कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 27 मई 2010

आत्‍मा और अमरता - कविता

एक कौंध है आत्‍मा
बशर्ते कि तुम्‍हारे पास निगाह हो हलचल है अंतरमन की कि छलकता चला आता है जल
किनारे के पार
भिंगोता त्‍वचा
और अमरता
एक स्‍वप्‍न है अगर हमारे पास कदम हों
उधर बढाने को
नहीं तो मिटटी का सूखा ढेर है आत्‍मा
जिसे हवा जब चाहे उडा सकती है
और अमरता उस ढेर की आत्‍मा...

2 टिप्‍पणियां:

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

जीवन दर्शन को दर्शाती सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ सुन्दर रचना,,, बधाई स्वीकारे http://athaah.blogspot.com/

dr om prakash pandey ने कहा…

A positive and realistic approach to metaphysics is seen here in this poem .