गुरुवार, 19 अगस्त 2010

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है...मनोद्वेग...विचलन. बाल मनोविज्ञान



मेरे बाइस साल पुराने अनुज मित्र हैं एक। उनके पिता क्‍लास वन अधिकारी थे। पर ईमानदार थे और रिटायर के बाद जल्‍द ही गुजर गये। मित्र तमाम योग्‍यता के बाद भी समसायिक योग्‍यताएं ना जुटा पाने के कारण दिल्‍ली में तमाम पापड बेलकर अपनी रोजी जुटाते हैं। कविताएं समीक्षा आदि भी लिख लेते हैं जब त‍ब। वे बिहार के अपने गांव में एक लाइब्ररी बनाना चाहते हैं। तो जब भी मेरे पास किताबें बढ जाती हैं तो उन्‍हें बुला लेता हूं, जितना वे ले जा पाते हैं बांधकर ले जाते हैं। आज भी वे आए। तो हमेशा की तरह अपनी रामकहानी बताने लगे।
हाल ही में वे अपना परिवार गांव से लाए हैं। नौ साल का बेटा है एक। तो आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण पास के सरकारी स्‍कूल में नामांकन करा दिया उसका। घर के जिस माहौल में वह रहा वहां गाली गलौच उसने सुनी नहीं थी उसने। तो जब वह स्‍कूल जाने लगा तो कई तरह की समस्‍याएं पैदा होने लगीं। वैसे आज के लडके कम उम्र में ही काफी परिपक्‍व हो जाते हैं। सो उस बच्‍चे की भी ईच्‍छा थी कि उसका नाम किसी प्राइवेट स्‍कूल में लिखाया जाए। और वह अंग्रेजी सीख सके।
तो यह सब हो न सका। एक दिन जब मित्र उसे पढा रहे थे तो उसका बैग जब उन्‍होंने टटोला तो उसमें उसने सब्‍जी काटने का चाकू और चेन डाल रखा था। पिता ने पूछा तो लडके ने कहा कि स्‍कूल में लडके गाली देते हैं तो उन्‍हें मारने को उसने यह सब रखा है। तो पिता ने किसी तरह उसे समझा बुझा कर स्‍कूल भेजा।
बाद में एक दिन स्‍कूल से खबर आयी कि उसे अचानक दौरा पडता है और वह अचानक कहीं भी तनाव में आने के बाद वही सो जाता है। और ऐसा दिन में तीन चार बार होता है। तब पिता ने उसका स्‍कूल जाना दस दिन रोक दिया। इसी बीच एक दिन जब पिता की बगल में वह सो रहा था तो रात में अचानक वह उठ बैठा और पिता की छाती पर सवार हो उनका गला दबाने लगा। पिता ने तब उसे झकझोर कर जगाया।
फिर पूछताछ से पता चला कि एक दिन जब वह दोपहर को स्‍कूल जा रहा था तो जहां उसे स्‍कूल जाने के लिये रेल लाइन पार करनी होती थी वहीं कुछ गुंडों ने एक व्‍यक्ति को चाकू घोंप कर मार डाला था। लडके ने उन्‍हें ऐसा करते देखा था। हांलांकि वह उन्‍हें पहचानता नहीं था। उसने दूर से ही वह दृश्‍य देखा था। पर उसका जो बुरा असर उस पर पडा उसी का यह नतीजा था। बातचीत के बाद लडका जिद कर रहा था कि मुझे पुलिस के पास ले चलिए। उस आदमी की आत्‍मा कह रही है कि पुलिस को सब कुछ बताओ जाकर। मरने के समय वह मेरी आंखों में देख रहा था।
फिर उसे पास के मनोचिकित्‍सालय ले जाया गया। वहां वह इस शर्त पर गया कि उसे चेन साथ ले जाने दिया जाएगा। डाक्‍टरों ने देख सुनकर उसे दवाएं दी, जिससे कुछ राहत है। दस दिन के गैप के बाद वह फिर आज स्‍कूल गया है। मित्र सोच रहे हैं कि अब महीने में एकाध दिन वह स्‍कूल जाकर कोरम पूरा करेगा और घर पर ही पढेगा लिखेगा।
तो यह है आज के आम लोगों की दुनिया। ये दुनिया अगर मिल ही जाए तो क्‍या है...... 

2 टिप्‍पणियां:

ashwet ने कहा…

सही कहा आपने

राजू रंजन ने कहा…

ऐसी घटनाएँ चिंतित करती हैं लेकिन लिखा जाना भी तो जरुरी है.