कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

अब पिता हैं कि मानते नहीं मुझे

पिछली 18 अप्रैल को पिता का देहांत हो गया। हालांकि घर में सब को लगा रहा है कि वे कहीं गये हैं और कभी भी लौट आएंगे....

पिता
अपनी छोटी गुदाज हथेली में
पिता की अंगुलियां थामे चल रहा था मैं
दूर सामने बहती नदी तक जाना था मुझे
नन्हें पांव थकने लगे थे रोने लगा था मैं
बिठा लिया था पिता ने तब कंधे पर अपने
बालों से उनके खेलने लगा था मैं निकटाने लगी थी नदी
पर सूरज उपर कसा जा रहा था
रोने लगा था मैं दुबारे
उतार दिया पिता ने तब चिलचिलाती रेत पर
बिल-बिलाकर चिपक गया था मैं बाहों में उनकी

फिर पास आ गयी थी नदी
भीगी रेत पर घरौंदे बनाए थे मैंने
चिल्ला-चिल्लाकर बुलाया था पिता को
आओ देखो यह घल मेला अपना घल
पर पिता से पहले आ गयी थी एक लहर
रूंआसा हो गया था मैं भयभीत भी
कि मेरा घर बहा ले जाने वाली यह लहर
मुझे तो नहीं ले जाएगी बहा कर....

अब कह रहे थे पिता
चलो तैरना सिखला दूं तुम्हें रोने लगा था मैं
पर कितने कठोर थे पिता
दुःसाध्य था कितना
इतिहास की सुरंगों से
वर्तमान के काल-खंडों तक
संचित
ज्ञान उनका

तब
ममत्व की बाहों से उठा
ले आए थे पिता
नदी की धारा में
धीरे से छुलाया था
सतह की नदी से
बोले मारो हाथ-पांव मारो
चीखें मारने लगा था मैं
और टप से छोड दिया था पिता ने
धारा में मुझे
बहता हाथ-पांव चलाता
डूबने लगा था मैं
समाने लगी थी नदी
मेरी आंखों में बाहों में रगों में
थोडा-थोडा होष
खोने लगा था मैं

आंखें खुलीं तो टंगा था मैं बांहों में पिता की
सोचा था कितनी लंबी हैं बाहें पिता की
लहरों से भी लंबी

क्या मैं नहीं हो सकता पिता की तरह
किनारों को छोड धारा में बना नहीं सकता घर
और कूद गया था मैं
बाहों के बल नदी में
आंखें खुली थीं भाग रहा था धारा में मैं
मछलियों के आगे-पीछे
देखता छू-छूकर तल में फैली कौडियां-सीपी-सिवार
बचता मगरों घडियालों के जबडे से
थकने लगता
तो लहरों से भी लंबी पिता की बाहें
थाम लेती थीं मुझे

आज हो चुका हूं कद्दावर पूरा
छूने लगे हैं नदी का तल मेरे पांव
और हाथ सहला रहे हैं चेहरा सूरज का

अब पिता हैं कि मानते नहीं मुझे
कहते हैं वहीं तक जाओ
लौट सको सुरक्षित जहां से मेरी बाहों में

पर तुम्हारा यह पवित्र मोह
हमारे अंतर के भविश्योन्मुख उर्जस्वित आवेग को
बांध सकेगा पिता
खुद बंध सके थे तुम ........


१९८८  में पिता द्वारा छपवाए  गए  कविता  संकलन  सभ्यता  और  जीवन  से 

2 टिप्‍पणियां:

Raj ने कहा…

इन आँखों से दिन-रात बरसात होगी
अगर ज़िंदगी सर्फ़-ए-जज़्बात[1] होगी
चराग़ों को आँखों में महफूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
अज़ल-ता-अब्द[2] तक सफ़र ही सफ़र है
कहीं सुबह होगी कहीं रात होगी
1.भावनाओं में ख़र्च,2.आदि से अंत

mridula pradhan ने कहा…

atyant bhawpurn......