कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 25 मई 2010

वहां मेले में - कविता - कुमार मुकुल

वहां मेले में
रोशनी थी बहुत
पर इससे
मेंले के बाहर का अंधेरा
और गहराता सा डरा रहा था
एक जगह लाउडस्‍पीकर चीख रहा था
...लडकी लडकी लडकी
बस अभी कुछ ही देर में जादूगर
इस लडकी को नाग में बदल देगा
लडकी लडकी लडकी...
वहां मंच पर दो लडकियां
चाइनों की तरह
मुस्‍कुरा रही थीं
और कर भी क्‍या सकती थीं वो
...फिर गाना बजने लगा...
सात समंदर पार मैं तेरे पीछे....
अब लडकियां नाचने लगी थीं
फिर मोटी सी लडकी ने कुछ इस अदा से
अपनी जुल्‍फें झटकारी
कि सामने नीचे जमीन की गर्द उड चली
...यह देख मेरे साथ बैठी बच्‍ची
ने मुस्‍कुराते हुए मेरी ओर देखा ...
उसकी आंखों में एक सरल रहस्‍य
जगमगा रहा था...

2 टिप्‍पणियां:

dr om prakash pandey ने कहा…

This poem of Kumar Mukul is a whip upon the modern consumerim which is shamelessly insesitive and unscrupluosly derogatory to the dignity of women .Linguistically the poem is expressive of poet's heartfelt anguish .

dr om prakash pandey ने कहा…

This poem of Kumar Mukul is a whip upon the modern consumerim which is shamelessly insesitive and unscrupluosly derogatory to the dignity of women .Linguistically the poem is expressive of poet's heartfelt anguish.A beautiful poem indeed !