रविवार, 22 मई 2011

प्रेमचंद - साहित्य केवल कहानी नहीं है

प्रेमचंद - साहित्य केवल कहानी नहीं है
जैनेन्द्र, बनारसीदास चतुर्वेदी, शिवपूजन सहायदि के साथ प्रेमचंद के पत्र-व्यवहार (प्रेमचंद:चिट्ठी-पत्री,संकलन-मदन गोपाल,अमृत राय,हंस प्रकाशन,इलाहाबाद) से गुजरते हुए स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद का लेखन ही नहीं उनका जीवन भी एक आदर्श उपस्थिति करता है। सरलता, न्यायप्रियता, दृढता, पूंजीपतियों के प्रति आक्रोश  स्त्रियों के प्रति सम्मान और बराबरी के उदाहरण यहां बारहा  मिलते हैं।
          सांप्रदायिकता और नास्तिकता पर उनका मत सुविचारित है। 1928 में बनारसीदास को लिखे अपने पत्र में वे लिखते हैं – ‘...अपने पत्र में एक भी चीज सांप्रदायिकता के समर्थन में नहीं छापी। इतना ही नहीं बहुत बार उसकी तीब्र आलोचना कर चुका हूं। ... सांप्रदायिकता एक ऐसा पाप है जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है।’
          इसी तरह 1933 में जैनेन्द्र को लिखे पत्र में इस्लाम का विषवृक्ष’ लिखने को लेकर चतुरसेन की आलोचना करते वे लिखते हैं –‘ ... इस चतुरसेन को क्या हो गया है ... इसकी आलोचना तुम लिखो ... इस कम्युनल प्रोपेगेंडा का जोरों से मुकाबला करना होगा और यह ऋषभ भले आदमी भी इन चालों से धन कमाना चाहता है।’ चतुरसेन को लेकर वे बनारसीदास को भी लिखते हैं – ‘... यह सांप्रदायिकता फैलाने की ... नीच कोशिश है और इसका पर्दाफाश  करना ही होगा। ... इसकी परवाह मत कीजिए कि हमलोग अल्पमत में हैं। हमारा लक्ष्य पवित्र है।’
          अल्पमत में अकेला चलने की चिंता ना कर अपने विचारों पर दृढता से टिके रहने की सीख हम प्रेमचंद से ले सकते हैं। आज के भेडिया धंसान माहौल में अपने उदघाटित-सुविचारित सच पर अडिग रहने में इस तरह प्रेमचंद हमारी मदद करते हैं।
          भले आदमी का जिस तरह का प्रयोग प्रेमचंद करते है वह अपने विरोधियों के प्रति उनके राग-द्वेष रहित व्यवहार को जाहिर करता है। कहीं भी विरोध करते हुए वे कुंठावषेशों की तरह उग्र नहीं होते बल्कि संवेदनशील दृढता का परिचय हर जगह देते हैं। ईश्वर पर जैनेन्द्र से अपने मत-वैभिन्य को वे जिस तरह रखते हैं, उससे भी इसकी पुष्टि होती है। वे लिखते हैं – ‘ईश्वर पर विश्वास नहीं आता। कैसे श्रद्धा होती? तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो। जा नहीं रहे पक्के भक्त बन रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूं।’ ईश्वर विरोध और नास्तिकता की ओर प्रेमचंद धीरे-धीरे बढते गए। 1930 में जैनेन्द्र को वे लिखते हैं- ‘पुत्र मुबारक। ईश्वर चिरायु करे। या यों कहूं, चिरायु हो। ’ यहां ईश्वर को लेकर उनके भीतर आ रहे बदलाव को हम महसूस कर सकते हैं। आगे 1933 और 1935 तक उनकी नास्तिकता दृढ होती जाती है। 1935 में वे बनारसीदास को लिखते हैं – ‘परलोक में मेरा विश्वास नहीं है इसलिए अध्यात्म का विचार जो यौवन का सबसे बडा घातक है , मेरे पास नहीं फटकता।’
          संवाद के लिए स्पेस प्रेमचंद हर जगह रखते हैं। ज्ञान का आतंक वे कहीं नहीं पैदा करते। किसी विशेष पर अपने अज्ञान को भी वे सहजता से सामने रख देते हैं और इस पर कुंठित भी नहीं होते। कई जगह खुद को अज्ञानी बता इसकी आड में अपने मन की बात रख देते हैं।  तुलसी जयंती की अध्यक्षता से इनकार करते बनारसीदास को लिखे गए उनके पत्र के अंश इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं –‘ मैं इस काम के लिए सबसे कम योग्य व्यक्ति हूं। एक ऐसे उत्सव की अध्यक्षता करना जिसमें मैंने कभी कोई रूचि नहीं ली, हास्यास्पद बात है। ... सच बात तो यह है कि मैंने रामायण भी आदि से अंत तक नहीं पढी है। यह एक लज्जाजनक स्वीकारोक्ति है, मगर बात ठीक है।’
          यहां स्पष्ट है कि तुलसी में प्रेमचंद की रूचि नहीं इसलिये वे मात्र वाहवाही के लिए अध्यक्षता करने से इनकार करते हैं । अरूचि का करण भी उनके अगले पत्र से स्पष्ट हो जाता है। अतिमानवीयता व किसी को ईश्वर बनाए जाने के प्रेमचंद विरोधी हैं , इसी करण वे तुलसी जयंती से खुद को अलगाते लिखते हैं – ‘लेकिन एक ऐसे व्यक्ति का तुलसी जयंती में सभापतित्व करना, जिसने कभी उन्हें पढा नहीं और जो उनके संबंध में कही जानेवाली अतिमानवी बातों में विश्वास नहीं करता, हास्यास्पद है। उन्होंने राम और हनुमान को देखा और वह बंदरवाली घटना, सब खुराफात। मगर क्या तुलसीभक्त लोग मेरी काफिरों जैसी बातें पसंद करेंगे... इससे क्या फर्क पडता है कि वह विक्रम संवत् दस में पैदा हुए या बीस में या चालीस में...। क्यों अपनी बुद्धि खामखाह इसके पीछे बर्बाद करो। जबकि और भी न जाने कितनी चीजें करने को पडी हैं। वह एक महान कवि थे, उनकी व्याख्या करो, दार्शनिक व्याख्या, मनोवैज्ञानिक व्याख्या, प्राणिशास्त्रीय व्याख्या, शरीरशास्त्रीय व्याख्या, जो चाहे करो, मगर ईश्वर काहे बनाते हो।’
          पत्र का यह अंश प्रेमचंद के वाग्विलास विरोध, वैज्ञानिकता, महानतम को भी अपनी कसौटी पर कसने की दृढ ईच्छाशक्ति, नास्तिकता आदि को स्पष्ट जाहिर करता है।
          इन पत्रों से प्रेमचंद का स्पष्ट आलोचकीय व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है। अपने पक्ष को वे हमेशा दृढता से सामने रखते हैं पर वह दृढता बहुत संवेदनशील होती है, उसमें अहमन्यता का लेश मात्र नहीं रहता।  परख को लेकर जैनेन्द्र से उनका पत्र-व्यवहार इसका उदाहरण है। अपने उपन्यास परख पर प्रेमचंद की आलोचना को जब जैनेन्द्र चलताउ लिखते हैं तो साफ शब्दों  में प्रेमचंद लिखते हैं- ‘परख की आलोचना जल्दी में नहीं की। लेकिन अपनी दानिस्त में मुझे जो कुछ कहना चाहिए था वह कह चुका। मैं समालोचक बहुत खराब हूं। पुस्तक पर पाठक की दृष्टि से निगाह डालता हूं। और जो भाव जम जाता है वही लिखता हूं।’
          अखिर जैनेन्द्र को प्रेमचंद की इस स्पष्टवादिता का कायल होना पडता है। अगले पत्र में वे लिखते हैं – ‘परख की आपकी आलोचना से मैं असहमत हूं सो बात नहीं।... अब सचमुच लगता है कि वह अयथार्थ मोह था और मेरी कमी थी।’
          किसी की बेजा प्रशंसा प्रेमचंद कर नहीं पाते थे  फिर उन्हें लगता कि कहीं उन्हीं में तो कमी नहीं है – ‘शायद मुझमें भावशून्यता का दोष हो। दरअसल हर नये लेखक की तरह जैनेन्द्र अग्रज लेखक से अपनी विस्तृत आलोचना चाहते हैं, पर प्रेमचंद इसे शालीनता से टाल जाते हैं - मुझे आलोचना करनी नहीं आती।’
          अपने समय में आलोचना के ट्रेंड को लेकर प्रेमचंद दुखी रहते थे- ‘आजकल हिन्दी में अजीब धांधली है। जिसकी पुस्तक की बुरी आलोचना कर दो वह लडने को तैयार हो जाता है।’
          नतीजा प्रेमचंद अपने गुस्से को अपनी ही ओर मोड देते हैं – ‘... इरादा किया है कि ... आलोचना करना ही छोड दूं।’
          प्रेमचंद के समय की यह धांधली आज हमारे समय में कैसी विकृत हो गयी है, वह सामने है, आलोचना का ही नाश हो गया है, बस लल्लो चप्पो रह गयी है।
          साफ दिल से की गयी आलोचना को प्रेमचंद हमेशा स्वीकारते थे पर नियत पर शक किया जाना उन्हें बर्दाश्त नहीं था। वे इस बात से परेशान रहते थे कि रचनाकारों में विचारों की उदारता और सौहार्द का भाव नहीं है। न्यायबुद्धि पर आधारित सहानुभूतिपूर्ण आलोचना की हमेशा कद्र करते थे।
          बनारसीदास को जब जयशंकर प्रसाद का उपन्यास ‘कंकाल’ पसंद नहीं आया तो इस पर खेद जताते प्रेमचंद लिखते हैं – ‘‘कंकाल’ में मुझे सच्चा आनंद मिला। और मैं पुस्तक से भी अधिक आदमी का प्रशंसक हूं। वह बहुत खुले हुए और स्पष्टवादी आदमी हैं।’
          हिन्दी लेखकों की धांधली के साथ पाठकों का उथला और आलोचना बुद्धि से रहित होना भी उन्हें परेशान करता था। आज के लेखकों की तरह प्रेमचंद साहित्य को खानों में बांट कर उस पर बात नहीं करते थे। तमाम विधाओं को बांट कर सुविधा के अनुसार उसकी आलोचना करना उन्हें पसंद नहीं था। बनारसीदास को 1933 में लिखे पत्र में वे लिखते हैं- ‘साहित्य केवल कहानी नहीं है। उसमें नाटक है, कविता है, आलोचना है, कहानी है, उपन्यास है, निबंध है।’ मजेदार बात है कि 1933 तक उनकी निगाह से गुजरी आलोचना में उन्हें माधुरी में ‘उमर खय्याम’ और ‘कालिदास’ पर लिखी आलोचनाएं सर्वश्रेष्ठ लगी थीं। यहां यह देखना महत्वपूर्ण है कि खुद ‘हंस’ का संपादक होते हुए महत्वपूर्ण आलोचना उन्हें ‘माधुरी’ में दिखती है और कहानीकार होते हुए वे कविता पर लिखी आलोचनाओं के कायल होते हैं।
          यूं हिन्दी कविता की स्थिति से वे संतुष्ट नहीं थे उसके मुकाबिल वे उर्दू में ज्यादा संभावनाएं देखते थे –‘ हिन्दी कविता अब भी व्यक्तिवादी और निरी भावुकतापूर्ण होती है। उसमें जिंदगी की हरकत नहीं है। वह जिंदगी को उजागर नहीं करती। ... मैं समझ नहीं पाता कि क्यों हमारे सब कवि निराशा के दर्शन से इस तरह अभिभूत हैं। उर्दू कवि दार्शनिक है। यथार्थवादी है औार आशावादी हैं।’ कम्यूनिश्ट होने को वे कवि के गुण की तरह देखते हैं। बनारसीदास को 1936 में लिखे पत्र में वे लिखते हैं – ‘मुस्लिम कवि कम्युनिष्ट होता है, यहाँ तक कि इकबाल भी।’
          रचना में वे विचारों की बजाय अभिव्यक्ति की क्षमता और सृजनषीलता को महत्व देते थे। इसी आधार पर वे नाटककार भुवनेश्वर में ‘आस्कर वाइल्ड’ और ‘शा’ का रंग देखते हुए उनकी प्रतिभा संपन्नता के कायल होते हैं , हालांकि उनके आलस्य, सिगरेट की आदत और इश्कबाजी को लेकर अपनी परेशानी भी प्रकट करते हैं। अपने विचारों को किसी पर थोपा जाना प्रेमचंद को पसंद नहीं। सामनेवाले  को संकट में पडा देख अक्सर वे अपने में आलोचना बुद्धि का अभाव कहकर उसे संतुष्ट करने की कोशिश करते थे, पर अपने विचार वे बदलते नहीं थे, ना ही उसे पत्थर की लकीर  घोषित करते थे – ‘जिनमें आज सबसे अधिक संभावनाएं दिखायी पडती हैं। हो सकता है कि वे बिल्कुल बोदे साबित हों और जो बोदे नजर आते हैं वे चमक उठें।’
          किसी को दलित जाति को जान उससे घृणा करना यदि ब्राहमणवाद है तो किसी को ब्राहमण जान हिकारत प्रकट करना भी ब्राहमणवाद ही है। खुद को ब्राहमण वर्ग का द्रोही कहे जाने के खिलाफ बनारसीदास को लिखा उनके पत्र के अंश देखें – ‘... मैं ब्राहमण वर्ग का द्रोही हूं सिर्फ इसलिए कि मैंने इन पुजारियों और महंतों और धार्मिक लुच्चे-लफंगों के कुछ पाखंडों का मजाक उडाया है। ...उनको ब्रहमण कहकर वे अच्छे भले ब्राहमणों का कितना अपमान करता है। .... पाखंड और कट्टरता  और सीधे सादे हिन्दू समाज के अंधविश्वास का फायदा उठाना इन पुजारियों और पंडों का धंधा है और इसलिए मैं उन्हें हिन्दी समाज का एक अभिशाप  समझता हूं।’
          हंस को प्रेमचंद घाटा सहकर भी निकालते रहे। वे आशावादी थे और सपना देखते थे कि हंस कुछ चल जाए तो एक संपादक रख लें और खुद मात्र एडिटोरियल लिखें। पर यह सपना कभी पूरा होगा या नहीं, इसकी वे चिंता नहीं करते थे, उनके अनुसार –‘ ... जीवन ही एक लंबा घाटा है।’
          जैनेन्द्र को 1933 में वे लिखते हैं –‘ खर्च पांच सौ रूपये महीने का आमदनी कुल चार सौ रूपये से ज्यादा नहीं। ... हंस में दम नहीं है, पर फिर भी हीदों में शामिल होना चाहता हूं । ... जी तो चाहता है कि हंस का दाम बढाकर पांच रूपये कर दूं और एक सौ पृष्ठों का निकालूं और तुम उसका संपादन करो... लेकिन शायद मेरी कामनाएं सब यों ही रह जाएंगी।’
          हंस और जागरण के घाटे की इस मार का ही असर था कि जब ‘सेवासदन’ पर फिल्म बनने लगी और उन्हें 750 रूपये मिले तो उन्होंने इसे एक खुशखबरी की तरह लिया। आगे 8000 सालाना के एक मुंबईया फिल्मी कांटैक्ट पर प्रेमचंद मजबूरी में ही मुंबई गये। 1938 में हंस के आफिस से उन्होंने जैनेन्द्र को लिखा – ‘... मेरे लिए हां के सिवा कोई उपाय नहीं रह गया है ... साल भर रहने के बाद कुछ ऐसा कांट्रैक्ट कर लूंगा कि मैं यही बैठे-बैठे तीन-चार कहानियां लिख दिया करूं और चार-पांच हजार रूपये मिल जाया करें। उससे जागरण और हंस मजे दोनों मजे में चलेंगे...। ’
          स्पष्ट है कि जागरण और हंस चलाने की मजबूरी में ही प्रेमचंद मुंबई गये थे। इस पत्र के सप्ताह भर बाद दूसरे पत्र में भी प्रेमचंद जैनेन्द्र से सलाह मांगते हैं कि जाएं कि ना जाएं। प्रसाद जी जाने से मना कर रहे थे पर चिरसंगिनी दरिद्रता कह रही थी कि चलो। जीवन का यह भी एक अनुभव है।
          इस पत्र के दो माह बाद ही 15 जून 1934 को प्रेमचंद जो पत्र जैनेन्द्र को लिखते हैं उसमें प्रसाद की सलाह के मानी निकलते दिखते हैं –‘ एक को आ गया ... यहां दुनिया दूसरी है, यहां की कसौटी दूसरी है।... सालभर किसी तरह काटूंगा, आगे देखी जाएगी।’
          आगे वे जैनेन्द्र को कोई स्टोरी या प्लाट फिल्म के लिए लिखने की सलाह देते हैं- ‘... बहुत से सडियल  लोगों की चीजें निकलती हैं तो फिर तुम्हारी क्यों न निकलेंगी ...। ’
          प्रेमचंद कितना सही समझ रहे थे फिल्मी दुनिया को, आज तक सडियल चीजें ही वहां खप रही हैं। आगे अगस्त 1934 को प्रेमचंद लिखते हैं –‘ सिनेमा के लिए कहानियां लिखना मुश्किल हो रहा है, लेकिन जरूरत ऐसी कहानियों की है जो खेली भी जा सकें, जो एक्टरों के लिए सुलभ हों। कितनी भी अच्छी कहानी हो अगर योग्य पात्र ना मिले तो वह कौन खेलेगा। अद्भुत की जरूरत मैं नहीं समझता। मेरी दोनों कहानियां सांधारण हैं।’
          साफ है कि फिल्में एक्टर की क्षमता पर तय होंगी कहानी पर नहीं। प्रेमचंद की निगाह में स्तरीय कहानियों पर एक्टिंग की क्षमतावाले एक्टर नहीं हैं। आगे अपनी फिल्मी पारी से प्रेमचंद उबने लगे – ‘मैं तो जैसे (अपाहिज) हो गया हूं। हंस के लिए एक चीज भी लिखना मुश्किल है।’
          मुंबई आकर भी हंस की चिंता – ‘मैं जिन इरादों से आया था , उनमें एक भी पूरे होते नजर नहीं आते। ... वल्गैरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं। ... मैंनें सामाजिक कहानियां लिखीं हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे ...। ’ स्पष्ट है कि प्रेमचंद मुंबई अपने तय इरादों के साथ गए थे और जब वे पूरे नहीं हुए तो वापिस लौट गए। यहाँ लीलाधर मंडलोई की एक कविता याद आ रही है – ‘हर में नहीं मिली जब / सोगहक नरम मूली / बथुआ साग / पापड / और चूल्हे से उतरते फुल्के // गांव से आए पिता / लौट गए / बाजार ऐसा न था कि रोक सके।’ तो मुंबई का बाजार भी ऐसा नहीं था जो प्रेमचंद को रोक सके।
          एक जून को मुंबई आए प्रेमचंद 28 नवंबर को जैनेन्द्र को लिखते हैं – ‘यह साल पूरा करना है ही। कर्जदार हो गया था। कर्जा पटा दूंगा। ... यहां से छुट्टी पाकर पुराने अड्डे पर जा बैठूं। वहां धन नहीं है मगर संतोश अवश्य है। यहां तो जान पडता है जीवन नष्ट कर रहा हूं।’
          आगे फरवरी में वे लिखते हैं –‘ ... मैं जनरूचि को जानता हूं, इसके विरूद्ध डाइरेक्टर जोर से कहता है, आप नहीं जानते। मैं जानता हूं, जनता क्या चाहती है .... इसका जवाब यही है ... अच्छा साहब हमारा सलाम लीजिए। हम घर जाते हैं। वही मैं कर रहा हूं। मई के अंत में काशी में बंदा उपन्यास लिख रहा होगा। ...फिल्म में मेरे मन को संतोष नहीं मिला। संतोष डाइरेक्टरों को भी नहीं मिलता, लेकिन वे और कुछ नहीं कर सकते, झख मारकर पडे हुए हैं। मैं और कुछ कर सकता हूं ...। ’ जनता क्या चाहती है, यह बहस मात्र फिल्मी डाइरेक्टरों और पटकथा लेखकों के बीच सीमित नहीं है, साहित्य में भी यही हाल है। जैनेन्द्र को एक जगह प्रेमचंद लिखते हैं –‘ जैसी तुम्हारी राय है वैसी ही मेरी भी राय है। लेकिन जनता की राय शायद ऐसी नहीं । वह तो चित्र चाहती है।’  तो इस जनता की राय को भी बदलना पडता है, उसे शिक्षित करना होता है और यह डाइरेक्टरों की तरह झख मारकर पडे रहने से नहीं होता। प्रेमचंद की तरह  और कुछ कर सकने के जज्बे से होता है, तभी तो आज हम छाती ठोककर कह सकते हैं , जनता प्रेमचंद का साहित्य चाहती है, वह उन्हें पढती है और यह कुब्बत उन्होंने तुलसीदास के ईश्वरवादी ढांचे से लडकर प्राप्त की है। पूंजी के आकर्षण से जूझकर प्राप्त की।

      1935 में बनारसीदास को वे लिखते हैं –‘ मैं ऐसे महान आदमी की कल्पना नहीं कर सकता जो धन-संपत्ति में डूबा हुआ हो ... हो सकता है कि बैंक में अच्छी रकम रखकर मैं भी औरों जैसा ही हो जाता ... लेकिन मैं खुश हूं कि प्रकृति और भाग्य ने ... गरीबों के साथ डाल दिया है। इससे मुझे मानसिक शांति मिलती है।’

      वॉन गॉग लिखते हैं – ‘हर आत्मा के भीतर थोडा-बहुत पागलपन शामिल होता है।’ प्रेमचंद इसे इस तरह लिखते हैं – ‘मैंने सपने देखना बंद नहीं किया है और थोडा-बहुत जल्दबाज भी हूं। बिना सोचे-बिचारे कुछ कर बैठता हूं। ... पागलपन का भी बडा हिस्सा मेरे पल्ले पडा है।’

      अज्ञेय केा लेकर एक बहस आजकल चल रही है। इन पत्रों में अज्ञेय की चर्चा कई जगह है। अपने समय के संभावनाशील रचनाकारों में प्रेमचंद अज्ञेय को सबसे उपर गिनते थे। वे लिखते हैं – ‘अज्ञेय की यह कहानी बहुत अच्छी थी। उनकी कविताओं के विषय में यहां यह राय है कि भाव तो उत्कृष्ट हैं, पर हाथ मंजा हुआ नहीं है... उनकी कहानियां और गद्यकाव्य बढकर हैं।’

      हिन्दी लेखकों की प्रवृति और मठाधीशों की चर्चा भी प्रेमचंद जब-तब करते हैं। जैनेन्द्र को 1935 में वे लिखते हैं – ‘सभी सम्राट हैं कोई कवि सम्राट , कोई आलोचना ... यह गौरव तो काशी ही को है कि वहां सभी सम्राट मौजूद हैं ... कहीं तुम भी साल छः महीने में सम्राट हो जाओ तो मेरा काम ही तमाम हो जाए।’ इसी तरह 1936 में वे बनारसीदास को लिखते हैं –‘ ... आप तो हिन्दी लेखकों की प्रवृत्ति जानते हैं। जिन-जिनको आप छोडेंगे उन सबकी तरफ से चैमुख हमले को बर्दाश्त करने के लिए आपको तैयार रहना चाहिए। निर्दोष से निर्दोष बात की भी व्याख्या इस तरह की जा सकती है कि उसमें शरारत भरी हुई मालूम हो।’ यह सब आज भी वैसा ही चल रहा है।

      पत्रकारिता के नाम पर जो हो-हल्लाबाज किस्म के घटियापे को प्रेमचंद ने कभी बर्दाश्त नहीं किया। इस संदर्भ में शिवपूजन सहाय की चुप्पी पर उनकी अच्छी खबर लेते वे लिखते हैं –‘ यों तो मतवाला में माधुरी पर नित्य दो-चार छींटे उडा दिए जाते हैं पर अब की होली अंक में तो उसने सुरूचि और सभ्यता का अंत ही कर दिया। आपके होते यह अनर्थ हो इसका मुझे दुख है। ... चुहल साहित्यिक मनोरंजन की सीमा से निकल कर द्वेष की हद तक पहुंच जाती है ...। मतवाला को क्यों लगातार एक फेयर सेक्स पर ऐसे अश्लील आक्रमण का साहस होता है। क्या उसमें महिला-सम्मान बिल्कुल नहीं रहा।’

      स्त्रियों को लेकर प्रेमचंद का यह नजरिया उनके कई पत्रों से जाहिर होता है। जैनेन्द्र को लिखे पत्र में पत्नी के लिए वे ‘पत्नी जी’ का संबोधन प्रयोग करते हैं। बनारसीदास को एक जगह वे लिखते हैं – ‘आपकी समालोचना पाकर ‘श्रीमती प्रेमचंद’ को बहुत ही खुशी होगी। ... कुछ अक्लमंदों का यह ख्याल है कि मैं ही उन कहानयिों का असल लेखक हूं। ... मेरे जैसा शांत स्वभाव का व्यक्ति इस प्रकार के भीषण नारी-परक कथानकों की कल्पना भी नहीं कर सकता।’

      स्त्री के प्रति न्यायपूर्ण नजरिया का मतलब यह नहीं था कि आधुनिक विमर्शकारों की तरह वे उनकी खामियों पर उंगली ही ना रखें। जैनेन्द्र के एक स्त्री पात्र की आलोचना करते वे लिखते हैं –‘ ... समय काटने का यह रोग ... नयी रोशनी की देवियों को है। जिनके लिए जीवन में रात-दिन कुछ न कुछ कंपन और सनसनी चाहिए। जो क्षण भर भी घर में नहीं बैठ सकतीं।’

      इसका यह मतलब नहीं कि वे स्त्री को घर में बिठाने की वकालत कर रहे थे, इस पत्र के साल भर बाद ही जैनेन्द्र के उपन्यास ‘सुनीता’ के एक पात्र की चर्चा करते वे लिखते हैं – ‘नारी केवल गृहणी क्यों हो .... अगर उसमें गृहणीत्व से आगे बढने की सामथ्र्य हो तो वह क्यों न आगे बढे।’

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