कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

रविवार, 15 अगस्त 2010

बीमार चल रहे पिता - पटना डायरी

अस्‍सी के आस-पास पहुंच चुके पिता इधर कुछ बीमार चल रहे हैं। दस साल पहले हुए हर्ट अटैक के बाद से दवाएं लगातार चल रही थीं, सो अब फिर से हृदशूल जब तब जोर पकड रहा है। कडे प्रशासक रहे पिता से मैं लंबे समय तक लडता रहा मार तमाम विचार,व्‍यवहार को लेकर। ना वे कभी झुके ना मैं कहीं रूका। फिर लडने की उम्र ना रही। चीजें तय हो चुकी थीं। राहें जुदा थीं। अब हमारा रवैया भी बदल चुका था।

पहले कर्मकांड के हर तमाशे का विरोध करने वाला मैं हैदराबाद से उनके लिये गणेश की एक काठ की मूर्ति ले आया था। मेरी अवधारणाओं में अंतर तो आने वाला नहीं था ना उनकी मान्‍यताओं में। पर एक दूसरे को लेकर हम सहज हो चुके थे। इधर जब दिल्‍ली रहता तो हर बार सोचता कि इस बार पटना जाउंगा तो जितने दिन रहूंगा उनका ख्‍याल रखूंगा रोज शाम को पांव आदि दबा दिया करूंगा। पर ऐसा हो नहीं पाता था। पिछली बार पंद्रह दिन था तो एकाध दिन ऐसा कर पाया था। इस बार जबकि वे बीमार थे मैं एक दिन भी ऐसा नहीं कर पाया। सेवा भाव मुझमें सहज है। पर पिता का जो दृढ स्‍वावलंबी रूप है वह सहजता से मुझे यह करने नहीं देता। सो सेवा की ईच्‍छा मेरे मन में ही रह जाती है। इस बार भी देखा कि एक दिन वे नल पर खडे हो एडियों में साबुन लगा रहे हैं। अब उन्‍हें कुछ करने से रोका भी नहीं जा सकता। पहले भी जब उन्‍हें पांवों में दर्द होता खुद ही तेल ले अपने पावों में लगाने बैठ जाते। कभी कभी हमें बहुत शर्म आती तो हम लगा देते पर हम कभी उनका दर्द भांप नहीं पाते थे समय से। यह सब उनके कठोर प्रशासकीय व्‍यक्तित्‍व के चलते ही रहा।
ऐसा मुझे याद नहीं कि कभी पिता खुद अपने कमरे से उठकर हम तक कोई बात कहने आए हों। वे बुला लेंगे या आएंगे तो कुछ कडे अंदाज में कहने ही। इस बार पहली बार उन्‍हें देखा कि वे मेरे कमरे के बाहर आए तो मैंने कहा - आव.. बइठ ... एहिजा बढिया हवा बा..। पहली बार पिता ने मेरा कहना माना था। इसका कारण यह भी था कि मेरी अनुपस्‍िथति में पिता दिन में इस कमरे में ही बैठते थे ज्‍यादा हवादार होने के कारण।

पिता आए तो मां पहले से बैठी थीं जो कि वे अक्‍सर आकर सिरहाने खडे हो कर या बैठकर अपना दुखडा सुनाती रहती हैं। जिसे मैं कम ही सुनता हूं। मां जानती हैं फिर भी सुनाती रहती हैं वे और बीच में कह भी देती हैं कि आउर केकरा कहीं...। तो पिता आकर बैठे तों मॉं हंसती हुयी  बोलीं - इ का पोंछी बढा लेले बानी। मां का ईशारा चुटिया की ओर था। मैंने कभी पिता को चुटिया बढाते नहीं देखा था। पिता ने कोई खास ध्‍यान ना देते हंसते कहा - पोंछ ह कि चोटी ह। मँ ने फिर कहा - उहे चोटी पर लागला पोंछिए अइसन। पिता हंसते हुए चुटिया को इस बीच हल्‍के सहलाते रहे।
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जारी.....

2 टिप्‍पणियां:

राजू रंजन ने कहा…

मैं जब भी आपके पिताजी के बारे में सोचता हूँ एक ही तस्वीर सामने आती है-सड़कों पर चलते हुए, साथ उसे तौलते हुए. दृढता और आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति. मैं उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ.

Rahul Singh ने कहा…

ऐसा व्‍यक्तित्‍व जो शायद अपने आत्‍मविश्‍वास व स्‍वाभिमान के चलते ही स्‍वस्‍थ्‍य है और कोई कामना भी उन्‍हें आहत न कर जाए. गहरी निजता के बावजूद सहज पठनीय, बहुत खूब.