कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 21 मार्च 2011

नन्हीं सी मासूम बिटिया - कर्मेंदु शिशिर

शिशिर जी हिन्‍दी के सजग,श्रमशील रचनाकारों में हैं, उनकी कहानियों, उपन्‍यास और संपादित पुस्‍तकों की बाबत हमसब जानते हैं, पर उनकी कुछ कविताएं भी हैं , वे छपी भी हैं जहां-तहां जब-तब, पर गद्यकार की छवि के चलते वे हमारी याददाश्‍त में नहीं रहतीं, साल भर पहले जब उनसे मिला था तो उन्‍होंने अपना एक संकलन सा कविताओं का दिया था इस बार उसे उलट-पलट रहा था तो यह कविता अच्‍छी लगी। इस बार भी उनसे भेंट हुयी तो साथ किशन कालजयी भी थे। तब शिशिर जी की नन्‍हीं प्‍यारी नातिन परदे के पीछे से झांक-झांक जा रही थी....

नन्हीं सी मासूम बिटिया
इतनी नन्हीं सी
कि तारीखों की सीढियों तक नहीं पहुंची

हाल के जन्में
खरगोश की तरह
उसका कोमल शरीर
जल-सी निर्दोष आँखें
पहचान की रोशनी तलाशती
टटोलती उतर आती है भीतर
मेरे-बहुत भीतर
कनछियों सी निकली
हलचल भरे पॉंव
जैसे धीरे-धीरे दिशाओं में फैलते पंख.....