कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

ये पैसे मैं आपको कहां लौटाउंगा - संस्‍मरण - कर्म और भाग्‍य

घटना पंद्रह साल पहले की है। पटना रेलवे स्‍टेशन से दिनकर चौक के लिये टेम्‍पो पर बैठ रहा था मैं। पीछे की तरफ मेरे बाद एक सीट और खाली थी आटो में। तभी एक बूढा आदमी आया और आटो ड्राइवर चलने के पहले सबसे भाडा वसूलने लगा। बूढे के पास सवा रूपये थे जबकि भाडा डेढ रूपये था। तो डा्इवर उसे उतारने लगा। मुझे लगा कि अरे चार आने की तो बात है सो बोला- अरे अब बाबा को कहां उतार रहे हो चलो मेरे में से काट लो। अब बाबा बैठ गये मेरे बगल में।
बाबा को मुझसे पहले उतरना था तो उतरने के बाद उन्‍होंने लाड से देखते मुझसे पूछा - अब इ पइसा हम रवा के कहां लौटाइब..मतलब अब ये पैसे मैं आपको कहां लौटाउंगा। मैंने इस पर ध्‍यान ना देते कहा- अरे बाबा जाइए अब लौटाना क्‍या है...।
बाद में आटो चला तो बाबा की करूण मुद्र बार बार याद आ रही थी। फिर मैं सोचने लगा कि अब ये बाबा अगले हर जरूरत मंद को अपनी जगह देखेंगे और उसकी मदद करना चाहेंगे क्‍यों कि उनके हिसाब से वह चरन्‍नी उन पर कर्ज हो गयी,उनके मानस पर कर्ज हो गयी थी। और इस तरह एक चक्र चलेगा लौटाने का जो बहुगुणित होता चला जाएगा। चूंकि लौटाने के लिए उन्‍हें मैं फिर नहीं मिलूंगा तो वह लौटाना जारी रहेगा तमाम उम्र तमाम जरूरतमंदों को। फिर किसी दिन जरूरत पडने पर जब कोई अचानक मेरी मदद को बढ आएगा तब मैं कहूंगा कि आज मेरा भाग्‍य अच्‍छा था।
पर हम इस तरह भी तो सोच सकते हैं कि वह मेरी चरन्‍नी ही है जो लौट रही है इस रूप में। मतलब अगर सचेत रूप में आप मदद को अगर तैयार रहते हैं तब भी आप अपनी ही मदद कर रहे होते हैं। दुनिया बहुत छोटी है और आपका व्‍यवहार आप तक लौटता है , कर्म और भाग्‍य आदि तो उसकी सीमित व्‍याख्‍याएं हैं ।

3 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

दुनिया बहुत छोटी है और आपका व्‍यवहार आप तक लौटता है , कर्म और भाग्‍य आदि तो उसकी सीमित व्‍याख्‍याएं हैं ।

लवली कुमारी ने कहा…

हाँ ऐसा होता तो है ..यह मैंने समझा है ..शेष सब व्याख्याएं ही है

निशाचर ने कहा…

लाख टके की बात कही आपने.......