रविवार, 16 मई 2010

शातिर की थेंथरई - कविता - प्रिय कवि विष्‍णु नागर को पढते हुए - कुमार मुकुल

नागर जी का कविता संग्रह घर के बाहर घर अंतिका प्रकाशन से आया है इस साल। पडोसी कव‍ि,पत्रकार मित्र पंकज चौधरी से लेकर पिछले सप्‍ताह यह संग्रह पढा मैंने। पिछले संकलन की तरह व्‍यौरों की बारीकी और व्‍यंग्‍य की धार इस संग्रह की कविताओं की भी खासियत है। कई कविताएं पसंद आयीं। इसी क्रम में उनकी नौकरी कविता पढ रहा था तो मेरे भीतर यह कविता बन रही थी ...

जैसे थेंथर
थेंथरई से
बाज नहीं आता

शातिर लोग

शातिरई से बाज नहीं आते


यह बाज न आना

बाज दफा

इतना ज्‍यादा बढ जाता है

कि आप उसके जीनियस होने पर

शक करने लगते हैं


आप सोचने लगते हैं
यह शातिर है या थेंथर

ऐसे में आपको गुस्‍सा भी आ सकता है

कि दें उसे एक हाथ खींचकर

जैसा कि थेंथरों के मामले में
अक्‍सर आप सोचते हैं

और उसे अभिव्‍यक्‍त भी कर डालते हैं

पर थेंथर वैसा का वैसा
थेंथरई करता रह जाता है

और आप अपनी थेंथरई छोड
अपनी राह ले लेना सही समझते हैं


पर शातिर की थेंथरई कभी कभी

इतनी बढ जाती है
कि आप अपनी थेंथरई छोड उसे
एक चपत लगा देते हैं


यही वह जगह होती है

जहां शातिर खुद को थेंथर से अलग करता है

वह कुछ ऐसा बाना बांधता है

कि पल भर को आप
सहम जाते हैं

यही वह पल होता है
जहां शातिर पलभर में

अपना फन गिरा जल्‍दी से सरक लेता है


और आखिरकार आप

उसकी जीनियस का लोहा मान लेते हैं...

कि भई
वह तो शातिर निकला ...

1 टिप्पणी:

लवली कुमारी/Lovely kumari ने कहा…

अच्छी है ..पर आपके लेखन में जो व्यंग का पुट होता है ..उसकी कमी महसूस हुई