कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

सोमवार, 24 मई 2010

घृणा पर आधारित अरविंद अडिगा का उपन्यास - द वाइट टाइगर


राजेश जोशी ने अपनी एक कविता में लिखा है कि घृणा इतनी गैरजरूरी चीज भी नहीं कि जहां उसकी जरूरत हो वहां भी ना की जाए। सीमित तौर पर इसी बात को आधार बनाकर अरविंद अडिगा ने अपना उपन्याहराद वाइट टाइगर लिखा है। सीमित इसलिये कि उपन्यारस में घृणा का प्रयोग अधिकतर गैरजरूरी लगने लगता है। इससे पहले मैंने ऐसा उपन्योस नहीं पढा है जो आरंभ से अंत तक एक व्ययक्ति की घृणा को आधार बनाकर रचा गया हो। मुंबईया फिल्मों की तरह घृणा को आरंभ से अंत तक वह बरकरार रखता है। गालियों का जमकर प्रयोग किया गया है उपन्याबस में और ईश्वर अल्ला तक को बख्शा नहीं गया है। जहां भी जब मन होता है उपन्यालसकार किसी की भी चोंच किसी के भी पिछवाडे डलवा देता है।
यह एक ड्राइवर की कहानी है जो अपने गांव से लेकर दिल्लीस तक एक जमींदार परिवार की सेवा में लगा रहता है। जमींदार है तो वह आततायी होगा ही सो वह है। और आततायी का अंत होता है तो उसका भी होता है। पर वह सामान्य जमींदारी की कहानियों की तरह किसी जनांदोलन से खत्म नहीं होता बल्कि एक सताए गए ड्राइवर की घृणा उसका अंत करती है।
वैसे यह एक अपवादी चरित्र है। जमींदार भी अब वैसे रहे नहीं सामान्यतया दलित पीडित जमात ने लडभिडकर अपने अधिकार छीने हैं उससे। पर अपवाद तो हो ही सकते हैं खासकर अगर आपको उपन्यास लिखना हो । वैसे इस ड्राइवर के बहाने उपन्याहसकार ने महानगरीय विकृतियों का अच्छा पर्दाफाश किया है। दिखलाया है कि चमचमाती गाडियों में भागने वाले कितनी कालिख लिये चलते हैं और जरा सी कोशिश से एक अदना सा ड्राइवर उन्हें पार घाट लगा सकता है अगर वह अपने पे आ जाये तो। और किसी के अपने पर आ जाने से कौन रोक सकता है उसे। ब्रेख्त ने कुछ ऐसा लिखा भी है-. जनरल बहुत मजबूत है तुम्हारा यह टैंक पर इसमें एक नुक्स है इसे आदमी की जरूरत होती है और आदमी में भी एक नुक्शत है कि वह सोचता है। और यह सोचना कब शुरू हो जाए यह पता लगाने की कोई मशीन नहीं इजाद हुई है। तो खोपडिया केवल मुंबईया फिल्मों के खलनायकों की ही नही घूमती वह किसी आम आदमी की भी घूम सकती है तो उस ड्राइवर की भी खोपडिया जब घूम जाती है तो वह अपने मालिक का कत्ल कर देता है और उनके साथ रहकर सीखे गए करतबों से बच भी जाता है , अपनी रामकहानी सुनाने के लिये। फिर अपनी रामकहानी भी वह अलटू.पलटू लोगों को नहीं सुनाता इसके लिये वह चीन के महामहिम वेन जियाबाओ का चुनाव करता है। क्रांति से किसे परहेज है आजकलए, सो चीन के महामहिम से कम पर कैसे बात हो। वैसे जहां तहां नक्सलवादियों आदि को भी मसाले के तौर पर याद कर लिया गया है।
लेखक ने भारत को अंधकार और रोशनी के भारत में बांटकर देखा है। अंधकार का भारत वह जहां रोशनी की किरणें पहुंच कर दम तोड देती हैं और रोशनी का भारत वह जहां अंधेरा रोशनी के नियॉन बल्बों से फूटता है और अपने छोटे से घेरे के बाहर के अंधेरे को और गहराता जाता है। किताब जहां तहां अपने मजेदार सनसनीखेज विश्लेषणों से भरी है। कुछ इस तरह से कि आपको उसमें जीवन के दर्शन का भी पुट मिलता चलेगा और आपकी कुछ गंभीर पढने की ग्रंथी तुष्ट होती रहेगी। मार्क्स वाद जिसकी पहचान लुंपेन सर्वहारा के रूप में करता है अडिगा का ड्राइवर उसी कोटि का है। अब लुंपेन है तो लुच्च।ई कहां जाने वाली है सो किसी भी स्त्रीर को देख उसकी चोंच खडी हो जाती है और सर्वहारा है तेा जहां तहां अपना रंग बदलने की जरूरत के हिसाब से दर्शन तलाश लेता है वह। जैसे एक जगह ड्राइवर कहता है कि मिस्टार जियाबाओ आपका ड्राइवर अगर मर्डर वीकली के पन्ने पलटने में रमा रहता हैए तो घबराइएगा नहीं। जिस दिन आपका ड्राइवर गांधी और बुद्ध के बारे में पढना शुरू करे , हां तब जरूर आप अपनी पतलून गीली करियेगा। इसी तरह एक जगह जब उसकी मालकिन उसे दांत और कपडे आदि साफ रखने की हिदायत देती है तो वह दांत साफ करते समय डायलाग मारता है, काश आदमी इतनी ही आसानी से अपने अतीत को भी थूक पाता।
जहां भी घृणा को अभिव्यक्तक करना होता है उपन्यासकार अपने हाथ दिखलाने से बाज नहीं आता। जैसे एक दृश्य जब तब आता है कि जब ड्राइवर को गुस्सा‍ आता है तो वह कार में सामने नजर आदि से बचने के लिए लगाए गए राक्षसनुमा पुतले को दो घूसे मारता है। और काली माता की तस्वीर को जीभ दिखाता वह उसे डायन पुकारता है। दरअसल यह घूंसा मालिक के साथ उसकी सांस्कृहतिक समझ पर भी पडता है। इस तरह यह घूंसा वह अपनी गुलाम मनोवृति को भी मारता है। वैसे यह मजेदार है कि उस ड्राइवर को मेट्रो की खुदाई के लिए लायी गयी पीली क्रेन दैत्य की तरह लगती है पर दूसरी तरफ वह दिल्ली सरकार की इसके लिये खिंचाई भी करता है कि यहां एक ही रिंग रोड है जबकि बीजिंग में दर्जन भर। मतलब कि दर्शन की अच्छी काटमकाट है उपन्यास में।
मि जियाबाओ को उपन्यासकार ने ऐसा माटी का पुतला बना रखा है जो बस उपन्यास नायक ड्राइवर को सुनता रहता है भारतीय देवी.देवताओं की मूरतों की तरह। अगर उसने उसे एक जीवित पात्र बनाया होता तो शायद उपन्यास का नक्शा् और होता। तब तमाम सवालों पर वह जिरह करता फिर शायद यह ड्राइवर इस तरह शुरू से अंत तक जिंदाबाद जिंदाबाद नहीं करता रहता, उसे कहीं रूक कर विचार करना पडता। जैसे जियाबाओं को ड्राइवर समझाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव नौकरों की विश्वसनीयता पर टिकी है। कि वह एकाध रूपये तो चुरा सकता है पर लाखों डालर आप उस पर छोडकर जा सकते हैं। यहां विश्वसनीयता की जगह अज्ञानता उचित शब्द होता। दो चार रूपये की चोरी वह करता है क्यों कि उतना खपाने भर ही उसकी अक्ल है। उसे इस लायक बनने ही नहीं दिया गया है कि वह लाखों डालर का इंतजाम कर सके। वह उसके लिये सिर का बोझ हो जाता है। क्योंकि ना तो उसका बैंक में खाता है ना उसके पास मकान कोठी है जहां वह इस माल मत्ते को छुपा सके। आखिर यह उपन्यांस नायक ड्राइवर भी उन्हींउ ड्राइवरों में एक था उसने मालिक के साथ रहकर ही सारी कलाएं सीखीं और उसका रूपयों से भरा बैग उडाकर उसकी गरदन रेतकर उपन्यास की फिलासफी तैयार की। हालांकि ड्राइवर बतलाता है कि ये ड्राइवर और अन्य श्रमिक वर्ग भी काबिल,गुणी और होशियार है पर उसे ऐसी घुटटी पिलायी गयी है कि वह गुलाम बना रहता है। यहां वर्गगत अंतर पर ध्यान नहीं दिया गया है। यहां ड्राइवर को चीन के प्रिमियर जियाबाओ से कुछ सीख ले लेनी चाहिए थी पर दुनिया का महान ईमानदार भारतीय आखिर एक चीनी से कैसे कुछ सीख सकता है उसे बस अपनी हांकते जाना है। यही उपन्यासकार की सीमा है। वह अपने पात्रों का विकास संवाद करने भर नहीं कर पाता। एकतरफा बयानबाजी ही उपन्यापस का आधार है।
आगे एक जगह ड्राइवर अपना दर्शन बुकता है कि अमेरिका एइंगलैंड के अमीर नौकर नहीं रखते और वे जानते ही नहीं कि ऐशोआराम की जिंदगी क्याब होती है। दरअसल यहां सामंतवाद और पूंजीवाद के अंतर को अनदेखा किया गया है। अमेरिका इंगलैंड में तीसरी दुनिया के देशों का दोहन कर जो अपार पूंजी अर्जित की गयी है उसी से ऐशोआराम की वह व्यवस्थां की गयी है जिसकी कल्पना भी भारतीय अमीर नहीं कर सकते। वहां जब ऐसे दरवाजे हैं जो आने पर खुद सामनेवाले की पहचान कर खुल जाएं तो उन्हें इस तरह दरबान और नौकर रखने की जरूरत क्यों पडेंगी। वे मशीनें ज्यादा विश्ववसनीय और सुरक्षित हैं नौकरों की तुलना में, नहीं तो ये अंग्रेज ही थे जो तमाम भारतीय गरीबों को गुलाम बनाकर दुनिया भर में ले गये थे।
अधिकांश मामले में उपन्यासकार समय से पीछे चल रहा है। आगे ड्राइवर इस सब के लिये भारतीय परिवार को दोषी मानता है और उसे एक मुरगी दडबा की संज्ञा देता है कि ये नौकर इसलिए विद्रोह नहीं कर पाते कि उन्हें डर रहता है कि उसके जमींदार मालिक उसके परिवार की हत्या करा देंगे। उपर नौकरों की जिस विश्व्सनीयता की घुटटी की बात की गयी है वहां भी एकहद तक यह डर मूल कारण है उनकी तथाकथित ईमानदारी का। यह ड्राइवर भी अपने परिवार को भुलाकर ही अमानवीय बन मालिक की हत्याल कर फरार हो अपनी ऐशो आराम की जिंदगी संभव कर पाता है। पर यह कोई हल नहीं हुआ जो ड्राइवर के माध्य‍म से उपन्यानसकार सामने लाता है यह तो अमानवीयता की नयी पौध तैयार करना हुआ। इसका हल अब लोग ढूंढ चुके हैं और आज इन परिवारों की वैसी ही स्थिति नहीं है अब ये परिवार अपने शोषकों से मुकाबला करने को उठ खडे हुए हैं और तमाम जगह तस्वीर बदली है। उनके हमलों से घबराकर यह व्यवस्था उन्हें नक्सली आदि कह कर किनारा करना चाहती है पर अब उसे बहुत जगह बातचीत करने को मजबूर भी होना पड रहा है। अगर उपन्यासकार को इस बदलाव की जमीनी जानकारी होती तो वह ड्राइवर को उस तिलस्मी आपराधिक जीवन की ओर नहीं ढकेलता बल्कि वह इधर झांकता तो परिवारों की बदली सूरत उसे उपन्यास के नये आयाम तैयार करने को प्रेरित करते। पर ऐसा करने में एक तो काफी मिहनत करनी होती फिर ऐसी मसालेदार अपराध कथा कहां मिलती जिसे पढकर पश्चिम के अंग्रेजीदा पाठकों की श्रेष्ठतता ग्रंथी तुष्टे होती और वे उसे सराहते और पुरस्कृेत करते।

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