रविवार, 16 मई 2010

वे अकेली जलाती हैं चूल्‍हे काली पडती हैं और मां हो जाती हैं - गौरव सोलंकी

कल रविवार की शाम गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में जसम की ओर से कराए गए कविता पाठ में गौरव सोलंकी ने कुछ कविताएं पढीं थी जिनमें एक यह है...

छूटी हुई लिपस्टिक

वे तुम्हारी पागल रातों में
तलाशती हैं अपनी छूटी हुई लिपस्टिक
और यकीन करती हैं तबाह होती हैं
वे चली जाना चाहती हैं
और लौट आना भी
वे किसी गहरे रंग की पतंग पर बैठकर
परी या माँ बनने को
गायब हो जाना चाहती हैं दरअसल
और तुम उन्हें बताते हो कि
उन्हें डॉक्टर बन जाना चाहिए
और उस उजड़ी हुई महानता में
तुम उन्हें खूबसूरती से धकेलते हो बार बार
जहां तुम बीमार हो
और तुम्हें खेलना है उनकी लटों सेए
शिकायतें करनी हैं
और तुतलाना है

एक उदास रात में
तुम खोलते हो अपने काले रहस्य
और अपनी अनिद्रा के चुम्बनों से उन्हें जला डालते होए
फिर एक सुबह तुम घर से निकलते हो
पूर्व के जंगलों की ओर
और महान हो जाते हो

वे अकेली जलाती हैं चूल्हे
काली पड़ती हैं
और माँ हो जाती हैं

1 टिप्पणी:

pandeythepoet ने कहा…

This poem carries a genuine feministic touch and concen .It's a pleasure to see such poems .Thanks to both Solanky and Mukul .