कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 17 जून 2010

अतीत की छायाओं का संग्रहण - कुमार मुकुल

होने की सुगंध  युवा कवि प्रकाश का पहला कविता संग्रह है। यह विडंबना ही है कि इस संग्रह की कविताओं में कवि का होना नहीं है कहीं। ये कवि के भूतकाल की कविताएँ हैं, इसलिए अकथ हैं- मेरे पास कहने को कुछ नहीं था
सो जन्मों से कहता जाता था
कहने को होता
तो कहकर चुक जाता।
हिन्दी की युवा कविता के लिए इस तरह की उलटबांसी नई है, पर भारतीय दर्शन ऐसी उलटबांसियों से पटा पड़ा है। दरअसल यह एक युवा की अपनी कथा कह न पाने की बेचैनी की कविताएँ हैं पर चूंकि यह कहना भूतकाल में है सो वर्तमान में यह संभव नहीं हो पाता। कविता में नयी जमीन तोड़ने का साहस नहीं है कवि में इसलिए अतीत का घटाटोप खड़ा कर देता है वह। क्योंकि अब अतीत का तो कुछ किया नहीं जा सकता।
जहाँ कवि अपने 'या' के अबूझ दर्शन से बाहर आकर कुछ रचने की कोशिश करता है, तो वहाँ वह झुककर नमस्कार करने या जो है उसे स्वीकारने के अलावा कुछ नहीं कर पाता –
नदी भागी जाती है 
सागर की ओर
पाँवों पर झुककर
लीन हो जाती है
यह नमस्कार की नित्य लीला है।
यह नदी आपके लिए नहीं है कविवर सागर के लिए है। यह नमन आपका है नदी की लीला नहीं? प्रकृति पर ऐसे आरोपन बहुत हैं संग्रह में और एक ही कथ्य का दुहराव भी। नदी सागर की ओर जाती है यह बात इस संग्रह में तीन जगह कही गयी है। मूलतः यह कथ्य अज्ञेय के यहाँ से लिया गया है। 'कितनी नावों में कितनी बार' कविता संग्रह में अज्ञेय ने लिखा है एक कविता में कि नदी सागर में मिल गयी, मैं किनारे पर खड़ा रह गया। इसी तरह संग्रह की कविताओं में 'या' की शैली में जो दर्शन उलटबांसी की तरह घेरता है पाठक को, वह भारतीय परंपरा की छाया है, जिसका प्रभाव ग्रहण किया है कवि ने और उसे वर्तमान में पुनर्रचित ना कर पाता है तो 'या' की शैली में कह जाता है।

'सुनने के बारे में कुछ पंक्तियाँ', नामक कविता में कवि लिखता है-
सुनो वह
जिसे सुनने के द्वार पर
तुमने शिला लुढ़का रखी है
और एक भी दूब खिलने नहीं दी।
 सही लिखा है कवि ने पर सत्य तो यह है कि कवि ने खुद वर्तमान के मुहाने पर भूत की शिला खड़ी कर रखी है। सुनने में कुछ विशेष प्रयत्न न था कवि की पंक्ति है। यही कवि स्वभाव भी है। प्रयत्नहीनता कवि का मूलभाव है बस अतीत की छायाओं का संग्रहण हैं ये कविताएँ है, सुनना है एक पर प्रयत्नहीन, सक्रियता नहीं है, जीवन नहीं है कहीं इन कविताओं में फड़कता या साँसें लेता।

हालांकि कवि को पता है कि सक्रियता ही आखिरी उपाय है जीवित आदमी के लिए। 'धन्यवाद' कविता में वह बताता भी है कि बंद दरवाजे की कुंडी खोल खुले आकाश को धन्यवाद देना ही आखिरी उपाय था, पर कवि ने यह उपाय किया या नहीं उसका पता नहीं देता वह। यूँ है की शैली में जहाँ कवि कोशिश करता है अपनी प्रयत्नहीनता के बाहर आने की वहाँ वह अच्छी कविता लिख पाता है। 'हँसी का बीज' जैसी ऐसी जीवंत कविता भी है प्रकाश के पास और उसे अपने इस बीज को आगे विकसित होने देना चाहिए अतीत के भूत से पल्ला छुड़ाकर तभी कविता में वह कुछ पन्ने जोड़ पाएगा।
'हँसना शुरू होते ही
मैदान में हँसी के बीज पड़ जाते हैं।'
कवि को अपनी इस हँसी के श्रोत ढूँढ़ने होंगे। उसे अपनी भाषा का व्याकरण जो 'करता था' की ध्वनियों से पूरित है, उससे बाहर निकलना होगा, तभी उसके दुखों का निस्तार होगा।

यह समीक्षा मासिक साहित्यिक पत्रिका पाखी के जून अंक में प्रकाशित है।

1 टिप्पणी:

Maria Mcclain ने कहा…

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