रविवार, 27 फ़रवरी 2011

कंस द्रोह से राष्ट्र द्रोह तक

ओ धनबाबाओ ओ धननेताओ 

पाई पाई का हिसाब तो
दे दोगे तुम
ओ धनबाबाओ ओ धननेताओ
पर यह जो तुम्हारी लिप्सा है बेहिसाब
उसकी भरपाई कौन करेगा

काला धन हो
या कोढिया सफ़ेद धन
जिस पे तुम इतना बन बन करते फिरते हो
उसके क्या माणि हैं हम निर्धन जनके लिए
तुम जो तोंद फुलाते गाल बजाते
बन जाते हो राष्ट्र
(तुम्हारे इस राष्ट्र पे तो कब का थूक चुका है पंजाबी का वह कवि)
और हम रह जाते हैं बस द्रोही ,दास,शूद्र
हमारे द्रोह की तो परंपरा ही बना डाली है तूने
विष्णु द्रोह ,शिव द्रोह,राम द्रोह,इन्द्र द्रोह
कंस द्रोह से राष्ट्र द्रोह तक

ओ जनद्रोहियो ओ दमन सत्ता के चारणों भाटों
पहले भी तुम दान करके अपने पण्य को पुण्य में
बदलते रहते थे
जैसे की अभी काले को सफ़ेद करते रहते हो

वैसे तो समझदारों का गीत भी गा सकते हो तुम
रच सकते हो कबित्त
हमारी ही तर्ज पर
यूँ तो तुम्हारा एक कवि भी लिख गया है पेट की आग की बाबत
दे गया है चेतावनी कि यह आग ना चढ़े दिमाग पे

यूँ तो जनरलों
बहुत मजबूत हैं तुम्हारे टैंक
पर उसके नुक्स भी बता गया है एक कवि
इसलिय भले लोगों, नेरुदा के कथनों पे विचार करो
बरना आगे जमीन सख्त है और आग  जंगल की  ...
जिसमे  वही खुशबू है ,वही हवा है
जिसे हमारा जनकवि खोजता फिरता है ...

 

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