कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

कहां जा रहे हैं कविद्वय ...पूछता है बलात्‍कारी

कहां जा रहे हैं कविद्वय
पूछता है बलात्‍कारी

और उसकी धवल दंतपंक्तियां
झलक उठती हैं

झलक उठते हैं उसके रक्‍तश्‍लथ मसूडे

पर उसकी हंसी

दांतों से उतर
होठों तक
पहुंच नहीं पाती
और वह
विदोर देता है मुंह

खादी का लंबा चोगा
धारण कर रखा है बलात्‍कारी ने
जो ब्रह्मांड को गडप कर जाने को
लगातार फैल रही
उसकी तोंद के घेरे को छुपाती है

.. मैं आदमी को उसकी तोंद से पहचानता हूं..
कहा था - रघुवीर सहाय ने..

पर मैं
आदमी में
उसकी तोंद को पहचानता हूं

यह तोंद
निहायत पतले दुबले आदमी में भी हो सकती है
और जरूरी नहीं कि हर बार वह दिखे ही

युवा कव‍ि अंजनी
जिसे उसकी बॉडी लैंग्‍वेज कहते हैं
यानि उसकी बांह भुजा के रंग ढंग, हाव भाव
जो दिखा जाते हैं उसकी छुपी तोंद को

धवल दंत पंक्तियां भी
कहां छुपा पाती हैं
उसपर चिपकी मैंल और पीब को

कहां जा रहे हैं कविद्वय
पूछता है बलात्‍कारी

साथ चल रहे धर्मेंद्र से
पूछता हूं मैं
कहां जा रही है यह तोंद
लुढकती हुयी्...

हमेशा की तरह कान की ओर झुकते
फुसफुसाते हैं धर्मेंद्र
...नये शिकार पर...

1 टिप्पणी:

राजू रंजन प्रसाद ने कहा…

ये 'भदंत' कौन हैं? दरअसल जिनके दन्त चमकते हैं,भदंत कहे जाते है. बुद्ध को भी बौद्ध ग्रंथों में भदंत कहा गया है. कभी सोचता हूँ, उनका रंग काला रहा होगा,इसलिए उनके दांत ज्यादा चमकते होंगे. बाद में यह शब्द उपाधि की तरह प्रयुक्त होने लगे-जैसे भदंत आनंद कौशल्यायन. मुझे कई बार लगता है,धवल दन्त के पीछे दन्त की महिमा कम ,काले रंग की कुछ अधिक ही रहती है .