कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 16 अगस्त 2010

जब मुखिया के लडके ने गडासे से लडकी को काट दिया - पटना डायरी

मसीहा बनने निकले लालू राजा बन कर रह जाते हैं और नितीश लालू बनकर...
गांव मुझे बहुत प्‍यारा रहा है हमेशा से। बांध और नदी और बाग बगीचे कपडे लत्‍ते चप्‍पल जूते की चिंता किये बगैर निकल जाना कहीं भी। हालांकि अब चीजें बदल चुकी हैं। तो जब पटना में था तो गांव से चाची और भाई आए थे इलाज करा कर लौटते रूक गए थे। तब मैंने उनसे गांव की एक घटना के बारे में पूछा था जिसके बारे में दिल्‍ली में सुधीर सुमन ने पूछा था - कि यार आपके ही गांव की घटना है यह, मुखिया के बेटे ने एक लडकी को बलात्‍कार के बाद काट दिया। तब मैंने सोचा था मुखिया का परिवार अबंड है ही ...।
तब मेरे दिमाग में वह मुखिया था जो अपनी बिरादरी का था, जिसकी राजनीतिक पैठ उपर तक थी और जिसने एक बार दारोगा को थाने में जाकर पीटा था और जेल तक से बच गया था। वह घटना पच्‍चीसों साल पहले हुयी थी। उस घटना में मेरे एक चाचा जो अब नहीं हैं, भी शामिल थे। मुखिया जी पीने आदि के लिये मशहूर थे। केवल मेरे पिता ही गांव में ऐसे थे जो उन्‍हें तरजीह नहीं देते थे। और मैं तो सोचता ही नहीं था कि मुखिय क्‍या होता है...।
पर जब गांव की घटना की तफतीश की तो बातें कुछ और निकल कर आयीं। पता चला यह मुखिया अरसा पहले मुखियागिरी से हट चुके हैं। और नये मुखिया चर्मकार थे। और उनके बेटे ने गांव की ही मल्‍लाह की लडकी को गाडासे से काट दिया था। वह उससे शादी करना चाहता था। पर लडकी ने इनकार कर दिया तो उसके लिये सम्‍मान का मसला बन गया था कि एक मल्‍लाह की लडकी मुखिया के बेटे से विवाह से इनकार कैसे कर सकती है। इस मामले में आगे उस मुखिया को अपने पद से हटना पडा अपने बेटे के इस कारनामे के चलते। बेटा तो जेल गया ही।
यह सब जान मुझे आश्‍चर्य हुआ। मतलब जो क्रूर कार्य कठोर छवि वाले सवर्ण मुखिया और उसके परिवार ने कभी नहीं किया, वह एक दलित मुखिया की पहली ही पीढी ने कर डाला। सत्‍ता भ्रष्‍ट करती है , का अच्‍छा उदाहरण है यह। जब एक दलित आज की व्‍यवस्‍था में संख्‍यां बल पर एक पद पाता है तो वह और उसके सगे पद ही नहीं पाते, विरासत में पद पर बैठे व्‍यक्ति दवारा किये जाने वाले अत्‍याचार भी पाते हैं। और पद की गरिमा बनाये रखने को अत्‍याचार में आगे बढ जाते हैं और इसका सर्वाधिक शिकार अपने जैसे लोगों को ही बनाते हैं। इसीलिये व्‍यवस्‍था परिवर्तन के बगैर मात्र सत्‍ता में हिस्‍सेदारी से परिवर्तन के बहुत मायने नहीं निकलते। इसी का परिणाम है कि मसीहा बनने निकले लालू राजा बन कर रह जाते हैं और नितीश लालू बनकर...

4 टिप्‍पणियां:

हमारीवाणी.कॉम ने कहा…

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माधव ने कहा…

xposing

राजू रंजन ने कहा…

आप सत्य उद्घाटित कर रहे हैं. अच्छा है, रोचक भी. थोडा विस्तार पा जाये तो मजे ही मजे.( महो महो )

Rahul Singh ने कहा…

आपके निष्‍कर्ष से असहमत न होने के बावजूद यह पूर्व-संधारित (pre concieved कहना चाहता हूं), लगता है.