कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

कुंठावशेषजी और ढोलकिया - व्‍यंग्‍य कथा

कुंठावशेष जी औसत नहीं अपवादी भारतीय चरित्र हैं। अक्‍सरहां गांवों में एकाध ऐसे चरित्र पाए जाते हैं जो अपनी भूमिका घर के आंगन में औरतों से बतकुच्‍चन तक सीमित रखते हैं। दिल्‍ली जैसे महानगर में आकर वह चरित्र कैसा रूख अख्तियार कर लेता है , यह आप इस कथा को पढकर समझ सकते हैं।

कथा लिखने के बाद आदतन मैंने इसे अपने साथी रचनाकारों पंकज, उमा, रोहित, अजय, प्रेमा, राजू जी, चेतन, विनोद, धर्मेंद्र,वीरेंद्र,सुधीर आदि को पढाया। उनकी राय उत्‍साहवर्धक पाकर उनकी सलाह के हिसाब से आंशिक परिवर्तन भी किये।

कुंठावशेषजी चालीस पार कर गये पर हाड में हरदी नहीं लगी, सो जटा जूट रंगे निमोछिया लरजते चलते हैं। लडकी घुमाने की उमर रही नहीं सो पटाने में भिडे रहते हैं। अब दिल्‍ली है , तो यहां घोडों को भी लडकी पट जाती है, गदहों को तो वे सेवक सूची में उपर रखती ही हैं। सो इन्‍हें क्‍यों ना पटे,पर इनकी किसी से देर तक पटती ही नहीं।
सभा गोष्ठियों में अगर भूले से कोई लडकी आ ही जाए तो कुंठावशेषजी उस पर अपना एकाधिकार समझते हैं। समझें क्‍यों नहीं कुंवारे हैं सो हैं अपनी नजर में करारे भी हैं। सो गोष्‍ठी के बाद गप्‍प के दौर में लडकी के मुकाबिल बस ये ही खडे रहते हैं।
फिर जो स्‍त्री विमर्श शुरू होगा तो अंत तक अंत होने को नहीं आएगा। अब स्‍त्री विमर्श तो स्‍त्री से ही होगा ना। विमर्श में उनकी तेजी तब देखने में आती है जब अंत में चाय वाले को पैसा देने की बारी आती है,इनकी जेब का खडकता सौ का पत्‍ता अकबका कर खुद बाहर आ जाता है। फिर क्‍या मजाल कि कोई और पैसे दे दे। नहीं साहब, मैं हूं ना।
हालांकि उनकी इस आदत का खमियाजा भी उन्‍हें ही भुगतना होता है। यूं तो मिलती नहीं, पर सचमुच की मिल ही जाए तो उनकी इस सामंती अदा पर वह यू टर्न ले लेती है।
तो एक गोष्‍ठी चल रही थी कि बीच में ही उनका फोन आया कि स्‍कूटी जाम में फंस गयी है,बस पहुंचनेवाला हूं। सब की बांछे खिल गयीं , खबर सुनकर। कि पटठे ने फिर कोई तीर मारा है, अब तीर जिगर के पार ना हो तो पार्टी दी जाए।
चर्चा चल ही रही थी कि सुरमई रंग की स्‍कूटी आती दिखी। उसके पीछे अपने अवशेषजी नमूदार दिखे। स्‍कूटी छोटी और हल्‍की सवारी है सो अवशेषजी को उतरते समय लडकी की कमर पर बल देना पडा।,अब संतुलन भी तो साधना है। और इसमें अवशेष जी का क्‍या मुकाबला...।
आते ही किसी ने टहोका - भई,आप तो आधे घंटे देर से आ रहे।
अपनी कटाह जबान में तुरत उन्‍होंने रपेटा - झूटठा कहीं का। दस मिनट तो हुए हैं।
लोगों ने कहा - हां हां, फिर जाम भी तो था और इस पर यह नाजुक सवारी।
...उन्‍होंने आंखें तरेरीं, पर तब तक स्‍कूटी शब्‍द आ चुका था। सो उन्‍होंने अपना उबाल वापिस घुसेड लिया।
झूटठा,भयंकर और खत्‍तम, ये तीन पेटेंट शब्‍द हैं उनके। अब कोई खाना खिला रही हो और पूछे कि मुर्गा कैसा बना है..
तो बाली की तरह शब्‍दों को कांख में दबा कर वे बोलेंगे - भयंकर है भाभी...ओह क्‍या स्‍वाद है...।
ऐसा तो कभी चखा नहीं। अगर वे गुस्‍से में हों तो बिना आगा पीछा देखे लगेंगे आपको विष्‍ठा खिलाने।
...अरे आप जैसे लोग,मिले तो पा.ना भी खा लें।
यूं दिल्‍ली की देशी जबान भी माशअल्‍लाह कम नहीं। मां और बहन के भौंरों की संख्‍यां यहां कुछ ज्‍यादा ही है। हर दूसरा आदमी सामने वाले को मां बहन का भौंरा पुकारता नजर आता है। यूं साथियों का सोच है कि अवशेषजी की यह शब्‍दावली उनके निजी ललित विमर्श की देन है।
हां तो गोष्‍ठी खत्‍म हुयी तो फिर वही सीन दुहराया गया। पहले लडकी ने स्‍कूटी स्‍टार्ट की फिर उसकी कमर पर बाहुद्वय टिका कर अवशेष जी रवाना हुए। दिल्‍ली में, ब्‍वायफ्रेंड के कान से मुंह लगाए,वक्षों के दबाव से बाइकचालक के जोश और होश का संतुलन बिठाते या बिगाडते जोडे अक्‍सर मिल जाएंगे आपको पर यह कमरटेक जोडी तो दूसरी नहीं।
पर हाय री नियति , अवशेष जी पर के साथ जो गुजरा उसे करूण धवल जी की पंक्तियां ही कुछ कुछ बयां कर पाती हैं - ...हाय री किस्‍मत,जिस कागा को भी कासिद बनाया,वही कंकाल पर जा बैठा।
पता चला लडकी का पहले से प्रेम प्रसंग जारी है। सबने सोचा - पटठा ऐसे ही कमरिया पर बल देता रहा तो गडिया चल निकलेगी। और अवशेष जी तो इस कला के निष्‍णात ठहरे। उनकी पहली ही कहानी में जो ललित विमर्श है , कि क्‍या कहने...।
अब लडकी को पत्रकारिता सीखनी थी,पैसेवाली थी ही तो स्‍कूटी घूमने लगी। अब सभा सोसायटी छूट भी जाए पर सडक नापना नहीं छूटना चाहिए,रिपोर्टिंग जो करनी है।
इस बीच श्रीराम सेंटर में एक नाटक होना था। नाटकों में मेरी रूचि नहीं पर अग्रज अनुज मित्रों के नाटक होने पर जाता ही हूं, और देखता हूं तो लिखता भी हूं, रिपोर्टर वाली आदत तो छूटने से रही।
नाटक चल ही रहा था कि बीच में ही अवशेषजी का फोन आया। साइलेंट मोड पर कान से सटा कर सुनने की कोशिश की। मेरे लिये निर्देश था कि नाटक अंत तक देख लूं। वह तो मैं देख ही रहा था... मेरी समझ में कुछ आया नहीं।
नाटक के बाद जब हमलोग बाहर चाय की दुकान पर मजमा लगाए थे तो अवशेष की स्‍कूटी आकर रूकी। समय से पहूंच ना पाने पर अफसोसियाते हुए अवशेष जी ने बाय बाय किया और चले गये।
घर आकर मैंने नाटक पर लिखा अपने ब्‍लाग के लिये और खाना आदि खाकर टहल रहा था कि एक अनजाना फोन टपका।
हलो
जी सर,मैं दुंदभी बोल रही हूं।
दुंदभी... अच्‍छा, अवशेष जी की...
हां
बताइए
सर आपने नाटक पर बहुत अच्‍छा लिखा है।
हां...अभी तो पोस्‍ट किया है , आपने पढ भी लिया।
हां,आपकी पोस्‍ट का ही इंतजार था।
मैं कुछ समझा नहीं।
सप्‍ताह भर बाद फिर दुंदभी का फोन आया।
जी सर, आपने वह नाटक देखा है
कौन
हिडिंबा...
नहीं, मैं नाटक कम देखता हूं।
चलिए कोई बात नहीं..आगे कोई नाटक देखिएगा तो बताइएगा।
अगले सप्‍ताह जब अवशेष जी से मुलाकात हुयी तो इस नाटक प्रकरण का भेद खुला। दुंदभी ने ब्‍लाग पर मेरा आलेख पढ अपने अखबार में रपट लिखी थी। मुझे हंसी आयी। तो इस तरह चल रही है पत्रकारिता की ट्रेनिंग। अच्‍छा है , अच्‍छा है ..सोचा मैंने।
ट्रेनिंग चल ही रही थी कि एक दिन अवशेष जी का फोन आया। परेशानहाल थे वे, बताया कि, भैया कुछ करना होगा।
क्‍या हुआ...
दुंदभी दुश्‍चक्र में फंस गयी है।
मतलब
कल शाम मंडी हाउस आइए...बताता हूं...।
अगली शाम स्‍कूटी अवशेषजी को छोड गयी। तो उन्‍होंने दुंदभी की सीताकथा सुनायी। कि बेचारी का प्रेमी एकदम सामंती है।
मतलब
...बातचीत में मेरे सामने उसने दुंदभी को कहा ...कि दुपटटा संभालकर चला करो, नहीं तो काट कर फेंक दूंगा।
बस,जरा सा दुपटटा सीने से खिसक आया था ...बस।
अरे...मैंने कहा..
हां , भैया...वहां मेरे सिवा कोई नहीं था, मैं तो कटकर रह गया...
ओह..
जानते हैं भैया, लडका मुसलमान है, एक तो सामंत फिर मुसलमान,दुंदभी कैद होकर रह जाएगी।
वह तो है,पर हम क्‍या कर सकते हैं,मामला निजी है उनका। ठोकर खाकर खुद संभलेगी वह, आप अपना खयाल रखिए।
नहीं भैया। वह वहां कैद होकर रह जाएगी।
वह तो है। पर क्‍या किया जा सकता है। जबतक लडकी को खुद समझ में नहीं आएगा...।
पर कुछ तो करना होगा...
देखा जाएगा...।
अवशेष इसके बाद महीनों उसके सामंत प्रेमी से परेशानहाल घूमते रहे।
इस बीच एक दिन जिस अखबार में वह काम करती थी उसके एक उपसंपादक ने उसके साथ छेडखानी कर दी। अपने सामंत प्रेमी को तो वह बात नहीं सकती थी तो उसने अवशेषजी को बताया। अवशेषजी ने उसे सलाह दी कि वह इसकी शिकायत, अखबार के संपादक से करे।
पर संपादक ने टका सा जवाब दे दिया कि अखबार में काम करना है तो ऐसी छोटी मोटी बातों को अनदेखा करना होगा। यह सब सुनगुन कर अवशेष जी आहत हु। फिर आहत और चाहत मिलकर कुछ तूल पकडना ही था सो उन्‍होंने दुंदभी को एक क्रातिकारी सलाह दे डाली , वह अपना मामला ढोलकिया के ब्‍लाग पर प्रकाशित करा दे। फट जाएगी संपादक की।
दुंदभी की आंखें फटी रह गयीं।
क्‍या कहते हैं आप...
अरे छेडखानी का मामला लेकर हम उस बलात्‍कारी ब्‍लागर के पास जाएंगे। अरे उसी की बीबी ना अपना रोना लेकर आपके प्रजासत्‍ता के दफ्तर में आयी थी। उसकी सहरसा,दानापुर से लेकर लखनउ तक की कहानी कौन नहीं जानता मीडिया में। सहरसा में एक मंदिर में एक लडकी से संबंध बना उसे गंदर्भ विवाह का नाम दिया उसने , जब लडकी ने वैध विवाह की बात की तो उसे घमका कर छोड दिया। फिर किसी तरह लडकी के मां बाप ने उसका विवाह जल्‍दी से कहीं करा कर छुटटी पायी। दानापुर में एक डीएसपी के यहां बाबा गगनार्जुन का नाम बेचकर जा ठहरा एक लडकी को साथ लेकर। उसे अपने रिश्‍ते की मौसी बताया। बाद में जब पुलिसवालों ने मौसी के साथ उसके संबंधों की झांकी देखी तो डीएसपी साहब ने उसे निकाल बाहर किया। उन्‍हें डर था कि वह तो जो कर रहा है सो कर ही रहा है पर ऐसे गोरखधंधे को देखकर कोई पुलिसवाला कब उसकी तथाकथित मौसी का बलात्‍कार कर दे पता नहीं। लखनउ के बलात्‍कार कांड के बाद पहली बार उसकी कारगुजारियां जाहिर हुयीं। वह तो उसने प्रेम विवाह एक भली लडकी से किया था कि छवि सुधरी थी कुछ पर इस लखनउ कांड ने उसे फिर जाहिर कर दिया।
यह सब सुनकर अवशेषजी तमतमा गये। उनके कानों में वह फिल्‍मी गाना गूंजने लगा, यारी है इमान मेरा यार मेरी जिंदगी...।
बोले - क्‍या बात कर रही हैं आप। बरबाद खबर का संपादक रहा है वह।
अब दुंदभी भी तैश में आ गयी थी।
अरे मैं भी पत्रकारिता ही कर रही। एक अकेले आप ही पत्रकार नहीं मेरे पिछाडी बैठ घूमने वाले। मैं भी कुछ जानती हूं। यही तो बुरी आदत है बिहारियों की, कि जरा साथ बिठा दो बातें क्‍या कर लीं, लडकी को अपनी जागीर समझ ली। अरे दिल्‍ली है यह, जैसे आपका काम चार मित्रों के बगैर नहीं चलता वैसे ही यहां की हर कामकाजी लडकी की जरूरतें भी चार हाथों के बिना नहीं पूरी होतीं। अब लडकियां उतनी हैं नहीं तो हम भी चुनाव करती हैं। लडके तो लपकते ही रहते हैं, तो उन्‍हीं में भलों को ढूंढती हैं हम भी। सोचा था आप भले हैं साथ निभेगा। पर आप तो मेरे निजी रिश्‍ते में पच्‍चर फंसाने से लेकर अब एक बलात्‍कारी के पास जाने की पैरोकारी करने लगे। हद है।
रही संपादक होने की बात तो वही रामगढ और झरिया एडीशन का संपादक ना। अब कल को आप भी दरियागंज एडीशन के संपादक हो जाएंगे तो क्‍या हम संपादक मान लेंगे। ऐसी संपादकी से तो चवन्‍नी-ठोला बन चौराहे पर कौडी वसूलना बेहतर काम है। अरे ऐसे संपादक स्‍थानीय व्‍यवसायियों से विज्ञापन-चंदा-कमीशन वसूलने के लिये नियुक्‍त किये जाते हैं, आपही को पता नहीं।
अब तो अवशेषजी का इशक जवाब दे गया।
वे चीख पडे।
तो जाइए, उसी संपादक से बलात्‍कार कराइए।
अब लडकी बिहार की होती तो लोर चुआती मुडकर चल देती। पर वह दिलिआइट थी सो अपनी पतली हवा सी सैंडल निकाली और लगाया सट सट। क्‍या समझते हो आपने आप को,साले चूतिए।
अवशेष का ललित विमर्श उबला एक बार।
गाली मत दीजिए।
गाली को मैं स्‍त्री और दलित के खिलाफ घृणा के हथियार की तरह समझता हूं।
दुंदभी का आक्रोश भी चरम पर था। बोली -
अरे , समझने से क्‍या होता है , कथाकार महोदय। समझने को जीवन में उतारना पडता है। उस ढोलकिया के हो-हल्‍ला ब्‍लाग पर जो बकचोदी और छिनरी के सांय आदि गालियां सुशोभित रहती हैं,उस पर बकार नहीं फूटती तुम्‍हारी। सारा सामंतवाद समझने को हम लडकियां ही हैं।
यह कहकर उसने स्‍कूटी स्‍टार्ट की और सर..र.। बेचारे अवशेष जी..च..च..

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