है, वह मेघ से मुक्त चंद्रमा की भांति इस लोक को प्रकाशित करता है। धूप जब भी सहने योग्य रहती पिता उसमें घंटों बैठे रहते थे। एक जगह उन्होंने ऋग्वेद से सूर्य के महत्व को लेकर लिखी ऋचाएं अर्थ के साथ नोट कर रखीं थीं। कृष्ण को लेकर लिखे गए श्लोक उन्होंने दो जगह नोट कर रखे थे- अधरं मधुरं, वदनं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरं...।
    एक जगह तुलसी की कुछ मार्मिक पंक्तियां नोट कर रखी थीं उन्होंने - ममता तू न गई मेरे मन तें। पाके केश जनम के साथी लाज गयी लोकनतें। तन थाके कर कांपन लागे जोति गयी नैनन तें। एक जगह दिनकर की पंक्तियां टंकी थीं - समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।
    अपने काम की बातें पिता अंग्रेजी में लिखते थे पर सबके काम की बातें हिन्दी में या दोनों भाषाओं में। एक जगह उन्होंने कुछ सूक्तियां नोट कर रखी थीं - जो संयम, इमानदारी, अभिमान, गरीबी आदि पर थीं। लिंकन की पंक्तियां उन्हें पसंद थीं कि - महत्वपूर्ण सिद्धांत लचीले होने चाहिए। दादा दादी दोनों मंगल को मरे थे यह उन्होंने नोट कर रखा था खुद वे सोमवार को गुजरे। हिन्दी फिल्म का एक गीत - बहारों फूल बरसाओं ...भी उन्होंने पूरा नोट कर रखा था।
    इंटर तक पिता मुझे हिमालय की तरह अटल अडिग लगते थे पर बी.ए. के बाद से जो उनसे वैचारिक टकराव आरंभ हुआ तो वह दस साल पहले तक चलता रहा जबतक कि मैं बाहर नहीं रहने लगा। अब लगता है कि मैं कुछ ज्यादा कठोर हो जाता था। पर हाल के दस सालों में वे हम लोगों के प्रति एक हद तक निश्चिंत हो गये थे। गीता के स्थितप्रज्ञ के लक्षण उन्होंने मुझे रटा रखे थे। मैं स्थितप्रज्ञता को अपने लिए गुण नहंी मानता पर पिता के लिए वह गुण ही था। इसके बल पर ही वे हमलोगों की विपरीतता को सहकर भी शांत रहते थे। जब पहला हर्ट अटैक हुआ था तो पिता खुद जाकर भर्ती हुए थे। हास्पीटल में जब डाक्टरों ने कहा कि आपको हार्ट अटैक है और आप अकेले इस दूसरे फ्लोर पर कैसे चले आए। फिर वे दस दिन बेड पर आइसीयू में रहे। इसी दौरान हम पिता के निकट आए। और उनका क्षोम हमलोगों से कम होता गया।
    यह अच्छा हुआ कि इलाज के नाम पर पिता अंतिम दिनों में दिल्ली हमलोगों के साथ रहे। हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि पिता कभी हमारे साथ रह सकते हैं। अब उनके लिए अलग पूजाघर और मां को हर घड़ी हाथ धोने की बीमारी और पिता मां कभी अलग रह नहीं सकते। पर पिता मां आए रहे और हमारे बिखरे परिवार को भी अनजाने में एक कर गए। यह आश्चर्यजनक था कि अपने परिवार से अलग अकेले रहने के बारे में साथ रहते पिता ने कभी सवाल तक नहीं किया। मैं तीन साल से अकेला रह रहा था। पिता की उपस्थिति ने जैसे हम पति-पत्नी के बीच की बहस को अप्रासंगिक कर दिया। हम साथ हो गए भले हमारे मन साथ नहीं हांे, और यह होना भी नहंी है, चीजें फिर पीछे नहंी लौटतीं। हमारे साथ रहने और पहले के अलग रहने में कोई मौलिक भेद नहीं है सिवा इसके कि हम साथ दिख रहे हैं। बच्चों के लिए हमारे साथ रहने और अलग रहने का कोई मानी नहीं है, वे इसे एक समस्या की तरह लेते हैं। जिसका उनके पास कोई निदान नहीं। पर पिता मां की उपस्थिति ने दिखने के स्तर पर हमें एक कर डाला यह छोटी बात नहीं क्योंकि हमारी सामाजिकता के लिए दिखना ही मुख्य पहलू है। इस दौरान आभा ने भी सब भूल कर पिता के लिए  दिन रात एक कर दिया । बच्चो ने भी जाना कि पिता क्या होते हैं।
    मैं पिता की तरह नहीं हो सका, या पिता ही नहीं हो सका। बडे बेटे ने एक दिन कहा था - पापा आप ऐसे कैसे हैं....मैंने पूछा- मतलब। उसने कहा - नहीं, मेरे सभी दोस्त कहते हैं, तुम्हारे पिता इतने फ्रैडली कैसे हैं...। मैं हंसा - ओह। अच्छा तो है। वह बहुत खुश था कि सबके पिता उनकी अधिकांश बातों पर बिगडते रहते हैं पर उसके साथ ऐसा नहीं है। ...जारी

4 टिप्‍पणियां:

डा० अमर कुमार ने कहा…

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डॉ .अनुराग ने कहा…

हम सबके पिताओं में सब कुछ कितना कोमन होता है ओर कुछ कितना अलग ...

नीरज बसलियाल ने कहा…

भावपूर्ण है भाई. गैर जरुरी भावुकता से बचते हुए भी भावुक कर गए |

leena malhotra ने कहा…

पिता का सबसे बड़ा योगदान इस जीवन में यह है की वह हमें जीन देते है. बुद्धिजीवी व्यक्ति के जींस में होता बुद्धिजीवी होना . यह सच है कि उसके बाद पढ़ गूढ़ के हम विस्तार पा जाते हैं. लेकिन शुरुआत वहीँ से होती है. और यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि माता पिता के जाने के बाद ही हम उन्हें पूर्णत समझ पाते हैं. तब एक प्रक्रिया शुरू होती है जिसमे हम स्वयं को रूपांतरित होते हुए देखते है. माँ में पिता में. उनके रैक उनके जीवन काल में नहीं खंगाल पाते हम.यहीं चूक जाते है. लेकिन यही प्रकृति है. यही सत्य है. साभार.