रविवार, 11 जुलाई 2010

कविता के रूप और फार्म पर एक बहस

छंदमुक्‍त कविता में असफलता और महानता दोनों की संभावना ज्‍यादा है ...

इस साल के आरंभ में अग्रज और प्रिय कवि लीलाधर मंडलोई ने आजमगढ उत्‍तरप्रदेश से छपने वाली एक पत्रिका अलख के लिये कवि और कविता को लेकर कुछ बातें सामने रखीं थीं जिसपर समकालीन रचनाकारों,कवियों की राय वे चाहते थे। उन सवालों पर  मुझ सहित रामजी यादव,अच्‍युतानंद मिश्र,सुधीर सुमन की राय सामने आयी थी , जो अलख में छपी भी। वे बातें और उन पर आयी राय यहां इस लिहाज से दी जारही है कि उस पर अन्‍य रचनाकारों की राय भी हमें मिल सके और एक संवाद बने। इस संवाद को हम क्रमश: यहां प्रस्‍तुत करेंगे।

क्‍या कविता के सभी मौजूद फार्म्स अस्तित्‍व में बने रहने चाहिए या किसी नयी और मानीखेज कविता की जरूरत के चलते उसे बदलना चाहिए । भाषा,फार्म या कथ्‍य के स्‍तर पर या किसी और रूप में...
सुधीर सुमन - बेशक सारे फार्म अस्तित्‍व में रहने चाहिए। नया और मानीखेज अगर कुछ ऐसा है जो अब तक के शिल्‍प में नहीं अंट रहा है, तो उसकी अभिव्‍यक्ति की जद्दोजहद खुद भाषा और फार्म को बदल डालेगी।

अच्‍युतानंद मिश्र - कविता के फार्म,कथ्‍य, समय-समय पर बदलते रहते हैं, ऐसा इसलिये होता है कि सच्‍ची कविता अपने समय को प्रतिबिंबित करती है। अपने समय की गहन अभिव्‍यक्ति के लिये वह अपनी भाषा,फार्म,कथ्‍य, सब स्‍वयं ढूंढ लेती है। जिस तरह हमारा समय लगातार बदल रहा है उसी तरह अपने सभ्‍य समाज,देश,काल की अभिव्‍यक्ति करने वाली कविता भी शिल्‍प और वस्‍तु के स्‍तर पर बदलती रहती है और लगातार निर्मित होती रहती है। इसे बदलने में रचनात्‍मकता को बचाए रखने की चेतना कार्य करती है।

कुमार मुकुल - फार्म नहीं बात महत्‍वपूर्ण है। शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा भी है- बात बोलेगी, हम नहीं...भेद खोलेगी बात ही। अब आपके भीतर की बात अपने को पूरी कराने के लिए कोई भी रूप ले सकती है,किसी भी फार्म में वह कागज पर उतर सकती है। मैं अक्‍सर डायरी आदि को भी बाद में कविता में तब्‍दील होता पाता हूं। कई बार कविता कहानी हो जाती है। जरूरत होने पर कोई भी नया फार्म रच सकता है। अगर नया फार्म संप्रेषणीयता की नयी ताकत के साथ आता है तो उसका स्‍वागत होगा। पर फार्म को रचनाकार की सीमा नहीं बन जाना चाहिए। वर्ना वह उसकी प्रगति की राह का रोड़ ही बनेगा।

रामजी यादव - बेहतर हो कि छांदस और अछांदस कविता और समाज के अंतरसंबंधों को देखा जाए। तुक वाली कविताएं प्राय: उन्‍हें ज्‍यादा खींचती हैं जो जिंदगी का तुक नहीं दिखा पा रहे हैं और उसके नपे-तुले- ढब और ढर्रे को उपादेय मानते हैं। जाहिर है यहां कथ्‍य ज्‍यादा मायने नहीं रखता और इसीलिये अर्थहीनता एक सामान्‍य परिघटना है। दूसरी ओर मुक्‍त छंद में जीवन प्रवाह, तार्किकता और आजादी ज्‍यादा है। औचित्‍य की खोज से ज्‍यादा यहां नए क्षितिज के प्रति उन्‍मुक्‍त आग्रह और उत्‍साह भी है। यह समाज के साथ कविता के चलने की जद्दोजहद को दर्शाता है। यहां कविताएं प्राय: असफल होकर स्‍मृतियों से बाहर चली जाती हैं। फिर भी संस्‍कृति और चेतना के विकास में उनका योगदान अद्भुत है। भाषा ,फार्म , कथ्‍य और मेटाफर एक अनवरत और स्‍व्‍त:स्‍फूर्त प्रक्रिया है। इसीलिये छंदमुक्‍त कविता में असफलता और महानता दोनों की संभावना ज्‍यादा है।

1 टिप्पणी:

Jandunia ने कहा…

शानदार पोस्ट